प्लेग से लाखों लोग मरे
सन् 1896 में जब बम्बई में प्लेग प्रकट हुआ तो उसके साथ ही इस बीमारी की बम्बई के बाद सूचनाएं अन्य बदंरगाह शहर, पुणे, कलकत्ता एवं करांची से आने लगीं। पहले साल तो महामारी बम्बई तथा उसके आसपास तक ही सीमित थी लेकिन दूसरे साल महामारी बंगाल, मद्रास, संयुक्त प्रान्त, मध्य प्रान्त, पंजाब, मैसूर, हैदराबाद और कश्मीर तक फैल ग जिसमें सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 20 लाख तक लोग मारे गए, लेकिन गैर सरकारी अनुमानों ने कहीं अधिक मौतों के संकेत दिए।
यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग होने के कारण ब्रिटिश सरकार पर इसे रोकने के लिये भारी दबाव था। वैसे भी उसे अपने अधिकारियों और सैनिकों की रक्षा की भी चिन्ता थी। इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1896 में प्लेग आयोग का गठन किया जिसकी राय थी कि इस अत्यन्त संक्रामक रोग के फैलने का मुख्य कारण लोगों का एक दूसरे से सम्पर्क है, जिसे तोड़ कर संक्रमण की चेन तोड़ी जा सकती है। इस प्रकार देश को 1897 को महामारी कानून मिला जिसका प्रयोग हर बीमारी के संकट में होता रहता है।
महामारी में मरते रहे लाखों लोग
इंपीरियल गजट ऑफ इंडिया के अनुसार वर्ष 1881-90 के बीच भारत की जनसंख्या 20,37,78,338 थी जबकि इस अवधि मेें हैजा, चेचक, ज्वर, अतिसार एवं अन्य बीमारियों से देश के विभिन्न हिस्सों में 49,86,950 लोग मारे जिनमें हैजा से मरने वालों की संख्या 3,06,518 एवं चेचक से मरने वालों की संख्या 1,22,772 थी। उस दौरान सबसे ज्यादा 33,59,927 लोग अकेले ज्वर से मरे थे। इसी प्रकार 1891-1900 के बीच 65,71,397 लोग विभिन्न व्याधियों से मरे जबकि उस दौरान देश की जनसंख्या 21,77,00,151 ही थी। उस दौरान हैजा से 4,50,502, चेचक से 82,588 ज्वर से 43,63,055 अतिसार या दस्त से 2,78,298 एवं अन्य रोगों से 13,96,936 लोग मरे। उस समय इन बीमारियों का असली कारण मालाबार, सूरत, कोचीन, कलकत्ता, मद्रास और बम्बई बंदरगाह शहरों के विकास एवं औद्योगीकरण से जनसंख्या का कुछ ही शहरों में बेतरतीव जमाव था।
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