पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत दर्ज अधिकांश मामले अदालत की चौखट तक पहुंचने के बाद भी दम तोड़ देते हैं। कहीं पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हो जाते हैं, तो कभी-कभी अदालतें भी ऐसा फैसला सुनाती हैं जिससे केस समाप्त हो जाता है। इसी तरह का एक मामला हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की गलियों से बाहर आया है।
इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(3) के तहत भी 16 से 18 वर्ष की आयु के बालकों के साथ यौन संबंध को बलात्कार माना गया है।
केंद्रित बहस का मुख्य विषय होता है कि क्या 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सहमति को कानूनी दृष्टि से मान्यता दी जा सकती है या नहीं। पॉक्सो अधिनियम स्पष्ट करता है कि 18 वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे की सहमति को वैध नहीं माना जाएगा। इसका अर्थ यह है कि चाहे बच्चा सहमत हो, फिर भी उसके साथ शारीरिक संबंध अपराध ही होंगे। यह कानून इस आधार पर बनाया गया है कि बच्चे स्व-निर्णय लेने के लिए परिपक्व नहीं होते और उनका यौन शोषण रोकना जरूरी है।
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