विपक्षी दलों से मिल रहे नीतीश कुमार
- फोटो : ANI
पश्चिम बंगाल में न तो जद (यू) का कोई वोटबैंक है, न अखिलेश का और न कांग्रेस का। अखिलेश यादव ने पिछले दिनों कोलकाता में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की थी। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के साथ खड़े हुए थे, लेकिन ममता, राज्य में कांग्रेस के साथ जाएंगी या वामदलों को सीटें देंगी, इसकी संभावना करीब-करीब असंभव है। मतलब साफ है, पश्चिम बंगाल में विपक्ष साथ नहीं है।
पश्चिम बंगाल के बाहर ममता अपनी पार्टी के विस्तार की कोशिशें कर चुकी हैं और उन्होंने अब तक असफलता ही हासिल की है। पिछले दिनों उनका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी छिन गया था। पश्चिम बंगाल के बाहर ममता कैसे विपक्ष को मजबूत करेंगी? इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों में साथी दलों को सीटें देगी, यह अब तक तो नजर नहीं आता है। पंजाब में भी कांग्रेस अकेले ही चुनाव लड़ती नजर आ रही है। लोकसभा की दृष्टि से तमिलनाडु भी विपक्ष के लिए बड़ा राज्य है, लेकिन यहां पहले से कांग्रेस और द्रमुक में गठबंधन चला रहा है। यहां वर्ष 2019 वाली स्थिति रहने वाली है, जब द्रमुक-कांग्रेस ने साथ चुनाव लड़ा था।
महाराष्ट्र की बदलती राजनीति
एक और बड़ा राज्य महाराष्ट्र है, जहां से लोकसभा की 48 सीटें आती हैं और वर्ष 2019 के चुनाव के बाद यहां समीकरण बदले हैं। तब भी बीजेपी और शिवसेना ने 41 सीटें जीती थीं। पहले कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी में गठबंधन था और अब उद्धव ठाकरे का शिवसेना वाला गुट भी उसमें शामिल है। हालांकि, शरद पवार के जो तेवर इन दिनों दिख रहे हैं। उनके भतीजे अजीत पवार को लेकर जो खबरें तैर रही हैं, उससे लगता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर हो सकता है।
तेलंगाना में भारत राष्ट्रीय समिति (बीआरएस) के सुप्रीमो के.चंद्रशेखर राव भी नीतीश कुमार की तरह विपक्षी एकता के लिए फेविकोल का काम करते आ रहे हैं। वो तेलंगाना में विपक्ष दलों का जमावड़ा लगाते रहते हैं, लेकिन जब तेलंगाना में सीट शेयरिंग की बात होगी तो वो 'एकला चलो की नीति' पर ही चलने लगते हैं। इस साल होने वाले तेलंगाना विधानसभा चुनाव में उनकी स्थिति कमजोर बताई जा रही है और चुनाव के नतीजे साफ कर देंगे कि वर्ष 2024 में तेलंगाना में क्या परिस्थितियां बनने वाली हैं? फिर के. चंद्रशेखर राव खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी मानते हैं।
अन्य राज्यों की बात करें तो झारखंड में पहले से बीजेपी बनाम झामुमो, राजद, कांग्रेस का गठबंधन है और अब उसमें जद (यू) भी शामिल हो जाएगा। ओडिशा में बीजू जनता दल के सुप्रीमो नवीन पटनायक किधर जाएंगे या अकेले रहेंगे, यह तय नहीं कर पाए हैं। संभावना यही है कि वह अकेले ही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि, उनके नाम को लेकर चर्चाएं चलती रहती हैं कि उन्हें भी यूपीए का संयोजक बनाया जा सकता है।
केरल में पहले से ही वामदल और कांग्रेस के गुट हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी कांग्रेस को कुछ देने वाली है या गठबंधन करने वाली है, इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। दिल्ली में जरूर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के मिलकर लड़ने की कुछ-कुछ संभावनाएं हैं।
नीतीश कुमार की कोशिशें कितना रंग लाएंगी?
असम में बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस के साथ एआईयूडीएफ व अन्य दल आ सकते हैं, लेकिन इनकी राह आसान नहीं होगी। उत्तर-पूर्व के राज्यों में छोटे-छोटे दल हैं और कांग्रेस वहां करीब-करीब खत्म हो गई है। कांग्रेस स्वयं को राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानती है और कोशिश में रहती है कि सभी क्षेत्रीय दल उसकी छतरी के नीचे आ जाएं, लेकिन कांग्रेस के विरोध में बने अधिकांश क्षेत्रीय दलों को यह अस्वीकार्य है।
दूसरा, कांग्रेस राहुल गांधी को प्रोजेक्ट करने पर तुली है और विपक्ष को राहुल गांधी का नाम पच नहीं रहा है। ममता बनर्जी तो खुलकर कह चुकी हैं कि राहुल गांधी के नाम पर चुनाव लड़ेंगे तो हार निश्चित है।
नीतीश कुमार की कोशिशें कितना रंग लाएंगी, इस पर अभी तो जनता को संदेह ही है। वैसे, बीजेपी की कोशिश भी यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे कोई चेहरा विपक्ष आगे करे। फिर वो राहुल गांधी हों या नीतीश कुमार, बीजेपी को इसमें फायदा ही नजर आता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को एक साल का समय शेष है।
अब अगले एक साल नीतीश का जहाज चंद्रबाबू नायडू की भांति उड़ता रहेगा या फिर नरेंद्र मोदी को टक्कर देगा? हालांकि, यह आसान नहीं होगा, क्योंकि अभी जितने भी सर्वे आ रहे हैं और तो और स्वयं विपक्ष भी यही मानकर चल रहा है कि वर्ष 2024 में नरेंद्र मोदी को चुनौती नहीं दी जा सकती। क्या नीतीश कुमार अगले चंद्रबाबू नायडू बनने वाले हैं?
----------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।