फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जब नन्ही सी मुनिया फुदक कर बालकनी में आ बैठी..!

विज्ञापन
जुलाई से सितंबर मुनिया चिड़िया के घोंसला बनाने के दिन होते हैं। - फोटो : (फोटो बाएं से): जय गोविंंद
विज्ञापन

जब से हमारा छह बरस का लैब्राडोर अचानक एक दिन हम सब को छोड़ परलोक सिधार गया, मन में एक रिक्त सा स्थान छूट गया। हम अपने-अपने तरीके से उसकी यादों को संजोते हुए वो खालीपन भरने की कोशिश करते रहते हैं। उसके देहांत का असर इतना गहरा होगा ये कभी सोचा न था। अहसास तो तब हुआ जब सब के कामों की व्यस्तता में मैं घर पर अकेली रह गई।  

विज्ञापन



सोचा थोड़ा बागबानी में उलझा लूं तो समय भी काट जाएगा और याद भी नहीं सताएगी। बड़े जतन से तरह-तरह के पौधें नर्सरी से ढूंढ कर लाए और मिट्टी खाद पानी देना शुरू किया, पर शायद पौधे भी मेरे भाग्य में न थे। छठे  मंजले के घर में बालकनी पर छज्जा न होने के कारण तीखी धूप और गरजती बारिश ने कुछ ही महीनों में पौधों को इतना तड़पाया कि निराश से पौधे गमलों में बस खड़े हुए रह गए।

बाकी की रही-सही कसर जालिम कबूतरों ने पूरी कर दी। नोंच-नोंच के सभी पौधों की पत्तियां यूं उखाड़ी कि कुछ पौधे तो अपनी जान ही गवां बैठे और तो और पूरी बालकनी को अपनी बीट से मैला कर उसे बैठने लायक भी नहीं छोड़ा।  
विज्ञापन


यूं परेशान  हो कर सोचा चलो एक टिन शेड और कबूतर जाली भी लगा ली जाए। सो वही किया। धूप और कबूतरों के आक्रमण से बचकर पौधे वापस हरे हो चले थे। लेकिन गंदगी और पौधों का नुकसान भूल जाओ तो कबूतरों की गुटरगूं घर के सन्नाटे को थोड़ा तो भेदती थी। पर जाली लगने से किसी भी पक्षी के आने की संभावना ना के बराबर हो गई थी। और मैं फिर से अकेली। 

फिर सारी दुनिया जैसे थम गई। कोरोना वायरस ने सब के घरों को उनका पिंजरा बना दिया। दिन-रात घर की चारदीवारी में सब अपने-अपने कमरों में बंद हो गए। ऑनलाइन क्लास और ऑफिस के काम में घर पर सब होते हुए भी सन्नाटा ही रहता।

ऐसे में एक दिन जैसे की मेरी तन्हाई को मिटाने एक नन्ही सी मुनिया चिड़िया फुदक कर जाली पार कर बालकनी में आ बैठी। उस रोज बड़े दिनों बाद एक हलकी सी खुशी हुई। रोज मैं बाट देखती की चिड़िया फिर आ जाए। अगली बार मुनिया अपने जोड़ीदार को संग ले आई।

जुलाई से सितंबर मुनिया चिड़िया के घोंसला बनाने के दिन होते हैं। यूं तो खेतोंं में मुनिया चिड़िया का आना किसान को कतई नहीं भाता क्यूंकि मुनिया बीजों को खा जाती है और फसल का नुकसान होता है। खेत खलिहानों के घटने से मुनिया ने शहरों को अपना लिया है और ऊंची इमारतों में घोंसला बना लेती हैं।  

दो तीन दिन तक दोनों मुनिया बालकनी की जांच परख में लगी रही। दोनों चिड़ियों ने अपने घोंसले के लिए उपरोक्त जगह और खतरे की संभावना पर विचार-विमर्श कर आखिरकार घास का पहला पत्ता लाए और शेड के एक कोने में अपना घर बनाने लगी।

लेकिन उनकी चुनी हुई जगह पर हवा के थपेड़ों से घोंसला टिक ही नहीं रहा था। जब तक बेचारी दूसरा घास का पत्ता लाती पहला उड़ कर बालकनी के जमीन पर पड़ा हुआ होता। उनकी मेहनत बेकार जाते देख मैंने उनकी मदद करने की कोशिश की।

विज्ञापन

मुनिया चिड़िया ज्यादातर झुंड में चुगने जाती हैं...

