किसी नाबालिग पीड़िता के आरोपों के खिलाफ इस तरह की टिप्पड़ियों के बाद महसूस होता है कि ‘ पॉक्सो कानून’ आखिर बना ही क्यों? बाल यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय ने साल 2012 में पॉक्सो एक्ट बनाया था।
“पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे पुलिया के नीचे खींचकर ले जाने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते।” इलाहबाद हाईकोर्ट
अब एक और टिप्पणी आई है। किसी नाबालिग पीड़िता के आरोपों के खिलाफ इस तरह की टिप्पड़ियों के बाद महसूस होता है कि ‘ पॉक्सो कानून’ आखिर बना ही क्यों? बाल यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय ने साल 2012 में पॉक्सो एक्ट बनाया था। जिसका पूरा नाम प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट है। इस कानून के जरिए नाबालिग बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे यौन अपराध और छेड़छाड़ जैसे मामलों में कार्रवाई की जाती है।
इस कानून को बनाने का उद्देश्य नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों को रोकना और इस तरह के अपराधियों को कड़ी सजा दिलवाना था। ताकि भविष्य में अपराधी बच्चों को कुत्सिक इरादों का शिकार ना बना सके। बचपन में हुआ यौन हमला मानसिक और भावनात्मक रूप से बहुत तोड़ देता है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह कहना कि पीड़िता के प्राइवेट पार्ट को पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ देना या उसे पुलिया के नीचे खींचकर लेकर जाने की कोशिश करना बलात्कार या बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता...पीड़ित नाबालिगों के हौंसले पस्त करने वाला है।
कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी 2022 को अपने बेटी के साथ हुए यौन हमले की शिकायत निचली अदालत में दर्ज करवाई थी। शिकायत में कहा था कि गांव के तीन युवकों ‘पवन, आकाश और अशोक’ ने बेटी को बाइक से घर छोड़ने की बात की। रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के स्तनों को छूने की कोशिश की। उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए पायजामे का नाड़ा तोड़ दिया।
लड़की की चीख-पुकार सुनकर वहां से गुजर रहे सतीश और भूरे ने लड़की को बचाने की कोशिश की तो आरोपी उन्हें देसी तमंचा दिखाकर भाग गए। नाबालिग के अभिभावक पुलिस के पास गए। वहां पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की तो उन्होंने अदालत का रुख किया। निचली अदालत ने आरोपियों के खिलाफ समन जारी किया। समन में पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 ( अपराध करने का प्रयास ) औऱ धारा 376 के अंतर्गत जांच करने का निर्देश दिया गया था। जिसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी।
केवल यह तथ्य कि अभियुक्तों ने पीड़िता के स्तनों को पकड़ लिया या पायजामे की डोरी तोड़ दी, और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की। लेकिन कुछ लोगों के हस्तक्षेप पर वे भाग निकले। यह अपने आप में बलात्कार के प्रयास का मामला नहीं बनता। ”
यह टिप्पणी अपने आप में काफी विचलित करने वाली है। इससे पीड़िताओं के हौंसले कमजोर होंगे। वे अपराध के खिलाफ आवाज उठाने से पहले कई बार सोचेंगी कि उनकी शिकायत की सुनवाई होगी भी या नहीं। माननीय अदालतों को ऐसी टिप्पणी करने से पहले मानवीय होना बेहद जरूरी है।