मिजोरम में बंग्लादेशी और म्यांमार के शरणार्थी
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राज्य सरकार के अलावा सबसे ताकतवर सामाजिक संगठन
यंग मिजो एसोसिएशन, चर्च और दूसरे संगठन उनकी मदद कर रहे हैं। केंद्र सरकार उनको शरणार्थी का दर्जा नहीं दे सकती लेकिन मुख्यमंत्री लालदूहोमा ने साफ कर दिया है कि वो किसी भी शरणार्थी को राज्य से नहीं निकालेंगे। मुख्यमंत्री का कहना है कि केंद्र इनको शरणार्थी का दर्जा भले नहीं दे सकता, वह उनको राहत मुहैया कराने के लिए हमारी मदद के लिए सहमत हो गया है।
म्यांमार के अलावा कुछ महीने पहले बांग्लादेश के चटगांव पर्वतीय इलाके के करीब दो हजार शरणार्थी राज्य में पहुंचे थे। इसके साथ ही पड़ोसी मणिपुर में जातीय हिंसा शुरू होने के बाद वहां से आने वाले कुकी जो जनजाति के दस हजार से ज्यादा शरणार्थियों ने महीनों से मिजोरम में शरण ली है।
केंद्र सरकार ने मिजोरम को म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों का बायोमेट्रिक आंकड़ा जुटाने का निर्देश दिया था लेकिन अब तक यह काम शुरू नहीं हो सका है। राज्य के गृह विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि बायोमेट्रिक आंकड़ों के लिए तैयार मौजूदा ऑनलाइन पोर्टल म्यांमार के शरणार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं है। यह उन शरणार्थियों के लिए बना है जिनको उनके देश वापस भेजा जाना है। केंद्र ने राज्य सरकार को भरोसा दिया है कि म्यांमार में शांति बहाल नहीं होने तक इन शरणार्थियों को वहां वापस नहीं भेजा जाएगा।
राज्य सरकार के एक अधिकारी बताते हैं कि शरणार्थियों की बढ़ती तादाद से राज्य के खजाने पर भी बोझ बढ़ रहा है। यह छोटा-सा पर्वतीय राज्य अपनी 80 फीसदी से ज्यादा वित्तीय जरूरतों के लिए केंद्र पर ही निर्भर है। इसके अलावा स्थानीय लोगों में भी नाराजगी बढ़ रही है। इन शरणार्थियों में कई लोग सीमा पार से हथियारों और दूसरी अवैध वस्तुओं की तस्वीर में जुटे हैं। बीते दो-तीन वर्षो के आंकड़ों से साफ है कि शरणार्थी समस्या बढ़ने के साथ ही सीमा पार से तस्करी की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
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