क्या चुनावी दल आगामी चुनावों के लिए डिजिटल रैलियां आयोजित करने पर राजी होंगे?
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दुनिया में आज लोकतंत्र को सबसे बेहतर शासन प्रणाली मानी जाता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा शासन कहा है। जॉर्ज बर्नार्ड शां भी कहते हैं कि-लोकतंत्र एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसका लक्ष्य अधिक से अधिक लोगों का कल्याण करना है।
लेकिन इधर आज साफ दिख रहा है कि हमारे यहां लोकतंत्र व्यापक जन कल्याण से इतर भी कुछ है। जहां सत्ता हासिल करने की जल्दबाजी में जिंदगियों को बर्बाद करने में हमें कतई गुरेज नहीं है। वैसे भी दुनिया की निगाह में भारत का लोकतंत्र महज चुनावी तंत्र में तब्दील होकर रह गया है।
अमेरिकी लोकतंत्र के सेहत को लेकर भी अब सवाल उठने लगा है। हाल में 'समिट ऑफ डेमोक्रेसी' के एक समारोह में एक सौ ग्यारह देशों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति जॉन बिडेन ने कहा कि" लोकतंत्र कोई हादसा नहीं है। हमें हर पीढ़ी के साथ बदलना होता है। यह हमारे वक्त की सबसे बड़ी चनौती है।"
पिछले 6 जनवरी को जिस तरह डोनल्ड ट्रम्प के समर्थकों ने हार को अस्वीकार करते हुए तरह तोड़फोड़ मचाई, उससे दुनिया के कई देशों में अमेरिकी लोकतंत्र की सेहत को लेकर चिंतित होना बिल्कुल स्वाभाविक है।
सभी दलों को बीते साल के चुनावों से कुछ सबक सीखना होंगे?
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इस गौरवशाली लोकतंत्र के बदौलत ही अमेरिकी दूसरे देशों को मानवाधिकार और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता रहा है। 'वॉशिंगटन पोस्ट' अखबार और 'मेरीलैंड यूनिवर्सिटी 'के एक हालिया सर्वे में यह तथ्य उजागर हुआ है कि-अपने लोकतंत्र प्रति अमेरिकियों में जो गौरव भाव सन् 2002 में 90% था, उसके मुकाबले अब गिरकर 54% रह गया है। फिर कोरोना काल में ही अमेरिका में अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड के साथ बरती गई पुलिसिया जुल्म को भी दुनिया ने देखा ही है। अपने देश में लॉक डाउन के दौरान उस औरत की तस्वीर भी लोगों के जेहन में अभी जिंदा ही है- जब आने-जाने पर पाबंदी लगा दी गयी। जहाज-ट्रेन- बस के पहिये थम गए।
एक महिला कैसे जान बचाने की गरज से एक बच्चे को गोद में उठाये, दूसरे बच्चे को पहियेदार अटैची पर लिटाये अपने गांव की ओर चल पड़ी। शहरों से गांव पहुंचे कामगार-मजदूर भी अपनों के बीच कितने बेगाने हो गए थे? ये सब घटनाएं हमारी स्मृतियों में ताजी हैं। फिर भी हम सबक लेने को तैयार नहीं। शायद ऐसे ही वक्त को याद करते हुए "मुक्तिबोध के मेहतर" शीर्षक कविता में कवि पराग पावन हमें आगाह करते है कि-
कत्लेआम के इस मुल्के- ए- मंजर में खबर रहें/
लोगों को /कि हम दरकेंगे/चिटकेंगे/ टूटेंगे/ बिखरेंगे/
मिट्टी में मिट्टी बनकर एक दिन हमेशा गायब हो जाएंगे।
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