कोरोना से अनाथ हुए बच्चों को लेकर सरकार को आगे आना होगा।
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सरकारों की सहायता कितनी प्रभावी?
इस दिशा में सरकार और राज्य सरकारों ने कुछ जरूरी और महत्वपूर्ण कदम तो उठाएं हैं लेकिन क्या वे काफी हैं? कोरोना ने बच्चों की दुनिया को अनाथ, भयाक्रांत और असामाजिक कर दिया है। ऐसे में सरकारों के प्रयास किस स्तर पर प्रभावी होंगे यह देखने वाली बात होगी। हालांकि सरकार ने वयस्क होने तक मासिक भत्ता की हो या फिर निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की है, लेकिन जमीन यह कितने प्रभावी हैं यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
इधर कोरोना ने बच्चों की हरी भरी दुनिया उजाड़ दी। कई बच्चों के अभिभावक नहीं रहे तो ऐसे में राज्य सरकारों ने उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेने की बात कही है। हालांकि यह पर्याप्त नहीं है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर बताया है कि कोरोना की इस दूसरी लहर ने देश में अब तक 577 बच्चों के सिर से माता-पिता का साया छिन लिया है। मसलन यह सरकारी आंकड़े हैं, वास्तविक स्थिति इससे भी भयानक हो सकती है।
अनाथ बच्चों को चिन्हित कर योजनाओं को पहनाया जाए अमलीजामा
जब देश के ज्यादातर राज्यों ने कोरोना महामारी के प्रकोप से अनाथ हुए बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कई घोषणाएं की हैं। ऐसे में सरकारों की पहली प्राथमिकता ऐसे बच्चों को चिन्हित कर उन्हें इन योजनाओं और घोषणाओं से जोड़ने की होनी चाहिए। सरकारों द्वारा ऐसे स्पेशल टास्क फोर्स का गठन होना चाहिए जो यह सुनिश्चित करें कि इन कल्याणकारी योजनाओं का जमीनी स्तर पर सही अमलीजामा पहनाया जा रहा है।
स्पेशल टास्क फोर्स रखे बच्चों के सर्वांगीण विकास पर नजर
बच्चों के लिए बनी स्पेशल टास्क फोर्स को यह दायित्व भी सौंपना चाहिए कि वह निरंतर ऐसे बच्चों के सर्वांगीण विकास पर अपनी नजर बनाए रखे और एक निर्धारित समय पर इसकी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को भेजती रहे। इससे सरकार हर बच्चे की प्रगति से अवगत होती रहेगी। साथ ही अगर किसी मामले में जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता होगी तो बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए वह कदम उठा सकती है।
बच्चों के पुनर्वास और उनको सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए कार्य करना होगा।
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किशोरावस्था के बच्चों की हो काउन्सलिंग
ऐसे अनाथ बच्चे जो किशोरावस्था में हैं। वे अपने माता-पिता को खो कर एक 'ट्रॉमा' में जी रहे होंगे। ऐसे बच्चों को आवश्यक रूप से काउन्सलिंग करने की आवश्यकता है। सरकारों द्वारा इस दिशा में कदम उठाना जरूरी हो गया है। इन बच्चों के लिए बिना समय गंवाए कॉउंसेलरों की व्यवस्था की जानी चाहिए। जिससे उन्हें जो मानसिक आघात पहुंचा है उससे उन्हें उबारा जा सके।
सरकार और एनजीओ मिल कर करें काम
बच्चों के पुनर्वास और उनको सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए दोनों (सरकार और एनजीओ) अगर एक साथ काम करें तो सकरात्मक और प्रभावी नतीजे देखने को मिल सकते हैं। देश में लाखों एनजीओ हैं बस उन्हें लामबंद और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
नोबेल पुरस्कार विजेता एवं बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने हाल में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के 74वें सम्मेलन में कहा कि कोरोना महज स्वास्थ्य व आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि यह न्याय, सभ्यता और मानवता का संकट है। महामारी ने दुनिया में जो तबाही मचाई है, उससे बच्चों को बचाने के लिए हमें उन्हें साथ में लेना ही होगा।
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