छठ एक ऐसा पर्व है जिसका सम्पूर्ण केवल नियम और श्रद्धा आधारित है।
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उपनिषदों में विशेष उल्लेख
सूर्योपासना ग्रंथ के तौर पर उपनिषदों में (सूर्योपनिषद चक्षुरूपनिषद् नेत्रोपनिषद् और नारायनोपनिषद) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वहीं पुराणों में इससे संबंधित सौर एवं शाम्बा उपपुराण तथा ब्रह्म महापुराण हैं, जबकि ऋग्वेद में अनेक सूर्योपासक मंत्र हैं। बाणभट्ट के कुटुंब पंडित मयूर भट्ट ने सूर्य शतक नामक तो प्रसिद्ध जैन आचार्य मानतुंग ने भक्तमर स्रोत नाम का सौर उपासना ग्रंथ लिखा है। जबकि मिथिला के विद्वान चंदेश्वर और रुद्रधर ने भी सूर्योपासना पर ग्रंथ लिखे हैं।
इसमें से रुद्रधर द्वारा लिखे मिथिला वर्षकृत्य मे प्रतिहार षष्ठी नाम से छठ व्रत की चर्चा है। सूर्योपासना संबंधित एक महत्वपूर्ण रचना के तौर पर नेपाल से सौर संहिता प्राप्त हुई है। यह विक्रम संवत 998 की लिखी प्रतीक होती है।
छठ व्रत के कठिन नियम
छठ एक ऐसा पर्व है जिसका सम्पूर्ण केवल नियम और श्रद्धा आधारित है। यहां जाति और समुदाय का भेद नहीं है। गैर हिन्दु मसलन, मुस्लिम परिवार की महिलाएं भी पुरातन संस्कार और श्रद्धा से भर छठ व्रत करती हैं। चार दिनों का यह त्योहार शुक्ल पक्ष चतुर्थी को प्रारंभ होता है। इस दिन व्रती प्रातः स्नान कर नए वस्त्र पहनती हैं। भोजन में लहसुन-प्याज से रहित शुद्ध सात्विक दाल चावल और हरी सब्जियां बनती हैं।चावल अरवा उपयोग होता है। इस दिन भोजन में सेंधा नमक का उपयोग किया जाता है।वहीं तुलसी दल डाल भगवान को भोग लगा पहले व्रती फिर परिवार जन खाते हैं।इसे नहाय खाय कहते है।
यह आत्म शुद्धि का दिन है। अगले दिन पंचमी तिथि को व्रती पूरे दिन निर्जला रह कर संध्या को चावल गुड़ से बना खीर और रोटी खाते हैं। इसे खरना व्रत कहते है। इसके अगले दिन व्रतकर्ता पूर्णरूपेण अन्न जल त्याग संध्या को नदी तालाब घाट अर्ध्य देते हैं। इस दिन को निखण्ड कहते है। तदोपरांत चौथे दिन सप्तमी तिथि को प्रातः काल सूर्यदेव को नदी तालाब घाट अर्ध्य देने के उपरांत व्रत पूर्ण होता है। इस दिन को पारण कहते हैं।
इस पूजा अवधि में व्रती भूमि पर शयन करते हैं। पुरुष व्रती धोती तो महिला साड़ी पहनती हैं।इनके कपड़े पीले रंग के होते हैं।व्रती इन दिनों चप्पल जूते और सिले वस्त्रों का उपयोग नहीं करते हैं। ये निरंतर सूर्यदेव की प्रार्थना करते हुए व्रत संबंधित नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करते हैं। कई लोग तो नदी तालाब घाटों तक लेटकर सूर्यदेव को प्रणाम करते हुए जाते आते हैं।इ से परंपरा को दंड प्रणाम कहते हैं।
इन दिनों घर के आंगन से नदी तालाब घाटों तक पूरा भक्तिमय माहौल होता है। इस अवसर पर घर आंगन से लेकर रास्ते और नदी तालाब घाटों की सजावट देखते बनती है। आंगन और घाटों पर केले के पौधे गन्ना और मिट्टी के दीये बर्तनों से शोभा बढ़ाई जाती है। छठ व्रत की आहट के साथ ही श्रद्धालु रास्ते और नदी तालाब की सफाई मे लग जाते हैं। पूजा के दौरान घाट पर अर्ध्य के दौरान जल में फूल चावल अक्षत और दूध भर छोड़ा जाता है। यह मछली जैसे जलीय जीवों का आहार है।
वहीं पूजा उपरांत घाट पर चारों तरफ सजावट को लगाए गए केले के पौधे नजर आते हैं। कहीं कोई प्लास्टिक रसायन इत्यादि का उपयोग नजर नहीं आता। उलटे सफाई के नाते जल का बहाव और सुंदर रंगत दिखता है। यह पर्व अब भी बाजारवाद से पूरी तरह दूर है। प्रसाद घरों में ही बनना है जबकि प्रसाद के तौर पर आटे गुड़ देसी घी से बने ठेकुआ की महत्ता है। वैसे उपलब्ध मौसमी फल भी चढ़ाए जाते हैं।
पूजा के प्रसाद बांस के बने बर्तनों में सजा सूर्यदेव को अर्ध्य दिया जाता है, जिसे परिवार के सदस्य सर पे ढोकर घाट तक लाते हैं। पूजा संबंधित बर्तनों की खरीदारी आस-पड़ोस के डोम और कुम्हार बिरादरी से की जाती है। यह पर्व सामाजिक जुड़ावों का भी पर्व है। यहां घाटों पर पूजा संपन्न होने के साथ ही व्रतियों के पांव छूने और उनके गीले वस्त्र धोने की प्रतिस्पर्धा देखते बनती है।
इस पर्व में प्रसाद मांग कर खाने और व्रतियों के पांव छूने का विधान है| छठ की वैश्विकता का असर बिहार, यूपी से आगे निकलकर गिरमिटियों के ग्लोबल गांव से लेकर लंदन में टेम्स किनारों तक अब बहुत साफ़ साफ़ दिखने लगा है। छठ महापर्व ,सूर्योपासना के अतीत वाली दुनिया भर के जातियों को सनातन संस्कृति और भारतवर्ष से जोड़ने का एक सार्थक उपक्रम हो सकता है।
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