बात तथ्यों की जाए तो 1950' में संविधान बना और 1955' में नागरिकता कानून आया
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पूरा विपक्ष एक तरफ एक हो गया तो भी 'गैग्स ऑफ वासेपुर' की तर्ज पर मोदी सरकार का सिक्वल आ गया। फिर मन आया उनसे एक लाइन में कह दूं मोदी सरकार दरअसल कांग्रेस की गलतियों को सुधार रही है उसने कश्मीर की धारा 370, तीन तलाक हो और सीएए जैसे मसलों के रूप में की थी। लेकिन मुझे लगा उनके सवाल का तर्कसम्मत जवाब दिया जाना चाहिए, क्योंकि एक जागरूक नागरिक होने के नाते हमारी सामाजिक जिम्मेदारी हैं कि हम उन भ्रान्तियों को दूर करें जो देश को तोड़ती हैं। लेकिन इसमें एक बड़ा जोखिम ये है कि आपको तुरंत किसी विचारधारा विशेष होने का ठप्पा लगा दिया जाता है।
बहरहाल, यदि बात तथ्यों की जाए तो 1950' में संविधान बना और 1955' में नागरिकता कानून आया। ये कानून मोटे तौर पर सिटीजनशिप की परिभाषा तय करता है कि कौन भारत का नागरिक होगा कौन नहीं। इसी नागरिकता कानून में, 1955 में अवैध तरीक़े से बाहर से आए लोगों की एक परिभाषा है। इसमें दो श्रेणियां हैं- एक जो बिना दस्तावेज़ों के आए हैं और दूसरे जो सही कागज़ात के साथ तो आए थे, लेकिन तय वक़्त के बाद भी भारत में ही रह रहे हैं।
1955 का कानून इन दोनों में किसी को नागरिकता का अधिकार नहीं देता। भारत में लाखों हिन्दू ऐसे हैं जो बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान से भाग कर यहां आए और बस गए। अब तक की भारत की सरकारों को जब अपने देश के नागरिकों की चिन्ता नहीं रही तो वे बाहर से आए नागरिकों की क्या फिक्र करते।
वीएचपी ने सीएए का समर्थन किया (फाइल फोटो)
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आप कहते हैं ये संशोधन लाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या आप नहीं जानते कि किसी भी मुस्लिम मुल्क में हिन्दू अल्पसंख्यकों का क्या हाल है? दशकों से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न हुआ है, क्योंकि किसी भी मुस्लिम मुल्क में बसने की पहली शर्त ये है कि आप इस्लाम ग्रहण करें। नहीं तो दूसरे दर्जे के शहरी बन कर रहें। यह सताए हुए लोग भारत में शरण लेने को मजबूर हो गए क्योंकि दुनिया में कोई देश हिन्दुओं को शरण नहीं दे सकता।
एक हिन्दू बहुल आबादी वाला देश है भारत तो वे कहां जाते। पाकिस्तान के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार ‘द डॉन’ ने 20 मार्च, 2015 की रिपोर्ट पढ़िए जो बताती है “पिछले साल पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों से जबरन धर्म परिवर्तन के 265 मामले सामने आए थे, और भारतीय दूतावास के पास विस्थापन के करीब 3,000 आवेदन लंबित हैं।
मैं जम्मू में रहा हूं। यहां सैकड़ों निचली जाति के हिन्दू परिवारों ने आजादी के तुरंत बाद ही भाग कर जम्मू में शरण ली थी। इनके नेता मुझसे आकर मिले थे। वह तकरीबन रोने लगे। कहने लगे-'1947 में सियालकोट के रास्ते हमारे कोई सौ परिवार जम्मू आए। लेकिन आज तक हम इस देश के नागरिक नहीं हैं। चुनाव लड़ना तो दूर वोट तक नहीं दे सकते। हम 70 साल से शरणार्थी हैं।' आसाम और पश्चिम बंगाल में कोई पन्द्रह लाख बंगाली हिन्दू हैं जो भारत के नागरिक नहीं हैं, तो इसलिए सरकार ये संशोधन कानून लाना पड़ा। कांग्रेस भी यही संशोधन लाने वाली थी लेकिन न उसके पास इच्छाशक्ति थी न कोई इरादा था, इसीलिए नागरिकता कानून 1955' के सेक्शन-2 में संशोधन किया गया।
बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान से आने वाले छह समुदाय यानी हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी बौद्ध और जैन को अवैध अप्रवासी की श्रेणी से हटा दिया गया है। यानी उन्हें सीधे नागरिकता दे दी जाएगी। उनकी तकलीफ ये है कि इस संशोधन में सातवें समुदाय 'मुसलमान' शब्द का ज़िक्र नहीं है। यानी अगर इन तीन देशों से कोई मुसलमान अगर बिना दस्तावेज़ों के आया है तो अवैध अप्रवासी ही माना जाएगा और उसे भारत में शरण या नागरिकता की अर्ज़ी देने का अधिकार नहीं होगा।
यकीनन सुनने में बेशक ये अटपटा और बेइंसाफी से भरा लगता है कि बेचारे मुसलमानों को क्यों छोड़ दिया गया? ये तो इंसानियत नहीं है। इस पर सरकार का तर्क है कि बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान मुस्लिम देश हैं। तो वह तो मुसलमानों का अपना मुल्क है। उनका धार्मिक उत्पीड़न कैसे हो सकता है? इसलिए उन्हें छोड़ा जा सकता है।
इधर हिन्दू व अन्य अल्पसंख्यकों का दुनिया में कहीं ठिकाना नहीं तो उनके लिए भारत के दरवाजे खुले हैं। कितनी सीधी और सच्ची बात है। लेकिन आप बुद्धिजीवी पूरी दुनिया में हल्ला मचाकर हिन्दुस्तान को बदनाम कर रहे हैं। उसे असहिष्णु करार दे रहे हैं
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