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महिलाओं के आर्थिक बोझ को लगातार नजरंदाज कर रहे हैं बजट

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भारतीय परिवेश में महिलाओं की एक्टिव प्रोफेशनल लाइफ और संपत्ति में उनका अधिकार अब भी बहुत कम है। ऐसे में उन पर आर्थिक जिम्मेदारियां पुरुषों की तुलना में अधिक होती हैं। पिछले कुछ वर्षों में बन रहीं आर्थिक योजनाएं और बजट इस जरूरी तथ्य को नजरंदाज कर रहे हैं। - फोटो : PTI
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भारतीय परिवेश में महिलाओं की एक्टिव प्रोफेशनल लाइफ और संपत्ति में उनका अधिकार अब भी बहुत कम है। ऐसे में उन पर आर्थिक जिम्मेदारियां पुरुषों की तुलना में अधिक होती हैं। पिछले कुछ वर्षों में बन रहीं आर्थिक योजनाएं और बजट इस जरूरी तथ्य को नजरंदाज कर रहे हैं। स्त्री जहां खड़ी होती है, वहां बहुत से समूहों, संगठनों और संस्थाओं को यह चाह होती है कि वे इसी के सहारे खुद को स्त्री समर्थक घोषित करवा लें। परिवार में तो ऐसा होता ही है, सरकार में भी ऐसा हो रहा है। बेटी की शादी पर किए गए भव्य खर्च दिखाकर अकसर अभिभावक बेटियों के प्रति ज्यादा लाड प्रदर्शित करते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि इसका बेटियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को कोई सीधा लाभ नहीं पहुंचता। जबकि बेटे को दिया जाने वाला संपत्ति का मालिकाना हक उसकी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाता है। संपत्ति में समान अधिकार दिए जाने के कानून बनाए जाने के बावजूद वास्तविकता यही है। इस बार सरकार में भी ऐसा ही हुआ।

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महिला वित्त मंत्री बनाकर उन्होंने यह साबित किया कि महिलाओं को आर्थिक मोर्चे पर भी ज्यादा भागीदारी देने के प्रति दृढ़संकल्प हैं। जबकि बजट में ऐसा कुछ भी खास नजर नहीं आया जिसे विशेष तौर पर महिलाओं के लिए खास कहा जाए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मौजूदा सरकार का बड़ा चेहरा हैं। इन्हें स्त्री शक्ति के रूप में सरकार कई बार इस्तेमाल करती रही है। बजट से आस लगाए लोग भी यही मान रहे थे कि सरकार की स्त्री शक्ति आम महिलाओं के लिए भी ऐसा खास कुछ लेकर आएंगी, जिससे आर्थिक मोर्चें पर उनकी लड़ाई कुछ और अधिक सुविधाजनक होगी। जबकि ऐसा कुछ भी बजट में नजर नहीं आया। आयकर स्लैब में जो बदलाव किए गए हैं, वह मध्यम वर्ग के लिए राहत लेकर आए हैं। आयकर छूट की न्यूनतम आय को बढ़ाकर पांच लाख रुपये तक कर दिया गया। वित्त वर्ष 2012-13 के बाद से ही महिलाओं और पुरुषों के लिए आयकर की दरें समान कर दी गईं। जबकि बदले हुए समय में महिलाओं पर आर्थिक जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ा है। व्यवसायिक जगत में उनकी भागीदारी बढ़ने के साथ ही परिवार में उनसे आर्थिक अपेक्षाएं बढ़ गईं हैं।
 

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बजट 2020 - फोटो : self
मकान, गाड़ी,  बचत, बच्चों की हायर एजुकेशन आदि को पूरा करने में महिलाओं की आय का अंश अधिक होता है। इसे वे अपनी छोटी बचत और निवेश से मैनेज करती हैं। छोटी बचत महिलाओं की आदत है। यह उनके बड़े सपनों को साकार करने में मददगार साबित होती है। जिसका फायदा पूरे परिवार को मिलता है। पर इस ओर बजट में कोई ध्यान नहीं दिया गया है। अपने घर का सपना अब भी महिलाओं की आय पर ही निर्भर रहा है। पुरुषों का पैतृक संपत्ति में हक रहा है और वे उसका इस्तेमाल भी करते हैं। जबकि महिलाओं के लिए अपने घर का सपना पूरा करने में होम लोन ने बहुत मदद की है। इन्कम टैक्स में होम लोन पर मिलने वाली छूट भी इसमें खासी मददगार साबित हुई है। पर नए टैक्स स्लैब में कर पर मिलने वाली छूट का अगर आप इस्तेमाल करना चाहती हैं, तो आपको पिछली तमाम तरह की छूट को छोड़ना होगा। और अगर आप बचत और निवेश पर मिलने वाली छूट का लाभ लेना चाहती हैं, तो आपको पिछले स्लैब पर ही टैक्स देना होगा। इससे बचत की आदत, बैंकों की बचत योजनाओं और ऋण योजनाओं से होने वाले लाभ को भी नुकसान पहुंचेगा। 

पिछली एक तिमाही में पब्लिक सेक्टर को बहुत नुकसान पहुंचा है। मंदी प्रत्यक्ष रूप से नजर आई है। ऑटो सेक्टर में भी यह नुकसान साफ दिखाई दिया है। रोजगार के साधन कम हुए हैं। महिलाओं की एक्टिव वर्किंग लाइफ पुरुषों के मुकाबले कम होती है। सरकारी पदों को छोड़ दिया जाए तो असंगठित और निजी क्षेत्र में अब भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन और भत्ते नहीं मिल पाते हैं। मंदी और कॉस्ट कटिंग का खामियाजा भी महिलाओं को ही अधिक भुगतना पड़ा है। पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ के सामाजिक- आर्थिक तनाव को समझना और मानना भी बहुत जरूरी है। पर इन मोर्चो पर बजट ने निराश किया है। यही वजह है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट भाषण पूरा होते ही संसद में बैठे सत्ता पक्ष के लोगों ने मेजे थपथपाकर उनका स्वागत किया। जबकि सेंसेक्स धड़ाम हो गया। बैंकिंग, रियल एस्टेट के शेयर गिरने शुरू हो गए। खासतौर से बजट के लिए सेंसेक्स शनिवार को खुला और बंद होते 988 अंक टूट गया। जिससे निवेशकों के 3.6 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ। यह मौजूदा मंदी के कोढ़ में निराशाओं के खाज के संकेत हैं। वित्तमंत्री ने भले ही इसे एस्पिरेशनल इंडिया का बजट कहा हो पर यह भारत की मौजूदा आर्थिक आकांक्षाओं को संबोधित करने में असफल रहा है। खासतौर से महिलाओं के लिए तो यह कुछ भी पॉजीटिव नहीं लेकर आया। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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