इस चुनाव का रोचक पक्ष यही है कि थरूर ने अध्यक्ष चुनाव के बहाने ही सही, आला कमान संस्कृति पर सवाल उठाने की हिम्मत तो दिखाई।
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उधर खडगे अपने प्रतिद्वंद्वी थरूर के साथ किसी भी तरह के विवाद या बहस से बच रहे हैं। वैसे भी जब ज्यादातर वोट उनके पक्ष में ही पड़ना है तो बेवजह किसी विवाद में क्यों पड़ना। हालांकि दोनो प्रत्याशी चुनाव प्रचार के लिए राज्यों में भी जाने वाले हैं। लेकिन वहां भी सारी स्क्रिप्ट पहले से तय है।
खडगे और थरूर के बीच इस मुकाबले को लोग अलग अलग नजरों से देख रहे हैं। कुछ लोगो का मानना है कि यह कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी और प्रियंका की लड़ाई है तो कुछ लोग नई और पुरानी पीढ़ी के द्वंद्व के रूप में इसे देख रहे हैं।
दलित होना कांग्रेस के लिए एक प्लस प्वांइट
माना यह भी जा रहा है कि थरूर की संभावित हार कांग्रेस के बागी जी 23 ग्रुप के हौसलों में आखिरी कील होगी। जहां थरूर कांग्रेस के चरित्र में आमूल बदलाव की बात रहे हैं वहीं खडगे का रोड मैप अभी साफ नहीं है, लेकिन वो यथास्थितिवाद पर ही ज्यादा भरोसा करेंगे। उनका दलित होना कांग्रेस के लिए एक प्लस प्वांइट हो सकता है, लेकिन खडगे ने दलितों की राजनीति कभी की नहीं। इसलिए जातीय समीकरण से उनको बहुत फायदा होगा, ऐसा नहीं लगता।
खडगे कर्नाटक से हैं, लेकिन उस उत्तर भारत में उनकी कोई खास पहचान नहीं है, जहां कांग्रेस को सबसे ज्यादा मजबूती की दरकार है और जहां से ज्यादा सीटें जीतना ही दिल्ली में सरकार बनाने की चाबी है। वैसे थरूर भी कोई जन नेता नहीं हैं, लेकिन उनका अपना एक विजन और आकर्षण है। लेकिन उनका ऊंची जाति से होना पार्टी को जातिगत रूप से फायदेमंद साबित नहीं होगा।
दिग्विजयसिंह अच्छा विकल्प हो सकते थे?
कुछ जानकारों का मानना है कि कांग्रेस को मैदानी लड़ाई के लिए तैयार करने की दृष्टि दिग्विजयसिंह एक अच्छा विकल्प हो सकते थे। लेकिन पार्टी में उनके दुश्मनों ने आला कमान को भर दिया कि दिग्विजय को आगे करने का सीधा मतलब है िक हिंदू विरोध का झंडा हाथ में लेना। दरअसल, दिग्विजय सिंह के समय समय पर दिए गए गैर जिम्मेदाराना बयान ही उनके खिलाफ गए बावजूद इसके कि जमीनी राजनीति की उनकी समझ गहरी है।
उधर मीडिया से बातचीत में थरूर ने दावे के साथ कहा कि वे पार्टी के ‘हाईकमान कल्चर को बदलेंगे। अगर वो अध्यंक्ष बने तो पार्टी एक वाक्य में यह कहते हुए प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती है कि कांग्रेस अध्यक्ष फैसला करेंगे। मैंने पार्टी कार्यकर्ताओं से बात की थी और मैंने ही विकेंद्रीकरण के विचार उठाया था।
इस बयान को जरा राजस्थान में विधायकों की आला कमान के प्रति बगावत के संदर्भ में समझें। वहां अशोक गहलोत अभी भी आला कमान को निर्णय के सर्वाधिकार देने का प्रस्ताव पारित न करवा पाने के लिए माफी भले मांग रहे हों, लेकिन सब किया कराया उन्हीं का था। यह भी आला कमान को परोक्ष रूप से चुनौती थी। थरूर उसी बात को खुले रूप में कह रहे हैं।
इस चुनाव का रोचक पक्ष यही है कि थरूर ने अध्यक्ष चुनाव के बहाने ही सही, आला कमान संस्कृति पर सवाल उठाने की हिम्मत तो दिखाई। लेकिन यह हिम्मत भी खुद के दम पर ही है। ऐसे में अध्यक्ष के चुनाव में भी उन्हें ‘शहादत’ मिलनी लगभग तय है। आश्चर्य नहीं कि इस तरह दम दिखाने का खमियाजा उन्हें अगले लोकसभा चुनाव में टिकट गंवाकर भुगतना पड़े। वैसे थरूर कोई सुभाषचंद्र बोस तो हो नहीं सकते, जिन्होंने 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव महात्मा गांधी के प्रत्याशी डाॅ. पट्टाभि सीतारमैया को हराकर जीता था। लेकिन तब कांग्रेसियो में भी उतना साहस था।
पट्टाभि की हार से दुखी गांधीजी ने इसे निजी पराजय माना था। हालांकि शीर्ष नेतृत्व से असहयोग और अहिंसा पर अपने अलग विचार के कारण नेताजी काम नहीं कर पाए और उन्होंने अगले ही साल पद से इस्तीफा देकर देश सेवा की नई राह पकड़ी। वैसा कोई चमत्कार अब देखने को मिलेगा, इसकी संभावना दूर तक नहीं है। दिलचस्पी की बात इतनी है कि इस चुनाव में थरूर कितने कांग्रेसियों के वोट हासिल कर पाते हैं। ताकि सनद रहे।
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