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2024 चुनाव: नीतीश कुमार के सामने चंद्रबाबू नायडू का रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती

सार

नीतीश कुमार की कोशिशें कितना रंग लाएंगी, इस पर अभी तो जनता को संदेह ही है। वैसे, बीजेपी की कोशिश भी यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे कोई चेहरा विपक्ष आगे करे। फिर वो राहुल गांधी हों या नीतीश कुमार, बीजेपी को इसमें फायदा ही नजर आता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को एक साल का समय शेष है।
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नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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वर्ष 2018 में चंद्रबाबू नायडू बीजेपी नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग हुए थे और गैर बीजेपी दलों की आंखों का तारा बन गए थे। उन्होंने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले शायद ही कोई ऐसा राज्य छोड़ा था, जहां जाकर गैर बीजेपी दलों के नेताओं से मुलाकात न की हो। उस समय यह मशहूर था कि चंद्रबाबू नायडू अपने साथ कुछ शॉल और मिठाई के डिब्बे रखते हैं और जहां कोई विपक्षी नेता मिलता है, उसे शॉल ओढ़ा देते हैं।

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कुछ-कुछ ऐसी ही भूमिका में इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नजर आ रहे हैं। चंद्रबाबू नायडू की तरह नीतीश कुमार भी एनडीए का हिस्सा रहे हैं और एनडीए के साथ मिलकर सत्ता का लाभ ले चुके हैं। दोनों में अंतर यह है कि जहां चंद्रबाबू नायडू अकेले जहाज लेकर उड़ रहे थे, वहीं नीतीश कुमार को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथी और बिहार में उनके डिप्टी तेजस्वी यादव का साथ मिला रहा है।

चंद्रबाबू नायडू तो विपक्षी एकता के सहारे चुनावी वैतरणी को पार करने में असफल रहे थे, क्या नीतीश कुमार चंद्रबाबू नायडू का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे?
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जनता दल (यू) के सुप्रीमो नीतीश कुमार को लेकर कुछ समय पहले ऐसी खबरें चली थीं कि वह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के संयोजक बन सकते हैं और बिहार की सत्ता तेजस्वी यादव को सौंपकर राष्ट्रीय राजनीति कर सकते हैं। हालांकि, अभी तक इस खबर पर मुहर नहीं लगी है, लेकिन पिछले दिनों से नीतीश कुमार ने अपने विपक्षी जोड़ो अभियान की शुरुआत दिल्ली में कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात के साथ शुरू की। दिल्ली में वह आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल से भी मिले।

नीतीश कुमार ने पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से मुलाकात की है। उप्र, बिहार और पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 162 सीटें आती हैं और वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में यहां एनडीए ने 121 सीटों पर सफलता हासिल की थी। हालांकि, तब बिहार में नीतीश कुमार की जद (यू) एनडीए का हिस्सा थी। इस बार वो राजद और कांग्रेस के साथ जा रहे हैं।

वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, तब विपक्ष पूरी तरह बिखर गया था। वर्ष 2019 में चंद्रबाबू नायडू ने विपक्षी एकता की भरपूर कोशिश की और कुछ राज्यों में गठबंधन हुए भी जैसे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी साथ आए, पर वे भी कोई बहुत बड़ा चमत्कार नहीं कर सके।

उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता की पहल

नीतीश कुमार जब अखिलेश यादव से लखनऊ में मिल रहे थे तो मायावती ने उनसे दूरी बना ली। उप्र में कांग्रेस का जनाधार खत्म हो गया है। मायावती अब शायद महागठबंधन में शामिल न हों तो उप्र में विपक्षी एकता कैसे कायम रहेगी? अखिलेश यादव की पार्टी उप्र में लगातार चुनाव हार रही है। देश के सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाले उप्र में मोदी, शाह, योगी की तिकड़ी को विपक्ष कैसे टक्कर देगा?

नीतीश के अपने राज्य बिहार से 40 लोकसभा सीटें आती हैं और पिछले कुछ उपचुनावों में जिस तरह से बीजेपी ने जद (यू), राजद व कांग्रेस के महागठबंधन को कड़ी टक्कर दी और सफलता हासिल की है, उससे तो लगता नहीं कि नीतीश कुमार अपने घर में कुछ कमाल करने जा रहे हैं। फिर बिहार में नीतीश कुमार की जो छवि है, वो बार-बार साथी बदलने वाले नेता की भी हो गई है।

नीतीश कुमार की पार्टी का स्वयं का वोट बैंक लगातार कम हो रहा है। जैसे परिवारवादी पार्टियां चल रही हैं, वैसे ही नीतीश कुमार जद (यू) को चला रहे हैं। वो राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गए हैं और केवल सत्ता के लिए कभी बीजेपी तो कभी राजद का साथ लेते चले आ रहे हैं।

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विपक्षी दलों से मिल रहे नीतीश कुमार - फोटो : ANI
पश्चिम बंगाल में न तो जद (यू) का कोई वोटबैंक है, न अखिलेश का और न कांग्रेस का। अखिलेश यादव ने पिछले दिनों कोलकाता में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की थी। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के साथ खड़े हुए थे, लेकिन ममता, राज्य में कांग्रेस के साथ जाएंगी या वामदलों को सीटें देंगी, इसकी संभावना करीब-करीब असंभव है। मतलब साफ है, पश्चिम बंगाल में विपक्ष साथ नहीं है।

