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China Brahmaputra Dam Project: भारत के लिए खतरे की घंटी है चीनी परियोजना

सार

चीन ने वैसे तो वर्ष 2021 में ही ऐसे बांध के निर्माण का संकेत दिया था। उस समय इससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए ही भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर एक बहुउद्देशीय परियोजना का खाका तैयार किया था।
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चीन कई बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। - फोटो : Freepik
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विस्तार
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चीन ने हाल में अरुणाचल से लगे सीमावर्ती इलाके में ब्रह्मपुत्र नदी पर एक बड़ा बांध बनाने का एलान किया है।  इसने भारत और बांग्लादेश की चिंता बढ़ा दी है।  अब उस एलान को ध्यान में रखते हुए अरुणाचल में सियांग बहुउद्देशीय परियोजना को शीघ्र हरी झंडी दिखाने पर जोर दिया जा रहा है।  लेकिन स्थानीय लोग विभिन्न वजहों से उस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।  

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यारलुंग नदी अरुणाचल प्रदेश में सियांग के नाम से जानी जाती है।  आगे बढ़ते हुए असम पहुंचने पर उसका नाम बदल कर ब्रह्मपुत्र हो जाता है।  देश की सीमा पार बांग्लादेश पहुंचने पर यह नदी जमुना कहलाती है।  चीनी बांध का बांग्लादेश में भी प्रतिकूल असर पड़ने का अंदेशा है।  इस नदी की कुल लंबाई करीब 2880 किलोमीटर है।  इसका 1625 किलोमीटर यानी आधे से ज्यादा हिस्सा तिब्बत में है।  भारत और बांग्लादेश में इसकी कुल लंबाई क्रमशः 918 और 337 किमी है। 

चीन ने वैसे तो वर्ष 2021 में ही ऐसे बांध के निर्माण का संकेत दिया था। उस समय इससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए ही भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर एक बहुउद्देशीय परियोजना का खाका तैयार किया था। लेकिन स्थानीय आदिवासियों के विरोध के कारण यह मामला फिलहाल आगे नहीं बढ़ सका है। 
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चीनी परियोजना से 60 हजार मेगावाट बिजली पैदा होगी।  चीन सरकार ने हालांकि दावा किया है कि इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।  लेकिन भारत में पर्यावरणविदों का कहना है कि यह बांध अरुणाचल प्रदेश से सटे तिब्बत के जिस इलाके में बनना है वह भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील है।  इस बांध से इलाके का पारिस्थितिकी संतुलन भी गड़बड़ा सकता है।  इसके अलावा निचले हिस्से यानी अरुणाचल प्रदेश और असम में इसकी वजह से खेती और जैव विविधता पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। 

पर्यावरणविदों की चिंता की वजह यह है कि पहले भी इलाके में ऐसी कई प्राकृतिक आपदाएं हो चुकी हैं।  वर्ष 2000 में यारलुंग सांगपो की सहायक नदी ईगोंग सांगपो में भूकंप के कारण बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ था।

इसकी वजह से अरुणाचल प्रदेश व असम में आई भयावह बाढ़ से जान-माल का भारी नुकसान हुआ था।  इसी तरह वर्ष 2017 में आए भूकंप से इलाके में दो अस्थायी झीलें बन गई थी।  भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि वह दोनों झीलें हल्के भूकंप की स्थिति में भी फट कर इलाके में तबाही मचा सकती हैं। 

चीन के एलान के बाद इसके मुकाबले के लिए इलाके में सियांग बहुउद्देशीय परियोजना को शीघ्र लागू करने की मांग बढ़ रही है।  लेकिन स्थानीय लोग इसका विरोध कर रहे हैं।  उनकी दलील है कि इस परियोजना के कारण इलाके के 13 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे और 34 गांवों के लोगों की आजीविका और जीवन प्रभावित होगा। 

लेकिन अरुणाचल प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री चाउना मीन कहते हैं कि स्थानीय लोगों को नुकसान पहुंचा कर कोई बांध नहीं बनेगा।  लेकिन यह परियोजना चीनी परियोजना के खतरों से निपटने के लिए बेहद अहम है।  उनका कहना है कि आम लोगों की राय और सार्वजनिक सुनवाई के बाद ही यह परियोजना आगे बढ़ेगी।

मीन कहते हैं कि यह परियोजना महज पनबिजली के लिए नहीं बल्कि चीनी खतरों से निपटने के लिए बी जरूरी है।  अगर चीन ने अतिरिक्त पानी छोड़ दिया तो ब्रह्मपुत्र घाटी से लेकर गुवाहाटी के सरायघाट ब्रिज तक सब कुछ डूब जाएगा। 

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी चीनी परियोजना पर चिंता जताते हुए कहा है कि चीनी परियोजना पूरा होने की स्थिति में ब्रह्मपुत्र का पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह नाजुक हो जाएगा।  पूरा इलाक सूखे की चपेट में आ जाएगा और हमें खेती के लए भूटान और अरुणाचल प्रदेश में होने वाली बारिश पर निर्भर रहना होगा।  इसी तरह चीन के पानी छोड़ने पर पूरा इलाका डूब जाएगा। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw। co। in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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