जीएसटी क्षतिपूर्ति खत्म होने पर उत्तराखण्ड राज्य को करीब 1500 करोड़ रुपये अतिरिक्त जुटाने होंगे।
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उत्पादक राज्य घाटे में और खरीददार लाभ में
संविधान के 101 वें संशोधन से बने नये कानून के तहत जीएसटी की शुरुआत के साथ, उत्पाद शुल्क कानून के समय के पूर्व विनिर्माण-आधारित मॉडल से गंतव्य-आधारित कराधान मॉडल में बदलाव लाया गया। इसका मतलब है कि राजस्व अब उन राज्यों को मिलेगा, जहां वस्तुओं या सेवाओं की खपत होगी। जाहिर था कि यह मॉडल उन राज्यों को पसंद नहीं आया, जिन्होंने अपने अप्रत्यक्ष कर राजस्व को बढ़ाने के लिए विनिर्माण संयंत्रों के निर्माण पर भारी खर्च किया था।
मसलन उत्तराखण्ड जैसे राज्य जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भरपूर सहयोग से जो औद्योगीकरण हुआ वह अब राज्य के लिये कोई बड़ा लाभकारी नहीं रह गया था। क्योंकि उद्योगों से मिलने वाला उत्पाद शुल्क जो कि केन्द्र वसूल करता था और केन्द्रीय विक्री कर का लाभ उस राज्य को मिलने लगा जिस राज्य में वस्तुओं की खपत हो रही है। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में खपत ही कहां है?
उत्तराखण्ड के पंतनगर, हरिद्वार और सेलाकुंई जैसे औद्योगिक आस्थानों में औद्योगिक पैकेज और सस्ती बिजली-पानी और अन्य रियायतों का लाभ उठाने के लिए देश के चोटी के औद्योगिक समूह उत्तराखण्ड आ गये। पंजाब और हिमाचल जैसे राज्यों को उत्तराखण्ड के औद्योगीकरण से परेशानी हो रही थी।
ऐसे बड़े उद्योगों के साथ ऐसे उद्योग भी यहां आ गए जो कि उत्पादन कहीं और करते थे मगर पैकेजिंग उत्तराखण्ड में दिखा कर माल की आपूर्ति दूसरे राज्यों में करते थे। ऐसे पैकेजिंग वाले उद्योगों से भी राज्य को पूरा कर लाभ मिलता था। इसलिये राज्य को ऐतराज भी नहीं था। लेकिन अब लगभग 70 हजार करोड़ के कर्ज के बोझ से दबे उत्तराखण्ड राज्य के सम्मुख नई समस्या खड़ी हो गई है।
उत्तराखण्ड को प्रति वर्ष 1500 करोड़ का घाटा
इस रियायत के खत्म होने पर राज्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन हाल ही में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पालिसी ने किया है। संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी क्षतिपूर्ति खत्म होने पर उत्तराखण्ड राज्य को करीब 1500 करोड़ रुपये अतिरिक्त जुटाने होंगे। वह भी तब जब राज्य में जीएसटी में विकास दर 14 प्रतिशत तक बनी रहे।
प्रदेश में जीएसटी में संग्रह लगातार कम हो रहा है। उत्तराखण्ड के वित्त विभाग के मुताबिक वर्ष 2019-20 में जीएसटी से 6255.33 करोड़ रुपये के संग्रह का अनुमान लगाया गया था। नवंबर तक कुल 3339 करोड़ रुपये का संग्रह ही किया जा सका।
उत्तराखण्ड ने 15 वें वित्त आयोग से भी क्षतिपूर्ति अवधि बढ़ाने की मांग की थी। वित्त विभाग के मुताबिक अगर यह मांग नहीं मानी जाती तो राज्य के पास कर्ज जैसे स्रोतों से भरपाई करने के अलावा और कोई चारा नहीं है।
विनिर्माणकारी राज्यों की समस्याओं को समझते हुए केन्द्र सरकार ने जीएसटी पतिपूर्ति की व्यवस्था की थी। इसके लिए उपकर की व्यवस्था की गई थी। यह जीएसटी उपकर उन राज्यों को पांच साल तक राजस्व में हुए नुकसान की भरपाई करता है। जीएसटी परिषद द्वारा तय किए जाने पर पांच साल की अवधि बढ़ाई जा सकती है। यह उपकर 1 जुलाई 2017 से जीएसटी कानून के साथ लागू हुआ। यह उपकर एक पुल के रूप में कार्य करता है, जो पूर्व अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की समाप्ति पर हुई अंतराल को जोड़ता है।
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