कुछ जेलों में अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा भीड़ है।
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यह फैसला खास तौर पर इसलिए लिया गया है, क्योंकि इन पांचों जेलों में अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा भीड़ है और संक्रमण के आने का मतलब होगा स्थिति का पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर चले जाना। मजे की बात यह है कि महाराष्ट्र के इस प्रयोग को अब देश की कुछ ओर जेलें भी अपनाने का मन बना रही हैं। इनमें हरियाणा की जेल भी शामिल है।
महाराष्ट्र की जेलों से करीब 5000 लोगों को पैरोल पर रिहाई देने की कोशिश चल रही है। करीब तीन हफ्ते पहले महाराष्ट्र सरकार ने कोरोना वायरस के प्रकोप के मद्देनजर राज्य की जेलों में सात साल अथवा उससे कम की कैद की सजा काट रहे 11000 कैदियों को पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया था।
इसके तहत विचाराधीन कैदियों को जमानत देने तथा निर्धारित सजा से अधिक काट चुके लोगों को पूर्णत: रिहा करने पर विचार किया जा रहा है। गृह मंत्रालय ने पहले ही महाराष्ट्र के नौ केंद्रीय कारागारों (मुंबई, ठाणे, खारघर, नासिक, पुणे, औरंगाबाद, कलंबा, अमरावती और नागपुर) को भारी भीड़ के कारण कैदियों को स्थानांतरित करने के लिए कह दिया था।
यह निर्धारित करने के लिए कि किस श्रेणी के कैदियों को पैरोल या अंतरिम जमानत पर रिहा किया जा सकता है, राज्य के गृह मंत्रालय ने एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति नियुक्त की है, जिसमें राज्य विधिक सेवा समिति, प्रमुख सचिव (गृह) और महानिदेशक (कारागार) शामिल हैं।
भारत की जेलों में करीब 114 प्रतिशत की ओवरक्राउडिंग है।
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भारत की जेलों में करीब 114 प्रतिशत की ओवरक्राउडिंग है और साथ ही कम से कम 33 प्रतिशत स्टाफ की कमी भी। ऐसे में जेलों के लिए सतर्कता बरतना बेहद जरूरी है, क्योंकि भीड़ भरी जेल में वायरस का आने का मतलब यह है कि पूरी जेल तुरंत उससे प्रभावित हो सकती है। ऐसा होना बेहद खतरनाक होगा।
सुनील रामानंद की इस कोशिश से चार बातें सामने आती हैं। एक, कोरोना से निपटने को लेकर जेलों की तत्परता और तैयारी, दूसरे समय के अनुरूप सूझबूझ। तीसरे, भीड़ से ठसाठस भरी जेलों को लेकर ढीली कानूनी प्रक्रिया और चौथे, जेल अधिकारियों और स्टाफ की खुद को ही जेल में बंद कर लेने की मजबूती।
कोरोना को लेकर पूरी दुनिया की चिंताओं के बीच जेलें पहले की ही तरह अपने कर्म मे जुटी हैं। जरा उस भाव को सोचिए जिससे जेल के यह अधिकारी और स्टाफ खुद ही जेल के अंदर बंद होने के लिए राजी हो गए होंगे तकि रोज की आवाजाही से बंदियों में वायरस आने का कोई खतरा न पनपे।
कई जेलों ने इस दौर में शानदार मिसालें कायम की हैं। वे अनकही न रह जाएं, इसलिए देश की जेलों को समर्पित तिनका-तिनका अभियान इन कोशिशों को आपस में बांधने के प्रयास में जुट गया। ऐसा लगता है कि कोरोना को हराने में सिर्फ बाहर की दुनिया नहीं, बल्कि जेल की दुनिया भी पूरी तैयारी कर चुकी है।
(डॉ.वर्तिका नन्दा जेल सुधारक हैं। वे देश की 1382 जेलों की अमानवीय स्थिति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई का हिस्सा बनीं।
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