पश्चिम बंगाल के बाहर ममता अपनी पार्टी के विस्तार की कोशिशें कर चुकी हैं और उन्होंने अब तक असफलता ही हासिल की है। पिछले दिनों उनका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी छिन गया था। पश्चिम बंगाल के बाहर ममता कैसे विपक्ष को मजबूत करेंगी? इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों में साथी दलों को सीटें देगी, यह अब तक तो नजर नहीं आता है। पंजाब में भी कांग्रेस अकेले ही चुनाव लड़ती नजर आ रही है। लोकसभा की दृष्टि से तमिलनाडु भी विपक्ष के लिए बड़ा राज्य है, लेकिन यहां पहले से कांग्रेस और द्रमुक में गठबंधन चला रहा है। यहां वर्ष 2019 वाली स्थिति रहने वाली है, जब द्रमुक-कांग्रेस ने साथ चुनाव लड़ा था।

महाराष्ट्र की बदलती राजनीति

एक और बड़ा राज्य महाराष्ट्र है, जहां से लोकसभा की 48 सीटें आती हैं और वर्ष 2019 के चुनाव के बाद यहां समीकरण बदले हैं। तब भी बीजेपी और शिवसेना ने 41 सीटें जीती थीं। पहले कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी में गठबंधन था और अब उद्धव ठाकरे का शिवसेना वाला गुट भी उसमें शामिल है। हालांकि, शरद पवार के जो तेवर इन दिनों दिख रहे हैं। उनके भतीजे अजीत पवार को लेकर जो खबरें तैर रही हैं, उससे लगता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर हो सकता है।

तेलंगाना में भारत राष्ट्रीय समिति (बीआरएस) के सुप्रीमो के.चंद्रशेखर राव भी नीतीश कुमार की तरह विपक्षी एकता के लिए फेविकोल का काम करते आ रहे हैं। वो तेलंगाना में विपक्ष दलों का जमावड़ा लगाते रहते हैं, लेकिन जब तेलंगाना में सीट शेयरिंग की बात होगी तो वो 'एकला चलो की नीति' पर ही चलने लगते हैं। इस साल होने वाले तेलंगाना विधानसभा चुनाव में उनकी स्थिति कमजोर बताई जा रही है और चुनाव के नतीजे साफ कर देंगे कि वर्ष 2024 में तेलंगाना में क्या परिस्थितियां बनने वाली हैं? फिर के. चंद्रशेखर राव खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी मानते हैं।

अन्य राज्यों की बात करें तो झारखंड में पहले से बीजेपी बनाम झामुमो, राजद, कांग्रेस का गठबंधन है और अब उसमें जद (यू) भी शामिल हो जाएगा। ओडिशा में बीजू जनता दल के सुप्रीमो नवीन पटनायक किधर जाएंगे या अकेले रहेंगे, यह तय नहीं कर पाए हैं। संभावना यही है कि वह अकेले ही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि, उनके नाम को लेकर चर्चाएं चलती रहती हैं कि उन्हें भी यूपीए का संयोजक बनाया जा सकता है।

केरल में पहले से ही वामदल और कांग्रेस के गुट हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी कांग्रेस को कुछ देने वाली है या गठबंधन करने वाली है, इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। दिल्ली में जरूर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के मिलकर लड़ने की कुछ-कुछ संभावनाएं हैं।


नीतीश कुमार की कोशिशें कितना रंग लाएंगी?

असम में बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस के साथ एआईयूडीएफ व अन्य दल आ सकते हैं, लेकिन इनकी राह आसान नहीं होगी। उत्तर-पूर्व के राज्यों में छोटे-छोटे दल हैं और कांग्रेस वहां करीब-करीब खत्म हो गई है। कांग्रेस स्वयं को राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानती है और कोशिश में रहती है कि सभी क्षेत्रीय दल उसकी छतरी के नीचे आ जाएं, लेकिन कांग्रेस के विरोध में बने अधिकांश क्षेत्रीय दलों को यह अस्वीकार्य है।

दूसरा, कांग्रेस राहुल गांधी को प्रोजेक्ट करने पर तुली है और विपक्ष को राहुल गांधी का नाम पच नहीं रहा है। ममता बनर्जी तो खुलकर कह चुकी हैं कि राहुल गांधी के नाम पर चुनाव लड़ेंगे तो हार निश्चित है।

नीतीश कुमार की कोशिशें कितना रंग लाएंगी, इस पर अभी तो जनता को संदेह ही है। वैसे, बीजेपी की कोशिश भी यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे कोई चेहरा विपक्ष आगे करे। फिर वो राहुल गांधी हों या नीतीश कुमार, बीजेपी को इसमें फायदा ही नजर आता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को एक साल का समय शेष है।

अब अगले एक साल नीतीश का जहाज चंद्रबाबू नायडू की भांति उड़ता रहेगा या फिर नरेंद्र मोदी को टक्कर देगा? हालांकि, यह आसान नहीं होगा, क्योंकि अभी जितने भी सर्वे आ रहे हैं और तो और स्वयं विपक्ष भी यही मानकर चल रहा है कि वर्ष 2024 में नरेंद्र मोदी को चुनौती नहीं दी जा सकती। क्या नीतीश कुमार अगले चंद्रबाबू नायडू बनने वाले हैं?


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 
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