महासागरों के बहुत छोटे हिस्से में फैली प्रवाल भित्तियां दुनिया में सबसे अधिक जैव विविधता वाला समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र हैं। एक स्वस्थ प्रवाल भित्ति में मछली की करीब चार हजार और प्रवाल की आठ सौ प्रजातियां निवास करती हैं। इसके अलावा, ये लगभग 25 प्रतिशत समुद्री जीवों को अपने जीवन के किसी न किसी चरण में आश्रय देती हैं।
देश का पहला राष्ट्रीय प्रवाल भित्ति अनुसंधान संस्थान दक्षिणी अंडमान के चिड़ियाटापू में स्थापित होने जा रहा है। इसका मुख्य ध्येय देश के तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में स्थित प्रवाल भित्तियों का अध्ययन, निगरानी और शोध करने के साथ-साथ उन्हें संरक्षित करना भी है। इस संस्थान की स्थापना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने प्रवाल भित्तियों को जलवायु परिवर्तन के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों में माना है, जबकि यूनेस्को ने चेताया है कि मौजूदा उत्सर्जन परिदृश्य में विश्व धरोहर सूची में शामिल सभी प्रवाल भित्तियों के इस सदी के अंत तक विलुप्त होने का खतरा है।
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प्रवाल या मूंगा दुनिया के महासागरों के खारे पानी में पाए जाते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी प्रवाल-भित्ति प्रणाली प्रशांत महासागर में स्थित ग्रेट बैरियर रीफ है, जो 2,300 किमी से भी ज्यादा लंबी है। भारत में ये भित्तियां मुख्यतः चार क्षेत्रों-अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, कच्छ की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी में पाई जाती हैं। इनका निर्माण मुख्य रूप से छोटे प्रवाल जीवों, यानी पॉलीप द्वारा स्रावित कैल्शियम कार्बोनेट के कठोर कंकालों के लंबे समय तक जमा होने से होता है। ये लगभग 25 प्रतिशत समुद्री जीवों को अपने जीवन के किसी न किसी चरण में आश्रय देती हैं। वहीं, यूएनईपी के अनुसार, लगभग 50 करोड़ लोग अपनी भोजन, आय और तटीय सुरक्षा के लिए प्रवाल भित्तियों पर निर्भर हैं। एक स्वस्थ प्रवाल भित्ति में मछली की करीब चार हजार और प्रवाल की आठ सौ प्रजातियां निवास करती हैं। महासागरों के बहुत छोटे हिस्से में फैली प्रवाल भित्तियां दुनिया में सबसे अधिक जैव विविधता वाला समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं होने पर आने वाले दशकों में इनका बड़े पैमाने पर क्षरण हो सकता है। हालांकि, रीफ-2050 योजना के तहत ऑस्ट्रेलिया में इन भित्तियों को बचाने के प्रयास जारी हैं। वहीं यूनेस्को के सहयोग से शुरू हुआ ‘सहन सक्षम भित्ति कार्यक्रम’ प्रवाल भित्तियों के संरक्षण पर बल देता है। 2020 में गठित ‘वैश्विक प्रवाल भित्ति कोष’ का लक्ष्य अगले 10 वर्षों में प्रवाल भित्तियों के संरक्षण हेतु 4,350 करोड़ रुपये जुटाना और निवेश करना है। निश्चित रूप से राष्ट्रीय प्रवाल भित्ति अनुसंधान संस्थान की स्थापना से प्रवाल भित्तियों के संरक्षण को सुनिश्चित करने में बल मिल सकता है।