कोलकता में दुर्गा पूजा के दृश्य
- फोटो : सत्येंद्र प्रताप सिंह
पंडालों में ‘वंदे मातरम्’ से रामायण तक
इस बार कोलकाता के कुछ पंडालों की थीम ने राजनीतिक और वैचारिक चर्चा को भी हवा दी है। संतोष मित्रा स्क्वायर में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ और स्वतंत्रता आंदोलन में गीत की भूमिका को केंद्र में रखा गया है। यहां राष्ट्रवाद और ऐतिहासिक स्मृतियों को कलात्मक प्रस्तुति के माध्यम से सामने लाने की कोशिश है।
अलीपुर सार्वजनिक का पंडाल रामायण पर आधारित है। राम की वनयात्रा, सीता हरण और रावण के साथ युद्ध जैसे प्रसंगों के जरिए धार्मिक आख्यान को पंडाल की कलात्मक संरचना में पिरोया गया है। ऐसे विषय भारतीय धार्मिक परंपराओं और महाकाव्यों को सार्वजनिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाते हैं।
सुरुचि संघ ने 'पद्म' यानी 'कमल' को अपनी थीम बनाया है। भारतीय संस्कृति में कमल का धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्व है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक संदर्भ में कमल को भाजपा के चुनाव चिह्न के रूप में भी देखा जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दर्शक इस थीम को केवल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में देखेंगे या इसके राजनीतिक अर्थ भी तलाशेंगे? हालांकि, केवल प्रतीक के आधार पर आयोजकों की राजनीतिक मंशब्दशा तय करना उचित नहीं होगा।
शुभेंदु की राजनीतिक यात्रा भी पंडाल में
इस साल का सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रयोग अखिल भारतीय हिंदू महासभा की ओर से आयोजित किए जा रहे पंडाल में दिखाई देता है। ‘नंदीग्राम से नवान्न: बुबाई की जययात्रा’ नाम से प्रस्तावित इस पंडाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा को प्रदर्शित करने की योजना है।
इसमें उनके शुरुआती राजनीतिक जीवन, नंदीग्राम आंदोलन, भाजपा में शामिल होने, विधानसभा में विपक्ष के नेता बनने और अंततः मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने के सफर को तस्वीरों, मॉडलों, भित्तिचित्रों और वृत्तचित्र के जरिए दिखाया जाना है। आयोजकों ने इसे शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास बताया है।
यहां एक अहम सवाल खड़ा होता है। दुर्गा पूजा के पंडाल लंबे समय से सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक विषयों को जगह देते रहे हैं। लेकिन किसी मौजूदा मुख्यमंत्री की राजनीतिक यात्रा को पूजा की थीम बनाना उत्सव और समकालीन सत्ता के रिश्ते पर नई बहस पैदा करता है। क्या यह किसी नेता के प्रति समर्थन व्यक्त करने का तरीका है, या बंगाल की राजनीतिक घटनाओं को सांस्कृतिक प्रस्तुति में दर्ज करने की कोशिश? आयोजकों की मंशा अपनी जगह है, लेकिन दर्शकों के लिए इसका अर्थ अलग-अलग हो सकता है।
कोलकता में दुर्गा पूजा के दृश्य
- फोटो : सत्येंद्र प्रताप सिंह
क्या बंगाल की पूजा का रंग बदल रहा है?
इन उदाहरणों से यह कहना आसान होगा कि भाजपा सरकार में दुर्गा पूजा का रंग पूरी तरह बदल रहा है। लेकिन तस्वीर इतनी सरल नहीं है। इसी साल कई पूजा समितियों ने लोककथाओं, बंगाली कला, पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को केंद्र में रखा है। कुम्हारटोली पार्क की थीम गंगा और नदी संरक्षण से जुड़ी है, जबकि चेटला अग्रणी ने बंगाल की लोकसंस्कृति पर ध्यान दिया है। उत्तम कुमार की जन्मशती से जुड़ी थीम भी बंगाल के सिनेमा और सांस्कृतिक स्मृति को सामने लाती है।
इसलिए पंडालों में राजनीतिक या धार्मिक राष्ट्रवाद से जुड़े विषयों की मौजूदगी को पूरे बंगाल की सांस्कृतिक दिशा का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। दुर्गा पूजा की खासियत ही यह है कि एक ही शहर में अलग-अलग समितियां अपनी कल्पना, विचार और कलात्मक दृष्टि के अनुसार पंडाल बनाती हैं। कहीं इतिहास है, कहीं धर्म, कहीं राजनीति और कहीं पर्यावरण या लोकजीवन।
फिर भी सत्ता परिवर्तन के बाद सरकारी आयोजन की शैली, सांस्कृतिक प्रतीकों का चयन और राजनीतिक व्यक्तित्वों को दी जाने वाली जगह पर नजर रखना जरूरी है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि नई सरकार बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को किस तरह प्रस्तुत करना चाहती है और इस प्रस्तुति में किन विषयों को प्राथमिकता मिल रही है।
परंपरा और राजनीति के बीच दुर्गा पूजा
बंगाल की दुर्गा पूजा की ताकत उसकी विविधता में है। यह उत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ कला, शिल्प, संगीत, साहित्य और सामुदायिक भागीदारी का भी उत्सव है। सरकारें बदल सकती हैं, सार्वजनिक कार्यक्रमों का प्रारूप बदल सकता है और पंडालों की थीम में नए विचार शामिल हो सकते हैं, लेकिन इस उत्सव की सामाजिक जड़ें किसी एक राजनीतिक दल से कहीं गहरी हैं।
ईडन गार्डन्स से दुर्गा पूजा का सार्वजनिक आगाज और कुछ पंडालों में राष्ट्रवादी प्रतीकों तथा राजनीतिक जीवन की प्रस्तुति इस साल के उत्सव को एक नया संदर्भ दे रही है। मगर असली सवाल यह नहीं है कि किस सरकार ने किस मैदान में कार्यक्रम आयोजित किया। सवाल यह है कि क्या भव्य सरकारी आयोजन के साथ स्थानीय कलाकारों, कारीगरों, छोटी पूजा समितियों और आम लोगों की भागीदारी को भी उतना ही महत्व मिलेगा।
भाजपा के राज में पूजा नए अंदाज में दिखाई दे रही है, लेकिन बंगाल की दुर्गा पूजा का भविष्य किसी एक थीम या आयोजन से तय नहीं होगा। उसकी पहचान इस बात से तय होगी कि वह अपनी पुरानी सांस्कृतिक जड़ों को बचाते हुए नए विचारों, कलात्मक प्रयोगों और सामाजिक विविधता के लिए कितनी जगह बनाए रखती है।
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