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महापर्व छठ: सूर्योपासना की वैश्विक परंपरा, आस्था-विश्वास का अनोखा उत्सव

सार

छठ की वैश्विकता का असर बिहार, यूपी  से आगे  निकलकर गिरमिटियों के ग्लोबल गांव से लेकर लंदन में टेम्स किनारों तक अब बहुत  साफ़  साफ़  दिखने लगा  है। छठ महापर्व ,सूर्योपासना के अतीत वाली दुनिया भर के जातियों को सनातन संस्कृति और भारतवर्ष से जोड़ने का एक सार्थक उपक्रम हो सकता है।
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छठ पूजा 2022, आस्था का महापर्व - फोटो : Istock
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विस्तार
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सूर्योपासना एक पुरातन धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है। इससे संबंधित प्रतीक आपको विश्वभर में देखने को मिलेंगे। कभी यह रोम मिस्र, ग्रीक, सीरिया, पर्शिया, अफ्रीका और अमेरिका तक चलन में रहा है। अमेरिका की पुरानी सभ्यता इंका और माया के तो प्रधान देवता सूर्य ही है। इंका लोग आदित्य को इंदि तो माया सभ्यता में तोनातिउ पुकारा जाता था ।रोम सोल तो पर्शिया मित्र,जापान अमतेरासू और मिश्र मे होरुस नाम से सूर्यदेव को संबोधित किया जाता रहा है। बाल्टिक देशों के लोग साउल नाम से तो यूनान और ग्रीस मे हेलियोस नाम से तो पुकारते रहे हैं। हेलियोस की मूर्ति भारत में बने अश्व रथ पर सवार सूर्यदेव के बिल्कुल समान हुआ करती थी।

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लैटिन संस्कृति में सूर्यदेव का नाम सो तो फ्रीजिअन्स अत्तिस, लिजियन्स मिदोस और बेबिलोनिया शमस नाम से संबोधित करते थे। ये सभी नाम सूर्यदेव के भारतीय नामों के समानार्थ हैं। पश्चिम एशिया की हित्ती संस्कृति से लेकर यूरोप के क्रीट और जर्मनी तक सूर्योपासना चलन में रहा है।

यूरोप और दक्षिण अमेरिकी देशों में बलात धर्मांतरण के बावजूद अब भी इसकी जड़ें मौजूद है। इनसे संबंधित प्रतीक दुनियाभर में देखा जा सकता है। जापान से अर्जेंटीना तक करीब बाइस देशों के राष्ट्रीय ध्वज पर सूर्य चिन्ह अंकित है। इनमें एशिया और अमेरिका ही नहीं, अफ्रीका तथा यूरोप के देश भी हैं। महान भारतीय सम्राज्य मौर्य के चांदी से बने पंच चिह्न वाले सिक्कों में उगते सूरज का चित्रण है। ऐसा मुद्राशास्त्रीय अध्ययनों से पता चला है। वहीं इनके राज्य चिन्ह के तौर पर सूर्य प्रतीकों की संभावना व्यक्त की जा रही है।
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पुरायुग इतिहासविदों की मानें तो सम्राट अशोक का प्रसिद्ध कालचक्र मूलतः एक सौर प्रतीक है। यह वास्तव में एक सूर्य चक्र है।वहीं यह समय की यात्रा में भारत से होता बौद्ध देशों तक पहुंचा। अब उनके लिए भी एक पवित्र प्रतीक है। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं, सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं। वे प्रकाश के पुंज है। सूर्य जीवनदायी शक्तियों के सबसे बड़े प्राकृतिक स्रोत भी है।


प्रकृति के इस जागृत और निरंतर गतिमान ऊर्जा पिंड को ओज तेज, शक्ति सामर्थ्य का जीवंत प्रतीक माना गया है। इस नाते न्यूजीलैंड के माओरी जनजाति से लेकर जापान के सम्राट तक के सूर्य की संतानें होने का दावा है। ईरान के पूर्व शासक पहलवी वंश भी खुद को सूर्यवंशी मानता है। इस्लामीकरण के बावजूद ईरान के शाह पहलवी उपाधि और सूर्यदेव में विश्वास करते थे।


रामायण-महाभारत में भी सूर्योपासना का वर्णन

ईरान धर्म, पारसी भी सूर्योपासना से ही जुड़ा है। बात अगर भारत के संदर्भ में हो तो यहां सूर्योपासना शेष विश्व से कहीं अधिक पुराना और व्यवस्थित स्वरूप में रहा है। यहां भगवान सूर्य को सर्वोच्च देव मानकर युगों से उपासना की जाती रही है। इसका आधार वेद ग्रंथ तो स्रोत उपनिषद और पुराण हैं। वहीं महाकाव्य रामायण और महाभारत में भी इससे संबंधित कथाएं हैं। वेदों में सर्वाधिक प्राचीन ऋग्वेद में सूर्यदेव की महिमा का गान इन मंत्रों के द्वारा किया गया है।

वेद कहते है - येना पावक चक्षसा भुरण्यंतम् जनां अनु।त्वं वरूण पश्यसि


जबकि कथाओं में राजा ऐल और भगवान कृष्ण पुत्र शाम्बा के कुष्ठ मुक्ति की कथा है। ऐसी ही एक कथा राजा शर्याति की पुत्री देवी सुकन्या की भी है। इन्होंने सूर्यदेव की उपासना से अपने वयोवृद्ध पति ऋषि च्वन्य को युवा और कांतिमय रूप में पाया था।सूर्योपासना से निसंतान राजा प्रियव्रत के यहां शिशु जन्म पुराणों की एक महत्वपूर्ण कथा है। ईक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रीय तो अपने को सूर्यवंशी मानते आए हैं।

क्षत्रीयों की यह सूर्यवंशी शाखा वैवस्वत मनु से प्रारंभ होती है। इसी शाखा में इक्ष्वाकु,हरिश्चंद्र,भगीरथ, दिलीप,सुदास,रघु और दशरथ जैसे राजा हुए हैं। जैन मत के सभी चौबीस तीर्थकर और सिख पंथ के दस गुरुओं का जन्म इसी सूर्यवंशी कुल में हुआ है।गुरु गोविंद सिंह अपने दशम ग्रंथ में गुरुनानक से लेकर स्वयं तक के जन्म को इस वंश से जोड़ पूरी वंशावली प्रस्तुत करते हैं। जबकि भगवान के पृथु, राम और बुद्ध देव अवतारों का जन्म कुल यही है। रामायण में रावण से युद्धरत भगवान राम लंका विजय हेतु आदित्य हृदय स्तोत्र के अनुष्ठान की चर्चा है।

वहीं महाभारत में अज्ञातवास के दौरान अपने दुर्भाग्य मुक्ति हेतु द्रौपदी और युधिष्ठिर द्वारा सूर्योपासना की कथा है। जैन एवं बौद्ध मान्यताओं में भी सूर्य की महत्ता है। बौद्ध मतावलंबी तो भगवान बुद्ध के शरीर को सूर्य प्रतीक मानते हैं। बुद्ध की ज्ञान भूमि गया स्थिति महाबोधि महाविहार के प्राचीन कटघरा रेलिंग मे सूर्यदेव का चित्रण मिला है।

भारत में पुरातन काल से सूर्योपासको का एक संप्रदाय भी रहा है।इस सौर संप्रदाय के अपने मंदिर,तीर्थ और महत्वपूर्ण ग्रंथ भी थे।यह संप्रदाय आद्य शंकराचार्य के समय भी चलन में रहा है।इनमें लाल चंदन फूल लाल माला और अष्टाक्षर मंत्रों की प्रधानता रही है।इसके तांत्रिक शाखा के साधक अपने शरीर पर सूर्य चिन्हों का अंकन कराते थे।
 

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छठ एक ऐसा पर्व है जिसका सम्पूर्ण  केवल नियम और श्रद्धा आधारित है। - फोटो : Twitter

उपनिषदों में विशेष उल्लेख

सूर्योपासना ग्रंथ के तौर पर उपनिषदों में (सूर्योपनिषद चक्षुरूपनिषद् नेत्रोपनिषद् और नारायनोपनिषद) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वहीं पुराणों में इससे संबंधित सौर एवं शाम्बा उपपुराण तथा ब्रह्म महापुराण हैं, जबकि ऋग्वेद में अनेक सूर्योपासक मंत्र हैं। बाणभट्ट के कुटुंब पंडित मयूर भट्ट ने सूर्य शतक नामक तो प्रसिद्ध जैन आचार्य मानतुंग ने भक्तमर स्रोत नाम का सौर उपासना ग्रंथ लिखा है। जबकि मिथिला के विद्वान चंदेश्वर और रुद्रधर ने भी सूर्योपासना पर ग्रंथ लिखे हैं।

इसमें से रुद्रधर द्वारा लिखे मिथिला वर्षकृत्य मे प्रतिहार षष्ठी नाम से छठ व्रत की चर्चा है। सूर्योपासना संबंधित एक महत्वपूर्ण रचना के तौर पर नेपाल से सौर संहिता प्राप्त हुई है। यह विक्रम संवत 998 की लिखी प्रतीक होती है।

छठ व्रत के कठिन नियम

छठ एक ऐसा पर्व है जिसका सम्पूर्ण केवल नियम और श्रद्धा आधारित है। यहां जाति और समुदाय का भेद नहीं है। गैर हिन्दु मसलन, मुस्लिम परिवार की महिलाएं भी पुरातन संस्कार और श्रद्धा से भर छठ व्रत करती हैं। चार दिनों का यह त्योहार शुक्ल पक्ष चतुर्थी को प्रारंभ होता है। इस दिन व्रती प्रातः स्नान कर नए वस्त्र पहनती हैं। भोजन में लहसुन-प्याज से रहित शुद्ध सात्विक दाल चावल और हरी सब्जियां बनती हैं।चावल अरवा उपयोग होता है। इस दिन भोजन में सेंधा नमक का उपयोग किया जाता है।वहीं तुलसी दल डाल भगवान को भोग लगा पहले व्रती फिर परिवार जन खाते हैं।इसे नहाय खाय कहते है।

यह आत्म शुद्धि का दिन है। अगले दिन पंचमी तिथि को व्रती पूरे दिन निर्जला रह कर संध्या को चावल गुड़ से बना खीर और रोटी खाते हैं। इसे खरना व्रत कहते है। इसके अगले दिन व्रतकर्ता पूर्णरूपेण अन्न जल त्याग संध्या को नदी तालाब घाट अर्ध्य देते हैं। इस दिन को निखण्ड कहते है। तदोपरांत चौथे दिन सप्तमी तिथि को प्रातः काल सूर्यदेव को नदी तालाब घाट अर्ध्य देने के उपरांत व्रत पूर्ण होता है। इस दिन को पारण कहते हैं।

इस पूजा अवधि में व्रती भूमि पर शयन करते हैं। पुरुष व्रती धोती तो महिला साड़ी पहनती हैं।इनके कपड़े पीले रंग के होते हैं।व्रती इन दिनों चप्पल जूते और सिले वस्त्रों का उपयोग नहीं करते हैं। ये निरंतर सूर्यदेव की प्रार्थना करते हुए व्रत संबंधित नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करते हैं। कई लोग तो नदी तालाब घाटों तक लेटकर सूर्यदेव को प्रणाम करते हुए जाते आते हैं।इ से परंपरा को दंड प्रणाम कहते हैं।

इन दिनों घर के आंगन से नदी तालाब घाटों तक पूरा भक्तिमय माहौल होता है। इस अवसर पर घर आंगन से लेकर रास्ते और नदी तालाब घाटों की सजावट देखते बनती है। आंगन और घाटों पर  केले के पौधे गन्ना और मिट्टी के दीये बर्तनों से शोभा बढ़ाई जाती है। छठ व्रत की आहट के साथ ही श्रद्धालु रास्ते और नदी तालाब की सफाई मे लग जाते हैं। पूजा के दौरान घाट पर अर्ध्य के दौरान जल में फूल चावल अक्षत और दूध भर छोड़ा जाता है। यह मछली जैसे जलीय जीवों का आहार है।

वहीं पूजा उपरांत घाट पर चारों तरफ सजावट को लगाए गए केले के पौधे नजर आते हैं। कहीं कोई प्लास्टिक रसायन इत्यादि का उपयोग नजर नहीं आता। उलटे सफाई के नाते जल का बहाव और सुंदर रंगत दिखता है। यह पर्व अब भी बाजारवाद से पूरी तरह दूर है। प्रसाद घरों में ही बनना है जबकि प्रसाद के तौर पर आटे गुड़ देसी घी से बने ठेकुआ की महत्ता है। वैसे उपलब्ध मौसमी फल भी चढ़ाए जाते हैं।

पूजा के प्रसाद बांस के बने बर्तनों में सजा सूर्यदेव को अर्ध्य दिया जाता है, जिसे परिवार के सदस्य सर पे ढोकर घाट तक लाते  हैं। पूजा संबंधित बर्तनों की खरीदारी आस-पड़ोस के डोम और कुम्हार बिरादरी से  की जाती है। यह पर्व सामाजिक जुड़ावों का भी पर्व है। यहां घाटों पर पूजा संपन्न होने के साथ ही व्रतियों के पांव छूने और उनके गीले वस्त्र धोने की प्रतिस्पर्धा देखते बनती है।

इस पर्व में प्रसाद मांग कर खाने और व्रतियों के पांव छूने का विधान है| छठ की वैश्विकता का असर बिहार, यूपी  से आगे  निकलकर गिरमिटियों के ग्लोबल गांव से लेकर लंदन में टेम्स किनारों तक अब बहुत  साफ़  साफ़  दिखने लगा  है। छठ महापर्व ,सूर्योपासना के अतीत वाली दुनिया भर के जातियों को सनातन संस्कृति और भारतवर्ष से जोड़ने का एक सार्थक उपक्रम हो सकता है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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