हमारी सोसाइटी के करीब डेढ़ महीने से सूने पड़े पार्क में कुछ दिनों से कुछ हलचलें शुरु हुई हैं। मास्क लगाए कुछ लोग सुबह और शाम वॉक पर निकलने लगे हैं।जाहिर है चिड़ियों की चहचहाहट के बीच अब मोबाइल पर बात करने वालों की आवाज़ें भी आने लगी हैं। सुबह आंख खुली तो कोई सज्जन लगातार फोन पर बात किए जा रहे थे- ‘मुझे तो लगता है कि ये कोरोना वोरोना एक इंटरनेशनल साजिश है।
सबसे ज्यादा नियम हम मिडिल क्लास लोग मानते हैं, सबसे ज्यादा हमलोग डरते हैं, सबसे ज्यादा हमलोग घरों में बंद रहते हैं, दारू की दुकानें खोल दीं, अब कर लो सोशल डिस्टेंसिंग, रोक लो कोरोना। अजी मुझे तो लगता है कि चीन, अमेरिका, भारत और दुनिया के सब बड़े देश मिले हुए हैं और जनता को मौत का डर दिखाकर बेवकूफ बना रहे हैं।‘
थोड़ी देर हूं हां करने के बाद वो सज्जन फिर चालू हो गए- ‘अजी मैं तो आपको बता दूं, जितनी ये कोरोना के नाम पर नहीं मारेंगे, उससे कहीं ज्यादा वैसे ही डर, घबराहट और भुखमरी से मर जाएंगे। रोक लो मजदूरों को, कुछ नहीं तो बेचारों पर मालगाड़ी ही चढ़ा दी, 12-15 वैसे ही मर गए। कुछ तेल टैंकरों में तो कुछ मिक्सर में घुस घुसकर हजारों किलोमीटर दूर निकल गए, दम घुटने से उसमें कई मर जाएंगे। और तो और अब तो बेचारे उन मरने वालों की खबरें ही नहीं आतीं, अखबार या चैनल वाले भी खाली कोरोना की गिनती गिन रहे हैं।‘
बातचीत दिलचस्प होती जा रही थी। पार्क में सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर वॉक करने वाले 5-6 और लोग थे। इन साहब की बातें सुनकर उनका भी दर्द बाहर आने लगा। उन साहब ने फोन पर अपनी बात ये कहकर खत्म की कि चलो जी, फिर बात करते हैं और फिर सोशल डिस्टेंसिंग के साथ पार्क में एक मिनी कांफ्रेंसिंग शुरु हो गई।
‘भाईसाहब, आप ठीक कह रहे हैं, ये कोई इंटरनेशनल साजिश ही है। हर देश में आम आदमी परेशान है, आंदोलन हो रहे हैं, ढेर सारे मुद्दे हैं, विपक्ष शोर मचा रहा है। इससे बचने का इससे बढ़िया तरीका क्या हो सकता है, सबको मौत का डर दिखाकर घर में बंद कर दो। पहले भी तो स्वाइन फ्लू, डेंगू और जाने कितनी बीमारियां आईं लेकिन ऐसा नाटक तो कभी नहीं हुआ... जिसे मरना है वो तो वैसे भी मरेगा ही, सुरक्षा तो पहले भी हमें अपनी खुद ही करनी पड़ती थी, अब भी हम ही खुद को बचा कर रख ही रहे हैं... सरकार क्या कर रही है, अपना खजाना भरने के सिवा...’
