बेहतरीन हस्तलेखन का नमूना भी है संविधान
विश्व का इतना विस्तृत संविधान लिखित होने के साथ ही यह हाथ से लिखा हुआ है और लिखावट भी अपने आप में कलाकारी का एक अ़िद्वतीय नमूना है। संविधान की असली प्रतियां हिंदी और अंग्रेजी, दो भाषाओं में लिखी गई थीं जो देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंडिया प्रेस में छपी थीं। मूल प्रति आज भी भारत की संसद में हीलियम भरे डिब्बों में सुरक्षित रखा गया है। इस प्रति को अब नए संसद भवन में प्रतिस्थापित कर दिया गया है। इतने बड़े संविधान को कलात्मक ढंग से लिखने का श्रेय प्रेम बिहारी नारायण रायजादा को जाता है।
नन्दलाल को मिला संविधान की प्रति सजाने का अवसर
भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रों से सजाने का मौका विख्यात चित्रकार नंदलाल बोस को मिला। यह मूल प्रति बेहतरीन कैलीग्राफी के जरिए इटैलिक अक्षरों में लिखी गई है। इसके हर पन्ने को शांतिनिकेतन के कलाकारों ने सजाया था। नन्दलाल बोस 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे। नेहरू जी उनकी कला से इतने प्रभावित थे कि उन्हें भारत के भविष्य को संवारने वाले संविधान की प्रति को संवारने का अवसर दे दिया।
दरअसल कानूनविदों ने भरत के शासन विधान को तय करने के लिए संविधान का मसौदा तो तैयार कर लिया था लेकिन उस संविधान में भारत की सांस्कृतिक विधिता, विकास की यात्रा और इसके गौरवमयी अतीत की छाप डालनी अभी बाकी थी। इसी लिए कला मर्मज्ञ नन्दलाल ने संविधान के 22 भागों की शुरुआत में 8 गुणा 13 इंच के चित्र बनाए। वास्तव में ये चित्र भारतीय इतिहास की विकास यात्रा हैं। जिनकी शुरुआत भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक की लाट से होती है।
भारत के अतीत का प्रतिबिम्ब भी है संविधान की प्रति में
संविधान की प्रस्तावना को सुनहरे बार्डर से घेरा गया है, जिसमें घोड़ा, शेर, हाथी और बैल के चित्र बने हैं। ये वही चित्र हैं, जो हमें सामान्यतः मोहन जोदड़ो की सभ्यता के अध्ययन में दिखाई देते हैं। भारतीय संस्कृति में शतदल कमल को भी नंदलाल ने जगह दी है। इन फूलों को समकालीन लिपि में लिखे हुए अक्षरों के घेरे में रखा गया है। अगले भाग में मोहन जोदड़ो की सील दिखाई गई है। उससे आगे वैदिक काल के प्रतीकों से शुरुआत होती है। मूल अधिकार वाले भाग की शुरुआत त्रेतायुग से की गई है। नीति निर्देशक तत्व वाले अगले भाग में कृष्ण के गीता उपदेश की तस्वीर को उकेरा गया है। भारतीय संघ नाम के पाचवें भाग में भगवान गौतम बुद्ध की जीवन यात्रा से जुड़ा एक दृश्य है। अगले भाग में संघ और उनका राज्य क्षेत्र-1 में भगवान महावीर को समाधि की मुद्रा में दिखाया गया है। आठवें भाग में गुप्तकाल से जुड़ी एक कलाकृति को उकेरा गया है।
भारत की सांस्कृतिक विविधता की छाप
दसवें भाग में गुप्तकालीन नालंदा विश्वविद्यालय की मोहर दिखाई गई है। संविधान के 11वें भाग से मध्यकालीन इतिहास की शुरुआत होती है और बारहवें भाग में नटराज की मूर्ति बनाई गई है। तेरहवें भाग में महाबलिपुरम मंदिर पर उकेरी गई कलाकृतियों को दर्शाया गया है। 14वां भाग केंद्र और राज्यों के अधीन सेवाएं। इस भाग में मुगल स्थापत्य कला को जगह दी गई है। जिसमें बादशाह अकबर और उनके दरबारी बैठे हुए हैं। मूल संविधान में 15वां भाग चुनाव है। इस भाग में गुरु गोविंद सिंह और शिवाजी को दिखाया गया है।
भारत के इतिहास का अक्श भी नजर आता है
संविधान की इस कला यात्रा के 16वें भाग से ब्रिटिश काल शुरू होता है। टीपू सुल्तान और महारानी लक्ष्मी बाई को ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेते हुए दिखाया गया है। 17वें भाग जो कि मूल संविधान में आधिकारिक भाषाओं का खंड है, में गांधी जी की दांडी यात्रा को दिखाया गया है। अगले भाग में महात्मा गांधी की नोआखली यात्रा से जुड़ा चित्र है। 19वें भाग में नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज का सैल्यूट ले रहे हैं। 20वें भाग में हिमालय के उत्तंग शिखरों को दिखाया गया है। अंतिम भाग में समुद्र का चित्र है। चित्र में एक विशालकाय पानी का जहाज है, जो हमारे गौरवशाली सामुद्रिक विस्तार और हमारी यात्राओं का प्रतीक है।
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