बजट में जैविक खेती और परंपरागत कृषि को प्रोत्साहन देने की सोच है।
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बजट, योजनाएं और फंड
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का बजट 19,000 करोड़ रुपये, तो प्रधानमंत्री आवास योजना का बजट भी 48,000 करोड़ रुपये प्रस्तावित है। ग्रामीण भारत के लिए ये दोनों योजनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनसे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ता है, आधारभूत संरचना का विकास होता है और पक्के मकान बनने से ग्रामीणों का जीवनस्तर सुधरता है, अतः इनके बजट को और बढ़ाने की आवश्यकता है।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय द्वारा कृषि में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरकों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को पिछले वर्ष के 140,122 करोड़ रुपये से घटाकर 105,222 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसके पीछे सरकारी व्यय कम करने के साथ-साथ ज़ीरो बजट खेती, जैविक खेती और परंपरागत कृषि को प्रोत्साहन देने की सोच है।
हमें उर्वरक सब्सिडी को तर्कसंगत बनाना होगा। नाइट्रोजन युक्त यूरिया खाद का ज़रूरत से ज्यादा उपयोग हो रहा है क्योंकि अन्य उर्वरक यूरिया से तीन-चार गुना महंगे पड़ते हैं।इससे ज़मीन में एनपीके तत्वों का अनुपात बहुत असंतुलित हो रहा है। अत्यधिक यूरिया उपयोग से ज़मीन व पर्यावरण दोनों का क्षरण हो रहा है।
इस वर्ष यूरिया सब्सिडी 63,222 करोड़ रुपये प्रस्तावित है जबकि पोषक तत्व आधारित सब्सिडी पिछले साल के 64,192 करोड़ रुपये से घटाकर 42,000 करोड़ रुपये कर दी गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें बढ़ने के कारण सभी रासायनिक उर्वरक बहुत महंगे हो गए हैं। पोषक तत्व आधारित सब्सिडी और बढ़ानी चाहिए जिससे फॉस्फोरस, पोटाश युक्त व अन्य खाद भी यूरिया की तरह सस्ते हो सकें जिससे इनका उपयोग बढ़े, और यूरिया का उपयोग कम हो।
उर्वरक सब्सिडी को भी सीधे किसानों के खातों में नकद प्रति एकड़ के हिसाब से भेजा जाए तो इस सब्सिडी में भारी बचत भी होगी और खाद का अत्यधिक व असंतुलित मात्रा में दुरुपयोग भी नहीं होगा।
आगामी वर्ष में उपरोक्त मंत्रालयों का कुल बजट 382,014 करोड़ रुपये है जो 2022-23 के सम्पूर्ण बजट का 9.7% प्रतिशत है।
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बजट से अपेक्षाएं और ग्रामीण भारत
मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का बजट 4,120 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 6,036 करोड़ रुपये कर दिया गया है। पशुपालन और दुग्ध उत्पादन की कृषि जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है। मत्स्य उत्पादन, दुग्ध प्रसंस्करण और इन क्षेत्रों में मूल्य-संवर्द्धित उत्पादों की मांग व निर्यात की संभावनाओं को देखते हुए यह बहुत कम आवंटन है। इसे बढ़ाकर कम से कम 20,000 करोड़ रुपये करना चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्र में अमूल, इफको जैसी किसानों की अपनी सहकारी संस्थाएं काम कर रही हैं। इस बजट में सरकार ने सहकारी संस्थाओं पर अब तक लगने वाले वैकल्पिक न्यूनतम कर की दर को 18.5 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया है जैसा कि घरेलू कंपनियों पर लगता रहा है। इस विसंगति को इस बजट में दूर कर दिया गया है जो स्वागत योग्य है।
वित्त मंत्री के बजट भाषण में पेश संशोधित अनुमान के अनुसार किसानों और ग्रामीण भारत से सरोकार रखने वाले मंत्रालयों- कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, रसायन और उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग तथा मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का वित्त वर्ष 2021-22 का संयुक्त बजट 426,672 करोड़ रुपये था जो उक्त वर्ष के सम्पूर्ण बजट का लगभग 11.3 प्रतिशत था।
आगामी वर्ष में उपरोक्त मंत्रालयों का कुल बजट 382,014 करोड़ रुपये है जो 2022-23 के सम्पूर्ण बजट का 9.7% प्रतिशत है। मौद्रिक रूप में उपरोक्त मंत्रालयों का इस वर्ष का बजट पिछले साल के मुकाबले भी 10.5 प्रतिशत कम है।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दी जाने वाली खाद्य सब्सिडी को भी पिछले साल के 286,469 करोड़ रुपये से घटाकर 206,831 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है। आर्थिक सर्वेक्षण में कोरोना के बावजूद कृषि क्षेत्र की विकास दर 2020-21 में 3.6% और 2021-22 में 3.9% होने की प्रशंसा की गई थी। कृषि विकास दर बढ़ाने के बावजूद कृषि क्षेत्र का बजट घटाना तो किसानों के साथ अन्याय है। क्या यह किसान आंदोलन की सज़ा है?
(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)
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