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क्या वाकई पं. नेहरू अपने मंत्रिमंडल में सरदार पटेल को नहीं शामिल करना चाहते थे?

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हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक किताब का हवाला देते हुए माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर लिखा था कि पं. नेहरू अपने मंत्रिमंडल में सरदार पटेल को नहीं शामिल करना चाहते थे। - फोटो : अमर उजाला
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हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक किताब का हवाला देते हुए माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर लिखा था कि पं. नेहरू अपने मंत्रिमंडल में सरदार पटेल को नहीं शामिल करना चाहते थे। उनके इस ट्वीट पर इतिहासकार रामचंद्र गुहा से उनकी नोंक झोंक भी हुई। खास बात यह है कि देश के विदेश सचिव रहे एस. जयशंकर जैसे जेएनयू प्रोडक्ट गलतबयानी पर आश्चर्य व्यक्त किया जा सकता है। 

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रामचंद्र गुहा ने लिखा कि यह एक मिथक है, जिसे प्रोफेसर श्रीनाथ राघवन झूठा साबित कर चुके हैं।

गुहा ने एस जयशंकर को यह भी कहा कि ‘फेक न्यूज और आधुनिक भारत के दो निर्माताओं के बीच दुश्मनी की गलत बातें फैलाना विदेश मंत्री का काम नहीं है, ये चीजें भाजपा आईटी सेल के लिए छोड़ देना चाहिए।’

पहले भी जब  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस तरह की बातें कही थीं उस समय भी इतिहासकारों और लेखकों ने सप्रमाण मोदीजी को गलत साबित किया था। लेकिन अब जयशंकर मोदी जी को सही साबित करने के लिए मैदान में उतर पड़े हैं।
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एस जयशंकर - फोटो : ANI
हालांकि तथ्य यह है कि जब तक सरदार पटेल जीवित रहे, कांग्रेस में वह पं. नेहरू से ज्यादा ताकतवर रहे। भले ही पं. नेहरू प्रधानमंत्री बन गए थे, लेकिन संगठन पर दबदबा पटेल का ही था और पं. नेहरू को कई अवसरों पर पटेल के सामने खामोश रहना पड़ा, जिसका खमियाजा आगे चलकर देश और कांग्रेस दोनों ने भुगता। ऐसा ही एक मसला समाजवादियों के कांग्रेस से अलग होने का था।

आचार्य नरेंद्रदेव के शिष्य और डॉ. राममनोहर लोहिया के अनन्य सहयोगी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने अपनी आत्मकथा नींव के पत्थर में इस रहस्य से पर्दा उठाया है कि पटेल ने समाजवादियों को कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था।

अपनी आत्मकथा के दूसरे खण्ड के पृष्ठ दो पर कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया लिखते हैं,

“आखिर वे क्या कारण थे, जिनसे जे.पी., डॉ. लोहिया, आचार्य नरेंद्रदेव सरीखे लोगों को कांग्रेस से बाहर होने के लिए बाध्य होना पड़ा?

सत्ता प्राप्त होने पर जब प. जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने और उन्होंने कांग्रेस की अध्यक्षता छोड़ी, उस समय महात्मा गांधी ने आचार्य नरेंद्रदेव को अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया था, जिसको दक्षिणपंथी नेतृत्व ने स्वीकार नहीं किया था।

यह बात सही है कि पं. नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे, लेकिन कांग्रेस संगठन पर सरदार पटेल का वर्चस्व था। उस समय महात्मा गांधी का मत था कि कांग्रेस का लक्ष्य प्राप्त हो गया है और उसे भंग कर देना चाहिए। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यसमिति और दक्षिणपंथी नेतृत्व कांग्रेस को राजनैतिक पार्टी के रूप में रखना चाहता था, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन के परिणामों पर उसका उत्तराधिकार कायम रहे।”

कमांडर साहब पृष्ठ 5 पर लिखते हैं,

“समाजवादी पार्टी के 1948 के नासिक सम्मेलन के पूर्व महात्मा गांधी के शहीद हो जाने के बाद कांग्रेस पर सरदार पटेल का वर्चस्व स्थापित हो गया था। कांग्रेस के संविधान में संशोधन होने के पश्चात् समाजवादी पार्टी के सामने कोई विकल्प नहीं रह गया था। पार्टी को कांग्रेस से बाहर आना ही पड़ा।”

कमांडर साहब एक और घटना का जिक्र करते हैं, जब आचार्य नरेंद्रदेव के खिलाफ उपचुनाव में पं. नेहरू नहीं चाहते थे कि कांग्रेस का उम्मीदवार उतारा जाए लेकिन सरदार पटेल और की जिद पर आचार्य नरेंद्रदेव के खिलाफ कांग्रेस चुनाव भी लड़ी और पं. गोविन्द वल्लभ पंत ने अपने कद के स्तर से नीचे गिरकर टिप्पणी भी की।

कमांडर साहब 35 पर लिखते हैं –

“उस समय पंत जी ने उपचुनाव के एक भाषण में आचार्य जी के विरुद्ध सांकेतिक रूप से यह कहकर चोट की थी कि रावण भी बहुत बड़ा विद्वान् था। दरअसल पंत जी यह सोचकर चिंतित थे कि यदि आचार्य जी विजयी हुए तो वे विरोधी दल के नेता बनेंगे और प्रतिदिन तीखी आलोचना करेंगे। पं. जवाहरलाल नेहरू की भी इच्छा नहीं थी कि कोई आचार्य जी के विरुद्ध चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस संगठन पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ही हावी थे। नीचे दिए गए तथ्य से यह स्पष्ट है कि सरदार पटेल के जीवनकाल में कांग्रेस संगठन पर उन्हीं का कब्जा था।

सन् 1950 में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद के चुनाव में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को अपना प्रत्याशी बनाया था, और पं. नेहरू को चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस के अंदर डैमोक्रेटिक फ्रंट नाम से एक सम्मेलन दिल्ली में हुआ।”

यहां यह बताना जरूरी है कि डॉ. लोहिया ने पं. नेहरू के विरोध में जिस गैर-कांग्रसवाद की रणनीति को अंजाम दिया था, उस रणनीति को धरातल पर उतारने वाली टीम के कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ही थे और उत्तर प्रदेश में जो संविद् सरकार बनी थे उसके प्रमुख शिल्पकारों में शामिल थे।

एसजयशंकर जेएनयू के प्रोडक्ट हैं, उनसे आशा की जानी चाहिए कि वे इस तरह की बयानबाजियों से बचें। 
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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