भारतीय संविधान की प्रस्तावना
- फोटो : istock
न्याय की गारण्टी तो है मगर न्याय कहां?
संविधान में हमें न्याय की गारंटी अवश्य दी है, लेकिन आम आदमी को संविधान लागू होने के 71 साल बाद भी यह गारण्टी आसानी से हासिल नहीं हो पाती। न्याय को तीन विभिन्न रूपों में देखा जा सकता है- सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय एवं आर्थिक न्याय।
सामाजिक न्याय से अभिप्राय है कि मानव-मानव के बीच जाति, वर्ण के आधार पर भेदभाव न माना जाए और प्रत्येक नागरिक को उन्नति के समुचित अवसर सुलभ हो। अदालतों पर वादों के बोझ के कारण न्यायार्थी को न्याय पाने में लम्बा समय लग जाता है और विलंबित न्याय का मतलब न्याय से वंचित होना ही है। आम आदमी के लिए न्याय बहुत महंगा होने के कारण वह अक्सर न्याय से वंचित हो जाता है। जबकि साधन सम्पन्न और ऊंची पहुंच वाले लोग आसानी से न्याय पा भी लेते हैं और महंगे वकील रख कर मुकदमों की दिशा पलट भी लेते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार दंगों के मामले में केवल 29 प्रतिशत को ही सजा हो पाती है। इसी प्रकार बलात्कार के मामलों में 29 प्रतिशत और हत्या के मामलों में केवल 41 प्रतिशत को सजा हो पाती है। इसका मतलब साफ है, कुल 59 प्रतिशत हत्या के मामलों में न्याय नहीं मिलता। इसी प्रकार 71 प्रतिशत बलात्कर के मामलों में भी न्याय नहीं मिल पाता।
समानता की गारंटी पंहुच वाले वर्ग की बंधक
भारतीय संविधान की प्रस्तावना हर नागरिक को स्थिति और अवसर की क्षमता प्रदान करती है जिसका अभिप्राय है समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेषाधिकार की अनुपस्थिति और बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समान अवसर प्रदान करना। सवाल उठता है कि क्या सचमुच समाज के गरीब, पिछड़ों और दलितों को हर क्षेत्र में समानता हासिल है?
प्रगति के अवसरों पर मुट्ठीभर लोग कुण्डली मारे बैठे हैं। समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस का सिद्धान्त प्रभावी है। तरक्की और आजीविका के अवसर ऊंची पहुंच वालों या उन अवसरों को खरीदने में सक्षम लोगों के लिये सुरक्षित हो गए हैं। गरीब का बेटा चाहे कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, उसकी प्रतिभा पहुंच वाले के नालायक बेटे के समक्ष बौनी है। हमारे देश में तो भगवान के दरबार में तक समानता नहीं है। गरीबों को भगवान के दरबार में धक्के खाने पड़ते हैं जबकि बड़े लोगों के लिये रेड कारपेट बिछाई जाती है।
बन्धुत्व भी रिस्क पर, राजद्रोह की तलवार आजादी पर
प्रस्तावना में बंन्धुत्व का भी उल्लेख किया गया है ताकि हमारी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता मजबूत बनी रहे। इसमें पहली बात व्यक्ति का सम्मान और दूसरी देश की एकता और अखंडता। मौलिक कर्तव्य में भी भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट एकानेक बार कह चुका है कि आइपीसी की धारा 124-ए का खुले आम दुरुपयोग हो रहा है। इससे देश में सरकार के विरोध को राजद्रोह मान कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है। जबकि यह कानून अंग्रेजों ने अपने उपनिवेशवादी शासन को बचाने के लिये बनाया था। इस कानून को समाप्त करने पर विचार तक नहीं हो रहा है।
हम भारत के लोग का अभिप्राय एक धर्म से नहीं
प्रस्तावना संविधान की शुरुआत है और इस शुरुआत की शुरुआत भी ’’हम भारत के लोग’’ से होती है। हम शब्द का अभिप्राय किसी एक धर्म या जाति से नहीं बल्कि इस देश में निवास करने वाले हर एक धर्मावलम्बी और जाति से है। संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 ( धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) जोड़े गए। हमारे देश में सभी धर्म समान हैं और उन्हें सरकार का समान समर्थन प्राप्त है। लेकिन राजनीतिक सत्ता को धर्म के नाम पर जिस तरह प्रभावित किया जा रहा है, उससे हमारे संविधान की मूल भावना को चोट पहुंच रही है। अगर विकास के मुद्दों के बजाय धर्म के नाम पर वोट मांगे जायेंगे और धर्म के आधार पर ही सरकारें बनेंगीं तो संविधान में उल्लिखित शब्द ‘धर्म निरपेक्ष’ का कोई मतलब नहीं रह जायेगा।
समाजवादी शब्द भी हो रहा धुंधला
इस भावना के प्रबल होते जाने से अल्पसंख्यक स्वयं को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने को मजबूर हो रहे हैं। जबकि हमारे शासन विधान की धर्मरिपेक्षता और समानता के कारण ही हमारी विश्व में प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता है। इसी प्रकार संविधान में उल्लिखित समाजवाद का शब्द भी दांव पर है।
समाजवादी शब्द का आशय यह है कि ‘ऐसी संरचना जिसमें उत्पादन के मुख्य साधनों, पूंजी, जमीन, संपत्ति आदि पर सार्वजनिक स्वामित्व या नियंत्रण के साथ वितरण में समतुल्य सामंजस्य हो। पूंजीपतियों पर निरन्तर बढ़ती जा रही निर्भरता भी संविधान के कुछ मूल तत्वों से भटकाने का ही संकेत है। उत्पादन में जोखिम, भूमि और पूंजी के समान ही श्रम का महत्व होता है। लेकिन श्रम शक्ति को सम्मान देने के बजाय पूंजी का गुलाम बनाया जा रहा है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।