बूढ़ी औरत ने कहा कि शहर तो उसके लिए जेल की तरह है और इसलिए वह मुंबई नहीं आना चाहती।
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चाय पीने के बाद मैंने उसे 100 रुपये का नोट दिया, जिसे उसने लेने से पूरी तरह से मना कर दिया। उसे समझाने की मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद वह मानने से इंकार कर रही थी। फिर मैंने उससे कहा कि जब उसके नाती-पोते उससे मिलने आते हैं तो वह इन पैसे से कुछ खरीद कर उन्हें दे देगी। इतना कहकर हमने बस नमस्ते किया और आगे चल दिए।
2 मिनट बाद वह दौड़ती हुई हमारे पास राजमा से भरी बोरी लेकर आती है और कहती है कि जब हम ट्रैक पर जा रहे हैं तो इसे ले जाएं और इसका इस्तेमाल करें।
मैं चौंक गया और एक मिनट के लिए समझ ही नहीं पाया कि उससे क्या कहूं। मैंने उसे सिर्फ 100 रुपये दिए थे और वह मुझे पूरी बोरी दे रही थी जिसका वजन 3 से 4 किलो से अधिक था और जिसका मूल्य कहीं ज्यादा था। मैं इसलिए भी अचरज में था कि वह गरीब थी और यह अनाज लगभग एक महीने तक उसके काम आ सकता था, लेकिन वह यह हमें दे रही थी। हाथ जोड़कर मुझे उसे समझाना पड़ा कि आगे के सफर के लिए हमने पहले ही सामान ले लिया है और वापस जाते समय मैं उससे यह ले लूंगा।
मेरे सभी ट्रैकों में मैं जिन विशाल पहाड़ों से गुजरता हूं, वे मुझे छोटा, बेकार और असुरक्षित महसूस कराते हैं और मुझे ऐसा महसूस कराते हैं कि मैं बस एक छोटा सा कण हूं। खैर इस घटना ने मुझे अंदर से झकझोर कर रख दिया और मैंने महसूस किया कि मैं पहाड़ों से नहीं बल्कि एक बूढ़ी औरत से विनम्र हूं, जिसने उपरोक्त कहावत का सही अर्थ समझा।
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