चिड़िया कुछ ही दिन का डेरा जमाएंगी मेरी बालकनी में। - फोटो : सुभद्रा देवी
एक तार को मोड़ मरोड़ कर एक जाली नुमा ढांचा तैयार किया और जब दोनों नए पत्ते की खोज में उड़ गईं तो उस तार के घोंसले को उनकी चुनी हुई जगह पर बांध दिया। साथ ही जमीन पर बिखरे हुए सारे पत्तों को उस तार में अटका दिया। धीरे-धीरे चिड़ियों के लाए हुए पत्ते तार के घोंसले में टिकने लगे और एक अस्त व्यस्त सा घोंसला तैयार हो गया।  

मैं बालकनी में सिर्फ पौधों में पानी डालने जाने लगी क्योंकि चिड़ियों को अभी भी मुझ पर शक था और मेरे बालकनी में जाते ही वे फुर्र से उड़ जातीं। कुछ दिनों यूं ही चला और मुझे चिड़ियां दिखना भी बंद हो गईं।

घोंसले के हरे घास के पत्ते भी पीले सूखे दिखने लगे। मैं निराश हो गई यह सोच कर की चिड़ियों ने इतनी मेहनत के बाद मेरी बालकनी को अपना घर बनाने के योग्य नहीं समझा। मैंने अपनी हरी-भरी बालकनी में फिर सुबह शाम की चाय और यूं ही बारिश देखने के लिए बैठना शुरू कर दिया।

एक दिन मुझे बहुत ही हल्की सी चू चू  की आवाज घोंसले की तरफ से आई और मुनिया का जोड़ा भी फिर आता जाता दिखा। सुन कर समझ आया की हमारी बालकनी में अब सिर्फ मुनिया जोड़े का घर नहीं बल्कि नन्हे बच्चों का भी घर बन गया था। इतने दिनों से चिड़ियों के न दिखने का कारण भी उस दिन समझ आया।  

मुनिया चिड़िया ज्यादातर झुंड में चुगने जाती हैं और एक दुसरे के घोंसलों को परखने भी इकट्ठा होती हैं। जिस दिन से चूजों की आवाज आई तभी से चार से पांच मुनिया चिड़िया बालकनी के दरवाजों पे बैठी दिख जाती थी। अब चीप-चीप के शोर से बालकनी में जैसे जान आ गई थी।  

लैब्राडोर के जाने के बाद मुनिया चिड़िया का जोड़ा पहला जीता जागता प्राणी था जो हमारे घर में आया भी और खुशहाल रहने भी लगा है। चिड़ियों ने मेरा बालकनी में चाय पीना और पानी डालना स्वीकार कर लिया है। अब वो घबरा के उड़ नहीं जाती। वो अपने काम में व्यस्त रहती है और में अपने।  

जानती हूं कि चिड़िया कुछ ही दिन का डेरा जमाएंगी मेरी बालकनी में पर लैब्राडोर की मृत्यु और पौधों की दुर्दशा से मन मेंबैठ गया था कि मेरे यहां परजीव कभी पनपेगा नहीं। भला हो मुनिया जोड़े का जिसने यह भ्रम तोड़ दिया और फिर आने की आस भी जगा दी।  

और हां इस बार मेरे गुड़हल में भी खूब फूल आए......।

(शोमा अभयंकर पुणे में रहती हैं और प्राकृतिक सौंदर्य और जीवन पर लगातार लिख रही हैं. )

यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें