माघ शुक्ल पंचमी केवल पंचांग की एक तिथि नहीं है। यह वह दिन है, जब भारतीय चेतना प्रकृति के साथ एक बार फिर संवाद करती है, अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से सृजन की ओर। बसंत पंचमी हमें स्मरण कराती है, 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' केवल एक वैदिक मंत्र नहीं, अपितु जीवन जीने की दिशा है। यह पर्व ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की उपासना और प्रकृति के नव-श्रृंगार का सुंदर संगम है।
जब संसार भौतिक उपलब्धियों की अंधी दौड़ में संवेदनशीलता और विवेक खोता जा रहा है, तब बसंत पंचमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य ज्ञान, विनम्रता और संतुलन में निहित है।
बसंत पंचमी की जड़ें हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद तक जाती हैं। ऋग्वैदिक ऋषियों ने सरस्वती को मात्र देवी नहीं माना, बल्कि उन्हें 'नदीतमे, देवितमे, अम्बितमे' यानी श्रेष्ठ नदी, श्रेष्ठ देवी और करुणामयी माता कहा।
वेदों में सरस्वती वाणी की शक्ति हैं। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो वाणी ही वह सेतु है, जो मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर संस्कृति और सभ्यता की ओर ले जाती है।
यजुर्वेद में बसंत को ऋतुओं का राजा कहा गया है। यह वह समय है, जब पृथ्वी शीत की नीरसता त्यागकर पीतवर्ण धारण करती है। पीला रंग केवल उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि ऊर्जा, आशा और सात्विकता का संकेत है, जैसे प्रकृति स्वयं जीवन के प्रति आश्वस्त हो उठी हो।
भारतीय संस्कृति की यह सुगंध देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। दक्षिण-पूर्व एशिया में, विशेषकर इंडोनेशिया के बाली द्वीप पर ‘हरि राया सरस्वती’ के रूप में इस दिन को जिस श्रद्धा से मनाया जाता है, वह वसुधैव कुटुंबकम की भावना का सजीव उदाहरण है।
वहां पुस्तकों की पूजा कर, अध्ययन से विराम लेकर ज्ञान के प्रति मौन सम्मान प्रकट किया जाता है, एक ऐसी परंपरा, जो आधुनिक दुनिया को बहुत कुछ सिखा सकती है। नेपाल में यह पर्व ‘श्री पंचमी’ के रूप में मनाया जाता है तो जापान में ‘बेंजाइटेन’ देवी की आराधना के रूप में। यह सब प्रमाणित करता है कि ज्ञान की साधना किसी भूगोल या सीमा की मोहताज नहीं होती।
भारत में बसंत पंचमी का इतिहास सामाजिक समरसता की भी कहानी कहता है। 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो द्वारा प्रारंभ की गई ‘सूफी बसंत’ की परंपरा आज भी दिल्ली की दरगाहों में पीले फूलों की चादरों के साथ जीवित है। यह दर्शाता है कि बसंत के रंग किसी धर्म या संप्रदाय में बंधे नहीं होते।
शांतिनिकेतन में, खुले आकाश के नीचे, जब विद्यार्थी रवींद्र संगीत की धुनों पर नृत्य करते हैं, तो शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती, वह कला, प्रकृति और जीवन से जुड़ जाती है। यह शिक्षा का वह मानवीय स्वरूप है, जिसकी आज पूरी दुनिया को आवश्यकता है।
सूचना क्रांति के इस युग में, जहां जानकारियां तो असंख्य हैं, पर ज्ञान का अभाव दिखाई देता है, बसंत पंचमी हमें विवेक की याद दिलाती है। देवी सरस्वती के एक हाथ में वीणा है, जो कला और सौंदर्य का प्रतीक, दूसरे हाथ में पुस्तक, जो शास्त्र और विज्ञान का संकेत है।
यह संतुलन ही पूर्ण मानव का आधार है। उनका वाहन हंस हमें नीर-क्षीर विवेक सिखाता है, अर्थात सत्य को ग्रहण करना और असत्य को त्याग देना।
बसंत पंचमी का उत्सव केवल पीले वस्त्रों या पकवानों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक अर्थ तब साकार होगा, जब हम समाज से अज्ञान के अंधकार को दूर करने का संकल्प लें और प्रकृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझें। सरसों के पीले खेत हमें याद दिलाते हैं कि हमारी समृद्धि धरती की हरियाली से जुड़ी है।
बसंत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है, उस ज्ञान के आलोक की ओर, जो हमें केवल सफल नहीं, बल्कि एक बेहतर मनुष्य बनाता है।
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