‘आप शराबियों को रोक नहीं सकते, वहां आपको रेवेन्यू नजर आता है। करोड़ों अरबों फूंककर हेलीकॉप्टर से फूल बरसा रहे हैं, सैल्यूट कर रहे हैं... अरे इन हेलीकॉप्टर से आप मजदूरों को उनके घर भी तो पहुंचा सकते थे.. लेकिन नहीं... पीएम से लेकर सीएम तक, सेना से लेकर बड़े बिजनेसमैन और हीरो-हिरोइन तक सबके सब इवेंट कर रहे हैं, इंटरटेनमेंट हो रहा है।’
‘अजी ये तो देखिए, पीएम फंड का क्या हुआ। सब काम तो जनता से करवा रहे हैं, एनजीओ कर रहे हैं, आम लोगों से चंदा लेकर इंसानियत के नाम पर खाना बांटकर फोटो खिंचवा रहे हैं...और साहब बैठकर अरबों, खरबों का फंड जमा कर रहे हैं... उन पैसों का कोई हिसाब है क्या।’ बहस दिलचस्प मोड़ पर आ गई थी... लेकिन तभी गार्ड सीटी मारता हुआ दूर से ही आकर विनती करने लगा... साहब हमारी नौकरी का सवाल है... हमें आरडब्लूए ने कहा है कि भीड़ जमा न होने दें, पार्क में लोग न आएं... प्लीज़ हमारी नौकरी पर बन आएगी।
जाहिर है हम मिडिल क्लास लोग बेवजह का पंगा नहीं चाहते... गुस्सा भले ही भरा हो, लेकिन खुद ही अपनी खीझ निकाल लेते हैं... धीरे*धीरे ये दिलचस्प डिस्कशन खत्म हो गया और लोग फिर अपने अपने घरों में सिमट-दुबक गए।
शायद ये कहानी ज्यादातर जगहों की है। कोरोना और लॉकडाउन के ‘राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय महत्व’ को देखते हुए मिडिल क्लास कुछ ऐसे ही जी रहा है। उसी पर देश की तथाकथित खराब या डूबती अर्थव्यवस्था का बोझ भी पड़ता है, नौकरियां भी उसी की जाती हैं, मौत का डर भी सबसे ज्यादा उसी को सताता है।
कोरोना से सबसे ज्यादा आतंकित भी वही है, सरकारी नियम कानून सब उसी के लिए हैं, सबसे ज्यादा और ईमानदारी से टैक्स भी वही भरता है, सबसे ज्यादा ईएमआई के जाल में भी वही है। वह कोई मेहुल चौकसी जैसे पक्के उद्योगपतियों की तरह तो है नहीं जिसके हजारों करोड़ के कर्ज सरकार चुटकियों में माफ कर देती है। उसे तो एक सामान्य पुलिस कांस्टेबल से भी डर लगता है और सरकारी नियमों और कानूनों का सबसे ज्यादा खौफ भी उसी को होता है। सबसे ज्यादा लाइन में भी वही खड़ा होता है और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए बनाए गए गोलों में भी वही खड़ा होता है।
ऐसे में अगर शोधकर्ता ये आंकड़े देते हैं कि 19 मार्च से 2 मई के बीच कोरोना के डर और लॉकडाउन की वजह से 338 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं तो ये एक गंभीर संकेत हैं। इन शोधकर्ताओं ने भी चंद अखबारों को तलाश कर ये आंकड़े जमा किए हैं जबकि असली संख्या कितनी है, ये अंदाजा आप लगा नहीं सकते। कितने तो ऐसे जो शरीर से नहीं, मन से मरते जा रहे हैं। आपकी कार्य क्षमता पहले से कितनी कम हो गई है इसका अंदाजा आपको नहीं है।
आपके पास कोरोना के अलावा और किसी तरह का न तो विषय बचा है और न ही जीवन का कोई रंग। सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर बनाए गए नियम कानूनों के तहत अब आप इतने असंवेदनशील बना दिए गए हैं कि किसी प्रियजन की मौत पर भी आप संवेदना जताने उसके घरवालों के करीब नहीं जा सकते, यहां तक कि आपके घर में भी अगर कोई गुज़र जाए तो आपके भीतर उसके गुजरने के गम से ज्यादा खुद को ‘इन्फेक्शन’ से बचाने का डर ज्यादा सताता है।
तो क्या ये डर आपको सचमुच किसी ‘जीत’ की ओर ले जाएगा ? क्या आप सचमुच डर डर कर जीने के आदी बना दिए गए हैं ? क्या आप सचमुच एक नई दुनिया में जीने के लिए तैयार कर दिए गए हैं जहां न तो सवाल उठाने की ताकत हो, न अपने हक की बात करने की हिम्मत, न ज़िंदगी का कोई रंग हो, न मनोरंजन का कोई सार्वजनिक साधन? यानी आपका जीवन सार्वजनिकता से निजता में सिमट गया हो। तो क्या अब आप सचमुच अरस्तू के सामाजिक सत्य की उस अवधारणा से कहीं ऊपर उठ चुके हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है?
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