कोरोना वायरस ने तेज़ी से भागती इस दुनिया को ठहर कर सोचने पर मजबूर कर दिया है।
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इसे विडंबना कहें या विरोधाभास
इसे विडंबना कहें या विरोधाभास - पर ये सब मौत की आहट के डर से हुआ। वरना इंसान की इस दौड़ती ज़िंदगी को यों थामना आसान नहीं था। एक विरोधाभास ये भी है कि जो रेल, बस, हवाई जहाज और कारखानों की चिमनी से निकलता धुआंं हमारे विकास का प्रतीक था आज उसे बंद कर वहांं पहुंचना पड़ रहा है, जहां से चले थे। इसके सही-गलत में पड़ने का ये वक्त नहीं है। बस फिलहाल ये ज़रूरी है।
क्या हम ऐसे ही बने रहे सकते हैं। लंबे समय तक नहीं। जो ताना-बाना हमने बुना है, उसका यों ध्वंस नहीं हो सकता। हम लड़ेंगे और जीतेंगे। पर हम खुद को फिर से भी रचेंगे। इस महामारी ने हमें ये भी सिखाया है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो रुक नहीं सकता या टल नहीं सकता। इस तूफान के थम जाने के बाद हमें अपनी जीवन शैली मैं आवश्यक बदलाव करने ही होंगे।
थमी और ठहरी हुई दुनिया
तो जो भी हो इस कोरोना वायरस ने तेज़ी से भागती इस दुनिया को ठहर कर सोचने पर मजबूर कर दिया है। जब जान पर बन आती है तो ही हम उन सवालों के जवाब गौर से समझ रहे होते हैं जो हमें पता होते हैं पर हम उनकी अनदेखी कर भागे चले जाते हैं।
ये आत्मचिंतन का सही समय है। वायरस तो आख़िर चला ही जाएगा, हम दवाई ढूंंढ़ ही लेंगे, सो वायरस भी चला जाएगा और डर भी पर कुछ ज़रूरी बदलाव बने रहें तो बेहतर। हांं, हम हमेशा खुलकर जी सकें, ये दुनिया इस लायक तो हमेशा रहे ये कामना ज़रूरी है।
ज़रूरी ये भी है कि हमें आत्मचिंतन के लिए इस तरह की महामारी की आवश्यकता ना रहे।
जनता कर्फ़्यू ने हमें एक ही दिन में शांति और उद्घोष के दो सिरे दिखाए हैं। इन दोनों का ही अपना महत्व है। सन्नाटे की अनुगूंंज से निकाला संकल्प हमें इस महामारी से लड़ने की शक्ति दे, यही प्रार्थना है।
चंचल हिरनी बनी डोलती
मन के वन में बाट जोहती,
वैसे तो वह चुप रहती है
भीतर एक नदी बहती है।
सन्नाटे का मौन समझती
इच्छाओं का मौन परखती
सांसों के सरगम से निकले
प्राणों का संगीत समझती
तन्वंगी, कोकिलकंठी है
पीड़ाओं की चिरसंगी है
अपने निपट अकेलेपन के
वैभव में वह खुश रहती है
भीतर एक नदी बहती है।
अभी कहां उसने जग देखा
किया पुण्य का लेखा-जोखा
अभी सामने सारा जीवन
उम्मीदों का खुला झरोखा
कुछ सपने उसके अपने हैं
महाकाव्य उसको रचने हैं
मन ही मन गुनती बुनती है
पर अपने धुन में रहती है
भीतर एक नदी बहती है।
शब्द शब्द हैं उसकी थाती
जिनसे लिखती है वह पाती
वह कविता के अतल हृदय में
बाल रही है स्नेहिल बाती
लता-वल्लरी-सी शोभन वह
इक रहस्य-सी है गोपन वह
किन्तु हुलस कर बतियाती वह
कभी-कभी सुख-दुख कहती है
भीतर एक नदी बहती है।
कविता- ओम निश्चल
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