जब से हमारा छह बरस का लैब्राडोर अचानक एक दिन हम सब को छोड़ परलोक सिधार गया, मन में एक रिक्त सा स्थान छूट गया। हम अपने-अपने तरीके से उसकी यादों को संजोते हुए वो खालीपन भरने की कोशिश करते रहते हैं। उसके देहांत का असर इतना गहरा होगा ये कभी सोचा न था। अहसास तो तब हुआ जब सब के कामों की व्यस्तता में मैं घर पर अकेली रह गई।
सोचा थोड़ा बागबानी में उलझा लूं तो समय भी काट जाएगा और याद भी नहीं सताएगी। बड़े जतन से तरह-तरह के पौधें नर्सरी से ढूंढ कर लाए और मिट्टी खाद पानी देना शुरू किया, पर शायद पौधे भी मेरे भाग्य में न थे। छठे मंजले के घर में बालकनी पर छज्जा न होने के कारण तीखी धूप और गरजती बारिश ने कुछ ही महीनों में पौधों को इतना तड़पाया कि निराश से पौधे गमलों में बस खड़े हुए रह गए।
बाकी की रही-सही कसर जालिम कबूतरों ने पूरी कर दी। नोंच-नोंच के सभी पौधों की पत्तियां यूं उखाड़ी कि कुछ पौधे तो अपनी जान ही गवां बैठे और तो और पूरी बालकनी को अपनी बीट से मैला कर उसे बैठने लायक भी नहीं छोड़ा।
यूं परेशान हो कर सोचा चलो एक टिन शेड और कबूतर जाली भी लगा ली जाए। सो वही किया। धूप और कबूतरों के आक्रमण से बचकर पौधे वापस हरे हो चले थे। लेकिन गंदगी और पौधों का नुकसान भूल जाओ तो कबूतरों की गुटरगूं घर के सन्नाटे को थोड़ा तो भेदती थी। पर जाली लगने से किसी भी पक्षी के आने की संभावना ना के बराबर हो गई थी। और मैं फिर से अकेली।
फिर सारी दुनिया जैसे थम गई। कोरोना वायरस ने सब के घरों को उनका पिंजरा बना दिया। दिन-रात घर की चारदीवारी में सब अपने-अपने कमरों में बंद हो गए। ऑनलाइन क्लास और ऑफिस के काम में घर पर सब होते हुए भी सन्नाटा ही रहता।
ऐसे में एक दिन जैसे की मेरी तन्हाई को मिटाने एक नन्ही सी मुनिया चिड़िया फुदक कर जाली पार कर बालकनी में आ बैठी। उस रोज बड़े दिनों बाद एक हलकी सी खुशी हुई। रोज मैं बाट देखती की चिड़िया फिर आ जाए। अगली बार मुनिया अपने जोड़ीदार को संग ले आई।
जुलाई से सितंबर मुनिया चिड़िया के घोंसला बनाने के दिन होते हैं। यूं तो खेतोंं में मुनिया चिड़िया का आना किसान को कतई नहीं भाता क्यूंकि मुनिया बीजों को खा जाती है और फसल का नुकसान होता है। खेत खलिहानों के घटने से मुनिया ने शहरों को अपना लिया है और ऊंची इमारतों में घोंसला बना लेती हैं।
दो तीन दिन तक दोनों मुनिया बालकनी की जांच परख में लगी रही। दोनों चिड़ियों ने अपने घोंसले के लिए उपरोक्त जगह और खतरे की संभावना पर विचार-विमर्श कर आखिरकार घास का पहला पत्ता लाए और शेड के एक कोने में अपना घर बनाने लगी।
लेकिन उनकी चुनी हुई जगह पर हवा के थपेड़ों से घोंसला टिक ही नहीं रहा था। जब तक बेचारी दूसरा घास का पत्ता लाती पहला उड़ कर बालकनी के जमीन पर पड़ा हुआ होता। उनकी मेहनत बेकार जाते देख मैंने उनकी मदद करने की कोशिश की।