भोपाल गैस त्रासदी की वह तस्वीर, जो इस त्रासदी का प्रतीक बन गई।
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सरकारी आकड़ों में 3700 से अधिक मौतें और गैर सरकारी आकड़े के हिसाब से 8000 से लेकर 10000 तक मौत इस हादसे में बताई जाती है। लगभग 5 लाख लोगों पर इस ज़हरीली गैस का आंशिक या अधिक प्रभाव रहा। 1984 के समय लगभग 9 लाख की आबादी में से लगभग आधी आबादी इससे प्रभावित हुई। इतनी बड़ी तबाही के बाद भी सरकार की तरफ से कोई कार्यवाही का न होना कई सवाल खड़े करता है।
3 दिसंबर 1984 को जनता द्वारा धरना प्रदर्शन उपरान्त भोपाल के हनुमान गंज थाना में प्रकरण दर्ज होता है। एंडरसन के साथ सरकार का क्या व्यहवार था, इसे डॉन कर्ज मैन की लिखी किताब में पढ़ा जा सकता है।
डॉन कर्ज मैन लिखते हैं कि एंडर्सन अपने सहयोगियों के साथ 7 दिसंबर 1984 को इंडियन एयरलाइन्स के विमान से भोपाल हवाई अड्डे प्रातः पहुंचता है। हवाई अड्डे पर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज्यपुरी और कलेक्टर भोपाल मोतीसिंह अपने साथ यूनियन कार्बाइड के गेस्ट हॉउस में जाते हैं और एंडरसन को हिरासत में लिए जाने की जानकारी देते हैं। 7 दिसंबर को ही 3:30 पर उसे बताया जाता है कि 'हमने आपको भोपाल से दिल्ली ले जाने के लिए राज्य सरकार के विशेष विमान की व्यवस्था की है। वहां से आप अमेरिका लौट सकते है।
हज़ारों इंसान का कातिल अमेरिका चला गया फिर कभी दोबारा वह भोपाल और भारत नहीं आया। इस सवाल का जवाब आज भी सरकार के पास और सरकारी एजेंसियों के पास नहीं है। 29 सितम्बर 2014 में फ्लोरिडा के एक नर्सिंग होम में एंडर्सन की मौत हो गई। हादसे के 30 वर्ष बाद मृत्यु तक वह कातिल कानून की गिरफ्त से बाहर रहा।
भोपाल गैस हादसे के बाद मृतकों के बचे रिश्तेदार और उनके परिचितों की तरफ से एक आवाज़ सामाजिक कार्यकर्त्ता अब्दुल जब्बार रहे। 14 नवंबर 2019 को इनका निधन हुआ। मृत्यु पूर्व तक अब्दुल जब्बार हादसे से प्रभावित व्यक्तियों के हक़ की आवाज़ के लिए जाने जाते थे।
भारत सरकार ने उनके प्रयासों को पद्मश्री देकर सम्मानित किया। भोपाल गैस त्रासदी के 38 साल बाद भी कुछ सवाल बाकी हैं जिनके उत्तर अप्राप्त है।
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