नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन
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इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें अपने पड़ोसी देशों के चरित्र को भी समझना पडे़गा। पाकिस्तान तो जन्म से ही इस्लामी देश है और मुजीबुर्रहमान के बाद बांगला देश ने भी इस्लाम धर्म अपना लिया जबकि 1971 में बांगला देश की स्वतंत्रता की लडाई वहां के हिंदू और मुस्लिम समुदाय ने मिलकर लड़ी थी।
पाकिस्तान और बांगलादेश में बहुसंख्यक मुस्लिमों के द्वारा अल्पसंख्यकों विशेषकर हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार कोई ढ़की-छुपी बात नहीं है, इसीलिए बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक इन देशों से भारत में पलायन करते आए हैं या धर्म परिवर्तित करके इस्लाम को कबूल करते रहें हैं।
अनेक हिंदुओं, सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों को मार दिया गया और उनकी बहू-बेटियों से बलात्कार किए गए और उनका अपहरण करके धर्म परिवर्तित करवा दिया गया। यह आश्चर्य की बात है कि भारत ने कभी भी इन अत्याचारों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभावी रूप से आवाज़ नहीं उठाई अन्यथा कुछ न कुछ इन अत्याचारों में कमी आ सकती थी।
ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि आज़ादी के बाद इतनी बड़ी हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, पारसी और बौध आबादी को क्यों इन धर्मांध देशों के हवाले बिना किसी सुरक्षा के छोड़ा गया था ? 1950 मे नेहरू-लियाकत समझौता हुआ था जिसमें इन अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का प्रावधान था, लेकिन पाकिस्तान नें कभी भी इसके प्रावधानों को लागू नही किया और वहां पर अल्प्संख्यकों पर जुल्म होते रहे हैं। इस्लामी देश बांगला देश भी इन अल्पसंख्यकों पर जुल्म करने में पीछे नहीं रहा।
बांगला लेखिका तस्लीमा नसरीन नें अपने उपन्यास ‘लज्जा’ में जब इन जुल्मों का रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन किया तो बांगला देश ने उन्हें ही देश निकाला दे दिया। तस्लीमा नसरीन आजकल दिल्ली में रह रही हैं।
इन्हीं उत्पीड़नों के कारण इन दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की आबादी जो स्वतंत्रता के समय 20 से 23 प्रतिशत थी, आज घटकर मात्र 3 से 7 प्रतिशत रह गई है। वो दिन भी दूर नही जब ये अल्पसंख्यक नाममात्र के लिए इन देशों में रह जाएंगे। नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों को इनके दुख-दर्दों का भी आंकलन करना चाहिए।
इसी प्रकार अफगानिस्तान में जब से तालिबान का दमनकारी शासन हुआ है, अल्पसंख्यकों की स्थिति बहुत खराब है। इस दमनकारी शासन ने तो हिंदुओं और सिखों का इस देश में नामों निशान ही मिटा दिया है। तालिबानी शासन से तो ज्यादा आशा नहीं की जानी चाहिए, क्योँकि उनका धार्मिक आधार ही कट्टरता पर निर्भर है।
अनेक हिंदू और सिख इस दमनकारी शासन के बाद भारत में शरणार्थी बन कर आए हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक हमारे पड़ोसी देशों के इन सभी अल्पसंख्यक लोगों को जो उत्पीड़न के कारण इन देशों से पलायन करके आए हैं, नागरिकता प्रदान करता है। इसके विरोध में सबसे ज्यादा तर्क ये दिया जाता है कि इसमें मुस्लिम आबादी को क्यों शामिल नही किया गया है।
विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग
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आखिर वो भी तो उत्पीड़न का शिकार हो सकते हैं। ऐसा तर्क देनें वाले पाकिस्तान मे अहमदी और शिया समुदाय का जिक्र करते हैं। पाकिस्तान के कट्टरपंथी मुस्लिम इनको मुस्लिम नहीं मानते और प्रताड़ित करते हैं। लेकिन ये मुस्लिम ही हैं। ये कुरान को मानते हैं, पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ते हैं और इस्लाम के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं। अगर इस्लामी देश पाकिस्तान अपनें ही लोगों का उत्पीड़न करता है तो यह उसका अंदरूनी मामला है।
इसके बावजूद भी अगर ये मुस्लिम भारत में शरण मांगते हैं तो ऐसा कुछ भी नहीं है कि नागरिकता संशोधन विधेयक इसका विरोध नहीं करता। 2014 से लगभग 566 लोगों को इस आधार पर भारत में रहने की आज़ादी दी गई है। म्यांमार के रोहिंग्या और हिंदू, श्रीलंका के हिंदू और ईसाई तमिल जो अत्याचार सह रहें हैं, इस प्रायद्वीप मे आज़ादी के बाद के उत्पीड़ित नहीं हैं। इसके बाद भी श्रीलंका गृहयुद्ध के समय और बाद मे अनेक बार तमिल शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान की गई थी।
दूसरा तर्क है कि ये विधेयक भेदभाव करता है और भारत के साम्प्रदायिक सौहार्द को नष्ट कर देगा। इस विधेयक में तो ऐसा कुछ भी नहीं है जो भारत के अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई पाबंदी लगाए। भारत में अल्पसंख्यक पहले ही की भांति सविंधान मे मिले अधिकारों का उपयोग कर पाएंगे। इस विधेयक से किसी की नागरिकता छिनी नहीं जा रही बल्कि ये उन धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करता है जो पहले ही भारत मे आए हुए हैं।
ये विधेयक तो इस प्रायद्वीप में धार्मिक आधार पर बनें देशों में उन देशो के अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों पर मलहम की भाँति है। ये तो इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं के वोटबैंक के हित हैं जो इसे धार्मिक चश्में से देखने और दिखलाने का प्रयत्न किया जा रहा है। महात्मा गांधी का नाम ले-लेकर इसका विरोध करने वाले यह भूल रहें है कि गांधी जी ने तो अपने पूरे जीवन मे उत्पीड़न सहने वालों का ही समर्थन किया था।
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