बिपिन चंद्र पाल एक प्रबुद्ध व्यक्ति थे।
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उन्होंने देशवासियों को यह विचार दिया कि 'विदेशी उत्पादों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था खराब हो रही है और बेरोजगारी भी बढ़ रही है।' अतः विदेशी चीजों का बहिष्कार करें और स्वदेशी चीजों का उपयोग करें। विपिन चंद्र पाल एक प्रबुद्ध व्यक्ति थे।
उन्होंने अपने लेखनी की शक्ति से आम जनमानस में सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रवाद की भावना को जागृत किया और इसके लिए उन्होंने पत्रकारिता के मार्ग को अपनाया। उनकी प्रमुख पुस्तकों में- 'राष्ट्रीयता और साम्राज्य', 'भारतीय राष्ट्रवाद', 'स्वराज और वर्तमान स्थिति', 'द सोल ऑफ इंडिया', 'द बेसिस ऑफ सोशल रिफॉर्म', 'द हिंदुज्म' और 'द स्परिट' आदि सम्मिलित हैं।
उन्होंने 'डेमोक्रेसी' तथा 'स्वतंत्र' आदि अनेक पत्रिकाओं का संपादन भी किया। 'न्यू इंडिया', 'वंदे मातरम' और 'स्वराज' उनकी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं है। 'अमृत बाजार पत्रिका' में भी उन्होंने अपना योगदान दिया। 1906 मे उन्हें 'वंदे मातरम' पत्र में उनके द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध जनमत तैयार करने और 'अरविंद घोष' पर चल रहे राजद्रोह के मुकदमे पर गवाही न देने के कारण 6 माह का कारावास भी हुआ। निर्भीक व स्पष्ट वक्ता विपिन चंद्र पाल का कहना था कि- 'दासता मानवीय आत्मा के विरुद्ध है, भगवान ने समस्त प्राणियों को स्वतंत्र बनाया है।'
बिपिन चंद्र पाल बहुत ही स्पष्टवादी थे। जिस विचार से सहमत न होते थे, उसे तुरंत स्पष्ट कर देते थे। ब्रिटिश सरकार के प्रति गांधी जी के रवैये से असहमत होने पर वे गांधी जी की आलोचना करने से भी नहीं चूके। वे ऐसे प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने गांधी या गांधीपंथ की आलोचना करने का साहस किया।
उन्होंने गांधीजी को 'तार्किक की बजाय जादुई विचारों वाला' कहकर उनकी आलोचना की। 1920 में स्वेच्छा से उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया, परंतु वे आजीवन राष्ट्रीय समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त करते रहे।
स्वतंत्रता संग्राम के इस सेनानी ने भारत की स्वतंत्रता का स्वप्न आंखों में संजोए 20 मई 1932 को सदैव के लिए आंखों मूंद ली। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को आम जनमानस से जोड़ने, राष्ट्रवाद की भावना को जगाने तथा उसे एक नई सार्थक दिशा देने के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर फैली कोरोना महामारी के परिणामतः जो आर्थिक परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं, उनके चलते आज देश को पुनः विपिन चंद्र पाल के दिए हुए स्वदेशी तथा स्वावलंबी बनने के विचार को अपनाने की आवश्यकता है। आज देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए स्वदेश निर्मित वस्तुओं के उपयोग की नीति को अपनाना होगा, जिससे बेरोजगारी से भी बचा जा सके और देश स्वावलंबी बन सके।
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