रोहिणी आयोग की रिपोर्ट और आरक्षण
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देश में ओबीसी की वास्तविक संख्या कितनी है, यह तभी पता चलेगा, जब देश के सभी राज्यों में जाति जनगणना हो। अभी तक केन्द्र सरकार इसे नकारती आई है, क्योंकि इसमें धर्म के आधार काफी हद तक गोलबंद किए गए हिंदू समाज का जाति के आधार पर नए सिर से विभाजन का खतरा तो है ही, साथ में खुद ओबीसी श्रेणी में नए घमासान मचने की चिंता भी है (हालांकि मुसलमानों के मामले में वो इसी जाति चेतना की समर्थक है)।
इससे भी बढ़कर परेशानी यह है कि अगर रोहिणी आयोग की रिपोर्ट पर सरकार ने कार्रवाई की तो वो पिछड़ी जातियां, जो ओबीसी आरक्षण के बाद सबल हुई हैं और इस आरक्षण का सर्वाधिक लाभ उन्होंने ही उठाया है, सरकार से नाराज हो सकती हैं। ये वो जातियां हैं, जो अलग-अलग राज्यों में संख्या बल, धन बल और बाहुबल के आधार पर राजनीतिक पलड़ा अपने पक्ष में झुकाने में सक्षम हैं। क्या सरकारें इन्हें नाराज करने का जोखिम मोल ले सकती हैं?
रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ओबीसी के तहत आने वाली सभी जातियों की संख्या और इस वर्ग को 30 वर्ष पूर्व मिले आरक्षण के बाद उनकी सामाजिक स्थिति व आरक्षण लाभ की वस्तुस्थिति का लेखा-जोखा पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत कुल 2633 जातियां सूचीबद्ध हैं। लेकिन आरक्षण लाभ की दृष्टि से यहां सामाजिक न्याय की उपेक्षा अथवा पक्षपाती लाभ ही हुआ है।
मसलन कुल ओबीसी जातियों/ उपजातियो में से 983 जातियों को ओबीसी आरक्षण का शून्य लाभ मिला है। फिर चाहे व शिक्षा की बात हो या फिर सरकारी नौकरी की। इसी तरह 994 जातियों की हिस्सेदारी नौकरी और पढ़ाई में मात्र 2.68 फीसदी की रही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि ओबीसी आरक्षण का कोई विशेष लाभ इस वर्ग की एक तिहाई जातियों को नहीं मिला है।
आरक्षण की असली लाभार्थी वही जातियां रही हैं, जो ओबीसी में भी धनबली और बाहुबली रही हैं। आरक्षण लाभ के ये वास्तविक आंकड़े समान सामाजिक न्याय के मूलभूत उद्देश्य को ही पराजित करने वाले हैं।
ओबीसी आरक्षण के लिए चार श्रेणियां प्रस्तावित
रोहिणी आयोग की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन मीडिया में आई खबरों की मानें तो आयोग ने ओबीसी आरक्षण की पिछड़ेपन के आधार पर चार श्रेणियां प्रस्तावित की हैं, लेकिन इन चार श्रेणियों की जातियों/ उपजातियों के बीच आरक्षण कोटा बंटवारे का आधार क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है। अगर यह आधार भी जातिजनसंख्या होगी तो सबसे ज्यादा नुकसान में वो जातियां रह सकती हैं, जो संख्या में कम होने के बावजूद सामाजिक जागरूकता और संसाधनों के चलते आरक्षण का सबसे ज्यादा लाभ उठाती रही हैं, जैसे कि जाट, यादव, गूजर, कुर्मी, कुणबी मराठा, पाटीदार आदि।
अगर संख्या के आधार पर कोटे के भीतर कोटे में इनका आरक्षण कम किया गया तो इनमें भारी नाराजी फैल सकती है। दूसरे, असंतोष उन जातियों में भी फैल सकता है, जो संख्या में ज्यादा होने के बावजूद कम आरक्षण कोटा पाएंगीं।
