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कोरोना डायरी-3: जो जहांं है, वहीं रहे, यही इलाज है..!

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महाराष्ट्र में स्थिति बिगड़ने की घोषणा होते ही रेल्वे स्टेशनों पर कोहराम मच गया। स्टेशन बंद करने पड़े। - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच एक अजीब सी होड़ मच गई है- 'घर' पहुंंचने की। घर मतलब मूल स्थान। अपना शहर। अपना गांंव। दिल्ली, मुंबई, नागपुर, पटना, अलीगढ़, बंगलुरू, हैदराबाद, भोपाल, रायपुर, जयपुर हर जगह यही हाल है।  महाराष्ट्र में स्थिति बिगड़ने की घोषणा होते ही रेल्वे स्टेशनों पर कोहराम मच गया। स्टेशन बंद करने पड़े। पुलिस के लिए हालात संभालना मुश्किल हो गया। 

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- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एकांत में रखे गए तीन छात्र भाग कर - जम्मू अपने घर पहुंंच गए। 
- संक्रमित पाए गए 8 मरीज दिल्ली से अगस्त क्रान्ति एक्सप्रेस से तेलंगाना पहुंंच गए! 
- गायिका कनिका कपूर लंदन से आने के बाद 'घर' गईं, पार्टी मनाई, होटलों में गई। 
- हवाई अड्डे पर पासपोर्ट जब्त कर एकांतवास के लिए जाने का आग्रह करने पर लोग अधिकारियों से ही झगड़ने लगे और अपने 'घर' जाने का आग्रह करने लगे। 

आखिर क्या होगा घर जाकर?  
क्या हमको पता भी है कि हम क्या कर रहे हैं? ये क्या पागलपन है? जो पॉज़िटिव पाए गए मरीज भाग रहे हैं या जो अपनी विदेश यात्रा छिपा रहे हैं वो तो अपराधी हैं हीं- जो संक्रमित नहीं हैं और घर की ओर भाग रहे हैं वो भी कम बड़ा गुनाह नहीं कर रहे हैं। आप जिस ट्रेन, बस या हवाई जहाज से जाएंंगे उसमें कौन संक्रमित है और कौन नहीं इसका आपको कुछ पता नहीं। इसका कोई तरीका भी नहीं। ऐसे में आप अपने साथ घर वालों के लिए भी इस संक्रमण के संभावित वाहक हो सकते हैं।

दरअसल, आप अपने साथ अपने प्रियजनों की और उस पूरे शहर, गांंव या कस्बे की जान खतरे में डाल रहे हैं- जहांं आप जा रहे हैं। अगर आपको इस बीमारी को रोकना है तो सही ये है कि आप जहांं हैं वहीं रहें। लॉकडाउन आपके घर जाने के लिए नहीं हुआ है। इस बीमारी को रोकने और इससे लड़ने के लिए हुआ है। 

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चीन संपूर्ण तालाबंदी के कारण ही इस महामारी को नियंत्रित कर पाया है। - फोटो : अमर उजाला
आप जहां हैं वहीं रहें, यही समाज और राष्ट्र के लिए बेहतर है 
इस भयानक महामारी से लड़ने में समाज और राष्ट्र के स्तर पर आपका सबसे बड़ा योगदान ये ही होगा कि आप जहांं हैं वहीं रहें, सुरक्षित रहें। 
जिनको वेबसाइट, अखबार और टेलीविजन पर मौजूद तमाम सूचनाओं के बाद भी इस महामारी की गंभीरता समझ नहीं आ रही वो इस समय जर्मनी में मौजूद उस युवा का वीडियो ज़रूर देख लें जो हमें चेता रहा है। समझा रहा कि भारत में इसकी गंभीरता अधिक क्यों हैं। 

तब भी नहीं समझ रहे तो उस चीनी पत्रकार का वीडियो ज़रूर देखें जो बता रहे हैं कि वो संपूर्ण तालाबंदी के कारण ही इस महामारी को नियंत्रित कर पाए हैं। वो साफ कह रहा है कि हमारी सख्ती को आप चाहे जिस रूप में देखें, उसकी आलोचना करें, हमें कोसें पर हमें ये करना पड़ा। क्योंकि इस बीमारी पर नियंत्रण का और कोई तरीका नहीं है। ये एक बहुत विचित्र परिस्थिति है। ये अभूतपूर्व है। इसलिए इससे निपटने के उपाय भी अभूतपूर्व ही होने चाहिए। बहुत अलग। बहुत सख्त। 

तो चीन के इस अनुभव से ही सबक ले लें 
चीन के लिए एक आसानी और थी। उन्हें इस बीमारी का केंद्र पता था। ये वुहान में शुरू हुआ। तो सबसे ज्यादा मेहनत वहीं करनी थी। वहांं से आगे बढ़ने से रोकना था। लेकिन इटली, स्पेन, अमेरिका या ब्रिटेन में ऐसा नहीं था। कोई एक केंद्र नहीं, इसीलिए स्थिति भयावह हो गई। भारत में तो ये 22 राज्यों के कई शहरों में पांंव पसार चुका है। कोई एक केंद्र नहीं।

हमारे सामाजिक ताने-बाने को देखते हुए हमारे यहांं स्थिति और भी गंभीर हो जाने की आशंकाएंं गलत नहीं हैं। बल्कि हम आंकड़े को तेजी से बढ़ता हुआ देख रहे हैं। पहले 50 संक्रमित मिलने में 40 दिन लगे थे। 200 से 250 तक पहुंंचने में केवल एक दिन। इसी से स्थिति की  भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। सो एक ही तरीका है। 22 मार्च का जनता कर्फ़्यू तो बस प्रतीक है। इसे गंभीरता से अपना कर ही हम इस बीमारी से लड़ सकते हैं। 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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