ब्रह्मांड में कहीं पर स्वर्ग है तो वो पृथ्वी पर ही है, और वो स्वर्ग की सुंदरता है प्रकृति। ये पेड़- पौधे जो हमे निरंतर प्राणवायु प्रदान करते हैंं। छांव, लकड़ी, फल, अनाज, औषधि इत्यादि देते हैं। फूल, जिससे मानव जीवन में कई प्रकार की सजावट करने की एक प्रणाली रही है और भगवान को अर्पण किए जाते हैं। झरना, नदी, झील और समुंदर हमारी पानी से जुडी हुई जरूरतोंं को पूर्ण करते हैं। भिन्न- भिन्न प्रकार के छोटे जीव-जंतु, एवं वन्य पशु, पंछी की प्रजातियां भी ये सृृृृष्टि की विशेषता है।
ये हरियाली, जीव और पशु- पंछी नहीं तो ये प्रकृति नहीं और प्रकृति नहीं तो पृथ्वी पर स्वर्ग नहीं। ये प्रकृति और उसके साथ जुड़ी हुई सारी चीजों के रंग हैंं ही इतने सुहाने की किसी को भी मोहित कर देते हैं। अगर किसी को ये प्रकृति की सुंदरता पसंद नहीं तो समझ लो वो इंसान क्रूर है। मुझे बचपन से ही प्रकृति की विभिन्नता पसंद है, पक्षियों से कुछ ज्यादा ही लगाव है। वो रंग-बिरंगी, उड़ते उछलते, कलरव करते हुए पंछी मुझे बहुत आनंद प्रदान करते हैं।
जैसे कई देर तक पंछियो को देखते रहना उसकी गतिविधियों का निरीक्षण करना और हो सके तब तक उसका पीछा करना मुझे अच्छा लगता है। मुझे जब भी मौका मिलता है तब मैं पंछियों को देखती हूं, अवलोकन करती हूं। लेकिन कभी ऐसा मौका नहीं मिला की कई दिनों तक मैं ऐसे पंछियों को निहार सकूं, निरीक्षण कर सकूं। कोरोना वायरस से फैली हुई महामारी की वजह से रचे गए लॅाकडाउन ने मुझे ये मौका दिया।
इस साल, कोरोना महामारी की वजह से पूरे देश में लॅाकडाउन था और सब लोग अपने घर पर ही थे। सब कुछ बंद होने से प्रदुषण में भी बहुत कमी हई और प्रकृति को तो जैसे उत्तम आनंद की अनुभूति हुई। हमारा कार्यालय भी कुछ दिनों के लिए बंद था और मैं भी अपने घर चली गई थी, मेरे गांव। गांव के एक छोर पर हमारा घर है, और बागीचा है जिसमें फूल के पौधे एवं फल के बड़े पेड़ हैं।
बड़े पेड़ होने की वजह से बहुत सारी चिड़ियां यहीं रहती हैं और हमने छोटे मटके रखे हुए हैं जिसमें वो अपना घोंसला बनाती हैं। यहां पर रहने की वजह से चिड़ियों को लगता है कि ये बागीचा उसी की मालिकी का है और जब दूसरे पंछी जैसे बुलबुल, मैना, कबूतर आते हैं तो उसके पीछे पीछे ही घूमती है और उसे भगाने की फिराक में रहती है। शाम को सूरज ढ़लने के समय सारी चिड़ियां एकसाथ ची-ची करके घर का माहौल ची-ची मय बना देती हैं।
लोग कहते हैं कि शाम को चिड़िया 'शिव शिव' बोलती हैं और फिर अंधेरा होते ही सो जाती हैं, लेकिन वो 'शिव शिव' नहीं बोलती, अगर आप गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि पेड़ पर जगह पाने के लिए एक दूसरे से झगड़ा करती हैं और ची-ची करती हैं। लॅाकडाउन के शुरू में इतनी गर्मी नहीं थी लेकिन कुछ दिनों के बाद गर्मी में काफी बढ़ोतरी हुई। कड़ी धूप की वजह से खेत-खलियान से पंछी गांव की ओर आते हैं और हमारे बागीचे में पेड़ की छांव में अपना समय व्यतीत करते हैं।
छांव के साथ-साथ बागीचे में पानी, खाने के लिए दाने और पेड़ पर लगे फल भी मिल जाते हैं, पंछियों को उससे ज्यादा और क्या चाहिए! लॅाकडाउन में घर पे रहने से मुझे अपने घर पे ही पंछियों को निहारने और निरीक्षण करने का मौका मिल गया। दोपहर के समय जब एकदम शांति होती है तब चुपके से तोता आता है और बिना आवज किए आम खाने लग जाता है।
वो भी आम की छाल (फल का ऊपरी आवरण) निकाल कर, हमें तो तब पता चलता है जब नीचे छोटे छोटे टुकड़ो में बिखरी हुई आम की छाल दिखती है, और जब तोता कोई आम को आधा छोड़कर चला जाता है तब बुलबुल उस आम को खाने लग जाती है, वो भी मधुर ध्वनि से गुनगुनाते हुए।
सुबह जब धुप सख्त होने लगती है तब कुछ बया पक्षी (Weaver Bird) का झुंड बागीचे में आता है और फिर शाम तक रहता है। पूूरे दिन दाना चुगना और ऊंची आवृति में शोर मचाना ही उसका काम होता है, बया पक्षी की चीखें इतनी लंबी और ऊंची होती हैं कि बागीचे में रहकर आप फोन पर किसी से बात नहीं कर सकते हैं। कुछ दिनों बाद उसमें से कुछ बया पक्षियों ने बागीचे में ही घोंसला बनाना शुरू किया, कितना सुंदर होता है ना उसका घोंसला, आपने देखा है?
नारियल के पत्ते से पतली सी डोर निकाल कर एक दूसरे के साथ ऐसे परोह कर घोंसला बनाता है मानोंं किसी महाविद्यालय से खास अध्ययन किया हो। एक दोपहर को मैंने देखा की एक शकरखोरा (Sunbird) उड़ते उड़ते ही टपकते नल से पानी पी रहा है, वो छोटा सा पंछी अपनी छोटी सी पंख को इतनी तेज गति से फड़फड़ाते हुए नल के नीचे एक जगह स्थिर उड़ कर टपकती बूंद को अपनी चोंच में भर रहा है, उस समय मेरा दुर्भाग्य रहा की ये अप्रतिम दृश्य को मैं अपने कैमरे में कैद ना कर सकी।