संभव है कि विपक्ष की जाति गणना की मांग के मुद्दे की धार को भोंथरा करने के लिए केन्द्र की मोदी सरकार लोकसभा चुनाव के पहले देश में जाति गणना की घोषणा कर दे। वैसे भी इस पर अमल 2025 में ही हो पाएगा। अगर 2014 में भाजपानीत एनडीए फिर सत्ता में आया तो देखा जाएगा। फिलहाल यह संदेश दिया ही जा सकता है कि भाजपा जाति गणना के विरोध में नहीं है।
वैसे भी भाजपा के पास ओबीसी चेहरे के रूप में प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी के रूप में सबसे बड़ा तुरूप का इक्का है, जिसकी काट किसी दल के पास नहीं है। बाकी दलों के ओबीसी नेता क्षेत्रीय क्षत्रप की हैसियत वाले हैं।
संभव है कि मोदी सरकार जाति जनगणना की काट के रूप में रोहिणी आयोग रिपोर्ट का इस्तेमाल करें। यह दांव ओबीसी में भी अति पिछड़ी 1977 जातियों को कोटे के भीतर आरक्षण कोटा लागू कर उसे सामाजिक न्याय का नाम देकर चली जा सकता है। इसका असर यह होगा कि ओबीसी वोट गहराई के साथ विभाजित होगा और ‘पिछड़ों में अगड़ी’ बन चुकी जातियों के वर्चस्व को चुनौती देने वाला होगा।
दूसरे, रोहिणी आयोग रिपोर्ट ओबीसी में दूसरे विभाजन का कारण बनेगी। क्योंकि ओबीसी में एक विभाजन तो सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही क्रीमी लेयर और नाॅन क्रीमी लेयर के रूप में कर दिया था।
क्या हो सकता है इसका असर?
इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर जनगणना में पहले से गिनी जाने वाली अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि वहां भी आरक्षण की मलाई चुनिंदा जातियों ने ही खाई है। लिहाजा रोहिणी आयोग जैसा कोई नया आयोग एससी/ एसटी जातियों में आरक्षण लाभ के अध्ययन के लिए बनाने की मांग जोर पकड़ सकती है, साथ ही वहां भी क्रीमी लेयर जैसा कुछ प्रावधान करने की मांग तेज हो सकती है।
रही बात मंडल पार्ट-2 का राजनीतिक मुकाबला करने की तो भाजपा के पास अब राम मंदिर जैसा कोई बहुत सशक्त मुद्दा नहीं बचा है, जो बहुसंख्यक हिंदू समाज को उसी ताकत से एक कर दे, क्योंकि राम मंदिर अब आकार ले ही रहा है और ज्ञानवापी अथवा मथुरा का मंदिर मस्जिद मुद्दा स्थानीय स्तर का ज्यादा है। ऐसे में वापस जातियों के आधार पर हिंदू समाज विभाजित होने के खतरे ज्यादा हैं।
कुल मिलाकर यह देश आर्थिक महाशक्ति बनने के दावों के बीच सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष के अगले चरण के चक्रव्यूह की ओर बढ़ रहा है। इसे कोई चाहकर भी नहीं टाल सकेगा, क्योंकि इसके अपने राजनीतिक लाभ और नुकसान हैं।
असली सवाल यह है कि आरक्षण को हम संघर्ष के किस माइक्रो लेवल तक ले जाना चाहते हैं, क्योंकि कोई भी ऐसी आदर्श स्थिति हो ही नहीं सकती, जिससे समाज का हर तबका संतुष्ट हो। इसके लिए आज नहीं तो कल अनंत काल तक आरक्षण के बजाय आरक्षण लाभ की समय सीमा तय करनी ही पड़ेगी। वरना सभी को सामाजिक न्याय की बात केवल नारेबाजी और सपना ही रहेगा।
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