दुनिया में केवल 1000-2499 पलास फिश ईगल ही शेष बचे हैं
- फोटो : सुभद्रा देवी
शक्तिशाली शिकारी
पलास फिश ईगल ऊपर से गहरे भूरे रंग के होते हैं, जबकि पेट हल्के रंग का और सिर मैला-सा धूसर होता है। उड़ान के दौरान नीचे से देखने पर इनकी गहरी पूंछ पर चौड़ी सफेद पट्टी सबसे आकर्षक विशेषता होती है जिसके कारण इन्हें एक और नाम भी दिया गया हैं - बैंड-टेल्ड फिश ईगल।
पानी की सतह से मछलियां पकड़ने के अलावा, ये जल पक्षियों जैसे बत्तख, हंस, कूट और डेमोइसल क्रेन का शिकार भी करते हैं, साथ ही बगुलों के घोंसले और प्रजनन स्थलों से युवा आईबिस, ओपनबिल, डार्टर और टर्न पक्षियों का भी शिकार करते हैं। इन भारी भरकम शिकारियों को वयस्क हंस और अपने वजन से दोगुनी बड़ी मछलियां उठाकर उड़ते हुए भी देखा गया है। ऑसप्रे जैसे पक्षियों से ये खाना झपटकर लेने में भी माहिर हैं।
दुर्भाग्यवश अपनी अद्भुत शिकार क्षमता और अकल्पनीय मीलों की सालाना उड़ान की क्षमता के बावजूद आज दुनिया में केवल 1000-2499 पलास फिश ईगल ही शेष बचे हैं और इसी वजह से इन्हें लुप्तप्राय जीव-जंतुओं कि श्रेणी में रखा गया है।
जो पक्षी हिमालय कि चोटी लांघकर भारत अपने वंश को आगे बढ़ाने आते हैं आज उनकी संख्या इसलिए कम होती जा रही है क्योंकि हम ऊंची इमारतों के जंगल बसाने में उनसे उनके झील, नम-भूमि, किनारों में लगे पेड़ और घोंसले छीन रहे हैं। आशा हैं आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए ये विलुप्तता कि कगार में खड़े पक्षी अपने जन्मभूमि में सुरक्षित रह पाएंगे।
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