कानून मंत्री और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जिस तरह जोर देकर अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि हैकेथॉन कांग्रेस की ओर से प्रायोजित एक स्टंट है और आशीष रे नाम के कथित पत्रकार कांग्रेस के एजेंट हैं, उससे ये बात साफ है कि ईवीएम हैकिंग के आरोपों से भाजपा में खलबली है। चुनाव करीब आते ही ईवीएम हैकिंग को लेकर ऐसे खुलासों से देश में मौजूदा चुनाव व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठ गए हैं। ऐसा नहीं है कि ये कहानी कोई आज शुरू हुई है।
याद कीजिए, 2014 के चुनाव नतीजों के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने सबसे पहले ईवीएम में गड़गड़ी के आरोप लगाए थे, फिर आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी ने भी ऐसे ही आरोप लगाए। लंबी-लंबी बहसें चलीं, टीवी चैनलों पर कुछ लोगों ने ईवीएम हैक करने के तरीकों के कुछ डेमो भी दिखाए और चुनाव फिर से पुराने तरीके यानी बैलेट पेपर से कराए जाने की मांग उठने लगी थी।
फिलहाल कपिल सिब्बल पर आरोप लग रहे हैं कि लंदन के इस हैकेथॉन के पीछे वही हैं, पत्रकार आशीष रे उनके ही आदमी हैं और जिस शुजा ने 2014 के चुनाव में ईवीएम में गड़बड़ियों और गोपीनाथ मुंडे की हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, वह भी प्रायोजित है।
कपिल सिब्बल ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों के जवाब में जिस आशीष रे के मेल के हवाले से कई सबूत पेश कर रहे हैं, वह भी कम गंभीर नहीं हैं। वो जिस सैयद शुजा को लंदन में राजनीतिक संरक्षण मिलने की बात कर रहे हैं और जिसके हवाले से बता रहे हैं कि काका-काकी गेस्ट हाउस में कैसे 11 लोगों की हत्या कर दी गई और कैसे शुजा वहां से जान बचाकर शिकागो चला गया और कैसे उसके पास ईवीएम हैकिंग के तमाम राज़ थे, ये बेशक जांच के विषय तो हैं ही।
टाइम्स ऑफ इंडिया और बीबीसी से जुड़े रहे हैं आशीष रे
रही बात पत्रकार आशीष रे की, तो आप इनकी फेसबुक प्रोफाइल से देख सकते हैं कि रे लंबे समय तक टाइम्स ऑफ इंडिया और बीबीसी से जुड़े रहे हैं और भारतीय राजनीति और खासकर मोदी सरकार की खिलाफत करते रहे हैं। जाहिर है, कपिल सिब्बल से उनकी निजी दोस्ती की और भी वजहें हो सकती हैं और सिब्बल का लंदन जाना महज एक इत्तेफाक नहीं भी हो सकता है। लेकिन जब घोषित तौर पर कपिल सिब्बल एक कांग्रेसी हैं और पार्टी के एक अहम और कद्दावर नेता के साथ साथ एक जाने माने वकील भी हैं, साथ ही पूर्व आईटी मंत्री भी हैं तो उनके इस हैकेथॉन में हिस्सा लेने पर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं बनता।
ऐसे भी सिब्बल या किसी भी पार्टी का कोई भी नेता कहां-कहां और क्यों जाता है, इसपर कोई सवाल उठा भी नहीं सकता। लेकिन मामला अपने देश की चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाने से लेकर ईवीएम हैकिंग और भाजपा की 2014 में हुई चमत्कारिक जीत और कथित तौर पर इसके राज जानने वालों की हत्याओं के आरोप से बेहद गंभीर हो जाता है और बेशक इस आरोप को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अब चुनाव आयोग और अपने देश की सरकार इसकी जांच जल्द से जल्द कैसे करवाती है, यह बेशक एक गंभीर सवाल है।
जाहिर है ये दावा नहीं किया जा सकता कि ईवीएम मशीनें फुल प्रूफ हैं और इनमें गड़गड़ी नहीं हो सकती। भाजपा भी इस बात को कई मौकों पर मानती है और ये सवाल उठाती रही है कि आखिर विपक्ष उन्हीं जगहों पर हैकिंग का आरोप क्यों लगाती है जहां वह हार चुकी है, जहां जहां उसकी जीत हुई, वहां क्या ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई?
दूसरी तरफ सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में ईवीएम और वीवीपैट मशीनों पर सवाल तो उठ ही रहे हैं और फिर से बैलेट से चुनाव करवाने की मांग भी हो ही रही है। रही बात हैकेथॉन की, तो यह भी कोई पहली दफा तो हो नहीं रहा था। हैकेथॉन का अपना इतिहास है और जैसे जैसे आईटी सेक्टर का विकास हुआ, इसके सॉफ्टवेयर और प्रोग्राम्स को बेहतर और सुरक्षित बनाने को लेकर दुनिया के तमाम आईटी एक्सपर्ट मिल बैठकर इस प्लेटफॉर्म पर आते रहे हैं। यह सिलसिला अलग अलग नामों से 1999 और 2000 से चल रहा है। और 21वीं सदी आते आते तो हैकेथॉन का नाम भी अस्तित्व में आ गया था।
इसलिए इस खुलासे पर होने वाली सियासत अभी और परवान चढ़ सकती है और चुनावी सभाओं में ये मुद्दा काफी गरम हो सकता है। सियासी तौर पर आरोप प्रत्यारोप के दौर तो चलते ही रहते हैं, लेकिन चुनाव पास आते आते राजनीतिक दलों के पिटारे से बहुत कुछ बाहर आने वाला है। इंतजार कीजिए।