बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न सिर्फ सभी एक्जिट पोल एजेंसियों को बल्कि राज्य और देश के तमाम राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान-परेशान कर दिया है। जिस महागठबंधन को सभी एजेंसियां स्पष्ट बहुमत बता रही थी, वह देर शाम तक बहुमत की संख्या को छूने की कोशिश करता रहा और लगातार पिछड़ता रहा।
महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल कमोबेश ठीक प्रदर्शन करता नजर आ रहा है। वह 2015 के अपने आंकड़े के करीब जाता नजर आ रहा है। वाम दलों ने अपने हिसाब से बहुत शानदार प्रदर्शन किया। उसे जितनी सीटें मिलीं उस हिसाब से उसने अपना वेस्ट प्रदर्शन किया और लगभग दो-तिहाई सीटों पर जीत या बढ़त हासिल की। मगर कांग्रेस उस हिसाब से प्रदर्शन नहीं कर पायी।
उसे सत्तर सीटें दी गयी थीं, मगर वह उनमें से लगभग तीन चौथाई सीटों पर पिछड़ती नजर आयी। वामदलों का मानना था कि अगर ये सीटें उन्हें मिली होतीं तो उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया होता। कांग्रेस के आधार वोट के मुकाबले भी ये सीटें काफी अधिक थीं। यह महागठबंधन के अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन न कर पाने की सबसे बड़ी वजह बनी।
सीमांचल के इलाके में जो मुस्लिम बहुत क्षेत्र हैं, ऐसा माना जा रहा था कि वहां की 24 सीटों में से ज्यादातर पर महागठबंधन को जीत मिलेगी। मगर नतीजे बता रहे हैं कि वहां पांच सीटों पर ओवैसी की पार्टी एमआईएम जीतती नजर आ रही है और इस पार्टी ने कई सीटों पर बहुत अधिक वोट हासिल किये हैं, जिसने स्वाभाविक रूप से महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया है।
महागठबंधन का जातीय आधार सिर्फ यादव और मुस्लिम तक ही सीमित रहा। उसने किसी दलित राजनीतिक चेहरे को अपने गठबंधन में जगह नहीं दी। अगर जीतन राम मांझी की पार्टी हम या मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी को महागठबंधन साथ जोड़ने में सफल हो पाती तो शायद उसका वोट शेयर बढ़ जाता। ऐसे में उसे नजदीकी फाइट में जूझना नहीं पड़ता।
अगर उन्होंने चिराग पासवान की पार्टी लोजपा को भी साथ लाने की कोशिश की होती तो शायद तसवीर बदल सकती थी। कांग्रेस की 70 सीटों में किसी दलित पार्टी को साझीदार बनाया जा सकता था। दक्षिण बिहार के इलाकों में जहां वाम दल मजबूत थे, वहां तो उन्होंने अपने कैडर गरीबों के वोट से इस कमी को पूरा कर दिया। मगर उत्तर बिहार में वे इस वजह से पिछड़ते नजर आये।
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