एक गैर-सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार एक घंटे में करीबन 11 बच्चे लापता हो जाते हैं। लापता हुए बच्चों में से अधिकतर बच्चे शोषण के शिकार हो जाते हैं।
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हालांकि बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए सरकार ने 2012 में पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस) एक्ट बनाया लेकिन यह बेअसर साबित हो रहा है। यह भी चौंकाने वाला सच है कि देश में हर साल 5 साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। भारत कुपोषण की श्रेणी में दक्षिण एशिया का अग्रणी देश है। भारत में राजस्थान व मध्य प्रदेश का हाल तो और भी बुरा है। इन हालातों में केवल एक दिन बच्चों के विकास और स्वर्णिम भविष्य को लेकर चर्चा करना कितना वाजिब है? क्या अब भी बच्चों की दुर्दशा व इस भयावह स्थिति को लेकर हमें सचेत होने की आवश्यकता नहीं है? वहीं गृह मंत्रालय ने एक आरटीआई के जवाब में यह साफ किया है कि देश में प्रतिवर्ष 90 हजार बच्चे गुम हो जाते हैं। एक गैर-सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार एक घंटे में करीबन 11 बच्चे लापता हो जाते हैं। लापता हुए बच्चों में से अधिकतर बच्चे शोषण के शिकार हो जाते हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे अपने घर लौट ही नहीं पाते।
इन सबके बाद यह सोचनीय है कि अब बचपन बचा कहां है? गलियां सुनसान हैं और मैदान जितने भी बचे हैं, वे वीरान हैं। दरअसल गलियों में धमा-चौकड़ी करने वाला बचपन आज इंटरनेट के मकडज़ाल में फंसता जा रहा है। यही कारण है कि बच्चों को अपने होमवर्क के बाद जो समय मिल रहा है, उसे वे सोशल साइट्स व गेम्स खेलने में गंवा रहे हैं, इसके कारण उनकी आंखों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है तथा वे चिड़चिड़ेपन का शिकार हो रहे हैं। हाल ही में ब्लू व्हेल व पबजी नामक मोबाइल गेम के कारण भारत में एक के बाद एक बच्चों द्वारा आत्महत्या करने की खबर ने सबको हैरत में डाल दिया है। आखिर ऐसी नौबत क्यों आई? क्योंकि बच्चों को कभी भी अभिभावकों ने मैदान में खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। कभी मैदान में खेले जाने वाले खेलों के प्रति उनकी जिज्ञासा उत्पन्न करने की कोशिश की ही नहीं हुई। इसका कारण धनोपार्जन की अंधी दौड़ में अभिभावकों का अपने बच्चों व परिवार से कट जाना है। कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं। चंचलता, मासूमियत, भोलापन, सादगी व सच कहने की गजब शक्ति बच्चों में होती है लेकिन आज उसी निर्भीक बचपन को अत्याधुनिकता की नजर लग गई है। यहां फिर अभिभावकों की बच्चों को शीघ्र बड़ा बनाने की तलब ने कहीं न कहींं उनके बचपन को छीनने का प्रयास किया है। अगर यही स्थिति रही तो फिर बचपन और बुढ़ापे में क्या अंतर रह जाएगा? हमें इस बाल दिवस पर इन समस्याओं को लेकर गंभीरतापूर्वक चिंतन, मनन व मंथन करने की महती आवश्यकता है।
बोझ तो बराबर हैं दोनो का
फिर मंजिल अलग-अलग क्यों?
किस मुख से कहूं हैप्पी चिल्ड्रन्स डे !
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