इसी कड़ी में धार स्थित भोजशाला के सत्य को जानने के लिए ही माननीय उच्च न्यायलय ने भोजशाला के पुरातात्विक सर्वेक्षण का आदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को दिया था। यहां यह बात उल्लेखनीय है की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की वार्षिक पत्रिका इंडियन आर्कियोलॉजिकल रिव्यू ।984-।985 (IAR ।984-।985) के पृष्ठ क्रमांक ।83 पर स्पष्ट रूप से लिखा है कि- धार स्थित भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती के लिए बनाया गया एक मंदिर है जिसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा किया गया था। भोजशाला के पश्चिम व उत्तर में मंदिर के अधिष्ठान के चिन्ह विद्यमान है, इसका उल्लेख भी उसमें किया गया है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा मुद्रित कॉर्पस इंस्क्रिप्शन इंडिकेरम, खण्ड 7 में भी इस बात का उल्लेख है की एक ब्रिटिश अधिकारी को भोजशाला के अवशेषों के पास ही से एक सरस्वती (वाग्देवी) की मूर्ति प्राप्त हुई थी जिसे वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। पुस्तक में दिए विवरण के अनुसार यह प्रतिमा मां वाग्देवी की है तथा इसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा करवाया गया था। उपरोक्त जानकारी का आधार मां वाग्देवी की प्रतिमा पर अंकित अभिलेख है।
भोज द्वारा निर्मित भोजशाला में यह प्रतिमा स्थापित की गई होगी इसका उल्लेख भी उस पुस्तक में किया गया है। ।987 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में भोजशाला से हिन्दू धर्म से संबंधित 32 मूर्तियां प्राप्त हुई थी। अतः यह तो स्पष्ट है की वर्तमान समय तक हुए विभिन्न विभिन्न शोध कार्यों से यह आसानी से कहा जा सकता है की भोजशाला हिन्दू मंदिर ही है।
पूर्व में हुए शोध कार्यों के आधार पर भोजशाला को मस्जिद कहना पूर्ण रूप से तथ्यहीन ही है। वर्तमान भोजशाला परिसर में दिखाई देने वाले स्तम्भ व उनपर संजोए गए अलंकरण इस बात को सिद्ध करते हैं की स्तम्भ परमार कालीन (।।वीं शताब्दी) हैं। इतना ही नहीं, भोजशाला के आस-पास बनी कुछ कब्रों के निर्माण के लिए परमार कालीन मंदिरों के अवशेषों को उपयोग किया गया है। इन अवशेषों पर हरा रंग पोत कर मानों इनकी पहचान बदलने का असफल प्रयास किया गया हो।
भोजशाला में स्थित परमार कालीन स्तम्भ
पुरातत्व विभाग के दल ने उस दौरान भोजशाला व उसके निकट स्थित कालांतर में बनाई गई दरगाह में प्रस्तर पर अंकित शिलालेखों के छापे (स्टांपेज) लिए थे। वैसे तो पूर्व में भी भोजशाला से कई अभिलेख मिले हैं। पुरातत्वविद के. के. लेले के अनुसार भोजशाला के दो स्तम्भों पर अंकित कुछ अभिलेख इस ओर संकेत करते हैं की इन्हें व्याकरण के किसी आचार्य द्वारा लिखवाया गया था। उनके अनुसार छात्रों के ज्ञानार्जन के लिए इनका उपयोग होता होगा।
पुरातात्विक उत्खनन, अभिलेखों के छापे (स्टॉम्पेज) लेने का कार्य, फोटोग्राफी तथा प्रलेखन का कार्य सम्पादित कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का दल भोजशाला में हुए कार्य की एक विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष 2024 में प्रस्तुत कर चुका है। निश्चित तौर पर वह रिपोर्ट भोजशाला व राजा भोज द्वारा उसके निर्माण और कालांतर में उसके विध्वंस पर और प्रकाश डालेगी। वर्तमान समय में सर्वोच्च न्यायलय में लंबित इस विवाद क फैसले की सभी को प्रतीक्षा है।
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