कोल्हापुर नरेश शाहू छत्रपति का कहना था कि, "मेरी अंतरात्मा कहती है कि एक दिन ऐसा आएगा, जब आंबेडकर का नाम सारे देश में चमकेगा। इनकी गणना अखिल भारतीय ख्याति और प्रभाव वाले पहली पांत के नेताओं में होगी।"
डॉ. अम्बेडकर का नाम आते ही उनकी सूट-बूट, पहने, हाथ में संविधान की किताब थामें हुए तस्वीर आंखों के सामने आकर ठहर जाती है। मानों 20वीं सदी का महान व्यक्तित्व 21वीं सदी के समाज को संगठित कर रहा हो। तत्कालीन जटिल समाज की रूढ़िवादी मान्यताओं पर प्रखर प्रहार करने वाले एवं आधुनिक विचारों की वकालत करने वाले महान व्यक्तित्व थे, डॉ. अम्बेडकर। जिनका जन्म ऐसे भारत में हुआ था, जहां अनगिनत समस्याएं थी।
रंगभेद, लिंगभेद, असमानता, अस्पृश्यता, जातिव्यवस्था का विकराल स्वरूप जिसे वर्तमान समाज के लिए यकीन करना मुश्किल है। उस पर असंभव एवं अपरिवर्तित समाज में कमाल का परिर्वतन कर दिखाया वो भी मात्र 65 वर्षो के संद्यर्षमयी जीवन में। अपने जीवनकाल में डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर तत्कालीन समाज को आधुनिक युग की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार कर गए। उन्होंने भारतीय समाज में सामाजिक न्याय और समानता की संपूर्ण रूपरेखा तैयार की।
समाज को जटिल मान्यताओं और परम्पराओं के चक्रव्यूह से बाहर लाकर शिक्षा और समानता के साथ-साथ संवैधानिक अधिकारों को हासिल करने के मार्ग तैयार किए। तब अति सामान्य परिवार के किसी व्यक्ति के लिए यह कर पाना मुमकिन न था। उनके जीवन संघर्ष यात्रा पर नजर डालें तो मालूम होता है जैसे वो समाज में परिवर्तन लाने के लिए ही जन्में थे। उनके आधुनिक विचारों के कारण आज भारतीय समाज में कमाल के क्रान्तिकारी परिवर्तन देखें जा सकते हैं। वर्तमान पीढ़ी के लिए उन अधिकारों का संरक्षण हो सके इसके लिए कानूनी जामा पहनाने का भी काम डॉ. अम्बेडकर ने किया।
डॉ. अंबेडकर समाज सुधारक ही नहीं बल्कि एक कुशल राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री भी थे। साथ ही आज भी वो लाखों संघर्षशील युवाओं के लिए प्रेरणा की मशाल हैं। लगातार अभाव, भेदभाव और संघर्ष से जूझते हुए जीवन में सफल होने का साहस बाबा साहेब अम्बेडकर के जीवन से सीखा जा सकता है। उन्होंने लगातार संघर्ष से बीए, एम.ए.,एम.एस.सी, पीएचडी, बैरिस्टर आदि के साथ लगभग 32डिग्रियां हासिल की तथा 9 भाषाओं में महारथ हासिल की।
डॉ. भीम राव अंबेडकर ने न केवल अस्पृश्यों की सामाजिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया बल्कि एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहा जिसमें प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, न्याय, स्वतंत्रता, समता जैसे बहुमूल्य अधिकार मिल सके। इसके लिए उन्होंने देश के राजनीतिक ढांचे को पुनर्गठित करने पर जोर दिया। शायद इसीलिए उन्होंने समाज की तमाम कुरीतियों को समाप्त करने की पुरजोर कोशिश की। अम्बेडकर चाहते थे की भारत के प्रत्येक नागरिक दल या संस्था की भूमिका क्रियात्मक और रचनात्मक होनी चाहिए ताकि देश का संपूर्ण विकास निश्चित हो।
भारत के संविधान निर्माण में इस बात का जोर दिया गया कि देश की एकता और मजबूती के लिए संपूर्ण भारत की एक नागरिकता और एक भाषा पर जोर दिया गया। देश को संघ या यूनियन कहने के बजाय भारत (इंडिया) कहना अधिक पसंद किया गया क्योंकि भारत शब्द प्रत्येक को अपने में समाहित करता है। डॉ. अंबेडकर ने अपनी देशभक्ति, राष्ट्र प्रेम, नागरिकों की एकता को संगठित करने में अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया।
ब्रिटिश सरकार द्वारा जब उनको भारत की वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में श्रम सदस्य मनोनीत किया, तब उन्होंने स्त्री- पुरुष मजदूरों के कल्याण के लिए कई कानूनों का निर्माण करवाया। आजादी के बाद महिलाओं के अधिकारों का पक्ष रखते हुए हिंदू कोड बिल लेकर आये तथा 5 फरवरी 1951 को भारतीय संसद में हिंदू कोड बिल को लागू न करवा पाने के विरोध में 25 सितंबर 1951 को कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देकर विरोध दर्ज किया।
भारत के कोने कोने में सम्मेलनों, लेखों और सभाओं के माध्यम से समाज के कमजोर, पिछड़ों, महिलाओं, शोषितों आदि में परिवर्तन की लहर का विस्तार करते रहे। डॉ. अंबेडकर ने सामाजिक तिरस्कार और अपमान से दुखी होकर बहुत पहले ही मन में यह धारणा उत्पन्न की थी कि वह हिंदू धर्म में पैदा जरूर हुए हैं यह उनके वश में नहीं था लेकिन वो हिंदू धर्म में रहकर मरेंगे नहीं जिसे उन्होंने व्यावहारिक रूप अपने लाखों समर्थको के साथ नागपुर में 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म स्वीकार कर के पूर्ण किया। लेकिन कुछ समय पश्चात 6 दिसम्बर सन् 1956 को डॉ. अम्बेडकर ने संसारिक जीवन को अलविदा कह दिया। 6 दिसम्बर को उनका महापरिनिर्वाण दिवस मनाया जाता है।
निःसंदेह वर्तमान युग डॉ. अम्बेडकर को आधुनिक विचारों से भरपूर व्यक्तित्व के रूप में याद करता हैं। उनके क्रांतिकारी विचारों की झलकियां उनके संवैधानिक अधिकारों की वकालत में देखने को मिलती है। दुनिया जिन मानवाधिकारों पर आज बहस कर रही है अम्बेडकर उस सवाल को बहुत पहले ही उठा रहे थे। अपने युग से आगे थी उनके विचारों की वैचारिक क्रांति। उन सवालों को आपने न केवल उठाया अपितु कानूनी रूप से मजबूती भी देने की पुरजोर कोशिस की। उनके आधुनिक विचारों का परिणाम है की आज समाज का प्रत्येक व्यक्ति समानता और सरलता से विकास की सीढियां चढ़ रहा है।
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