गाना रिलीज़ होने से लेकर अब तक शेरू के लिए लगातार फोन आ रहे हैं।
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शेरू की कहानी, जेल में आने से पहले की ज़िंदगी की उलझनों की कहानी है। जेल में आने के बाद बहुत दिनों तक उसे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वह जेल में अपने समय को कैसे काटेगा। उसने साढ़े तीन साल गुमनामी में काटे लेकिन बाकी के साढ़े छह साल ऐसे नहीं होंगे। वह जेल के रेडियो में जॉकी के तौर पर अपनी जिंदगी की नई कही लिखेगा। कहानी का एक हिस्सा यह भी हो सकता है कि अब यह रेडियो उसे एक नई पहचान देगा। उसका वो गांव, जिसके परिचय को वो भूलने लगा था अब जानेगा कि शेरू जब जेल से बाहर निकला, तो वह गायक था और था - एक रेडियो जॉकी।
गाना रिलीज़ होने से लेकर अब तक शेरू के लिए लगातार फोन आ रहे हैं। बहुत से लोग शेरू से मिलना चाहते हैं। हाल में अंबाला की सीजेएम शेरू से मिलने जेल में पहुंची। जेल के रेडियो के कमरे से ही उन्होंने शेरू और बाकी बंदियों को अपना संदेश दिया जिसमें कहा गया कि प्रशासन, कानून और फाउंडेशन तीनों यह चाहते हैं कि शेरू की तरह बाकी बंदियों की प्रतिभा भी सबके सामे आए।
वैसे मज़े की बात यह भी है कि शेरू ने बाहर की दुनिया में कोरोना की हो रही हलचल को अपनी आंखों से देखा भी नहीं है, क्योंकि इस पूरे दौर में वह जेल के अंदर ही रहा है। इसलिए यह महसूस करना भी काफी संवेदना जताता है कि जेल के अंदर हुए एक बंदी ने बाहर के लोगों की सुरक्षा और एहतियात के लिए कुछ सोचा है। इसे पलटकर ऐसा भी सोचा जा सकता है कि बाहर के लोग कितनी आसानी से उन लोगों को भूल जाते हैं जो इस समय जेल के अंदर हैं।
बहरहाल जेल का रेडियो अब सिर्फ आवाज़ का रेडियो नहीं है। अब वह सरोकार का रेडियो भी बन गया है। अंबाला की ही जेल से बंदियों को जेल रेडियो के जरिए कोरोना को लेकर टीके लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। पहले जो बंदी टीका लगाने में हिचकिचा रहे थे, अब खुलकर सामने आ रहे हैं।
जेल का रेडियो कानून का सलाहकार बन रहा है और बंदियों के अवसाद में कमी लाने के लिए पूरी तरह से कारगर सिद्ध हो रहा है। यह आवाज़ें सीखचों के अंदर हैं। बाहर की दुनिया यह सुन नहीं सकती कि जेल के बंदी रेडियो पर क्या और कैसे कहते हैं और मेरा ख्याल है कि इसी में काफी हद तक भलाई भी है, क्योंकि कम से कम कोई ऐसी जगह बाकी होनी चाहिए जो पूंजी के दबावों से दूर हटकर अपने छोटे से दायरे में अच्छी नीयत के साथ काम रहा हो।
यह सिर्फ एक शुरुआत है। हरियाणा की 19 में से 12 जेलों में रेडियो का काम अपनी गति से चल रहा है। 47 बंदी रेडियो जॉकी बन चुके हैं। वे तिनका तिनका के जेल पत्रकार हैं। इन सबके पास कलम, कागज और आवाज है। आजादी की कमी के बावजूद इन बंदियों ने अपने लिए एक टुकड़ा आकाश बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।
(डॉ. वर्तिका नन्दा जेल सुधारक हैं। वे देश की 1382 जेलों की अमानवीय स्थिति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई का हिस्सा बनीं। जेलों पर एक अनूठी श्रृंखला- तिनका तिनका- की संस्थापक। दो बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल। तिनका तिनका तिहाड़ और तिनका तिनका डासना- जेलों पर उनकी चर्चित किताबें। 2019 में आगरा की जिला जेल और 2021 में हरियाणा के में रेडियो की शुरुआत की।)
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