बाबा की यह कल्पना आरएसएस की सामाजिक समरसता वाले हिंदू राष्ट्र की कल्पना से अलग है।
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वैसे बाबा का जो प्लान है, उसमें जमीन ही सनातनी हिंदुओं को उपलब्ध कराई जाएगी। मकान हिंदुओं को अपने खर्चे से बनाना होगा। हिंदू धर्म की रक्षा के लिए इतनी कीमत तो चुकानी ही होगी। यह हिंदू ग्राम फ्लैट सिस्टम वाला होगा। जिसमें ग्राउंड फ्लोर 17 लाख, फर्स्ट फ्लोर 16 लाख तथा सेकंड फ्लोर 15 लाख रुपये में मिलेगा। 5 लाख रुपये एडवांस देने होंगे।
पहले चरण में 50 मकान देने की बात है। मकान निर्माण बागेश्वर धाम जनसेवा समिति कराएगी। हालांकि, इससे यह संदेश जाने का खतरा भी है कि यह यह हिंदू ग्राम विकास है या प्रोफेशनल काॅलोनाइजिंग? इस संदर्भ में बाबा बागेश्वर का कहना है कि यह मकान बेचने या खरीदने के लिए नहीं होंगे। यानी इन्हें ‘इन्वेस्टमेंट’ के उद्देश्य से नहीं खरीदा जा सकता।
कुछ लोगों का मानना है कि अगर बाबा बागेश्वर हिंदू और सनातन धर्म के लिए इतना कुछ कर रहे हैं तो उनके विरोधियों के पेट में दर्द क्यों होना चाहिए? बात सही भी है। अगर कुछ बस्तियों, नगरों, जिलों, प्रांतो के नाम हिंदू होने से देश हिंदू राष्ट्र बन सके तो हिंदू राष्ट्र बनाने का इससे किफायती तरीका दूसरा हो नहीं सकता। वैसे बाबा ने यह भी कहा है कि इस हिंदू ग्राम में सनातनी और वैदिक धर्म को मानने वाले हिंदू ही रह सकेंगे। मुमकिन है आगे चलकर इस पर भी विवाद हो कि गैर सनातनी हिंदू जैसे कि आर्य समाजी, कबीरपंथी, ब्रह्म समाजी, राधास्वामी सत्संग, रविदासी पंथी आदि भी हिंदू ग्राम में रहना चाहें तो क्या उन्हें इजाजत मिलेगी?
वैसे दुनिया में धर्म के आधार पर किसी काॅलोनी, नगर, प्रांत और देश का नामकरण अपवाद स्वरूप ही हुआ है। अगर शहर की बात करें तो दुनिया में शायद दो ही उदाहरण मिलेंगे। एक था ‘इस्लाम नगर’, जो भोपाल रियासत की पुरानी राजधानी था और अब एक खंडहर है।
दूसरा है इस्लामाबाद, जिसे इस्लाम के नाम पर ही बसाया गया और जिस देश पाकिस्तान की वह राजधानी है, उस का आज क्या हाल है, सबको पता है। और तो और जिन स्थानों पर किसी विशिष्ट धर्म वालों को ही रहने या प्रवेश की इजाजत है, उनके नाम भी सम्बन्धित धर्म के नाम पर नहीं हैं। मसलन मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थल मक्का में गैर मुसलमानों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है, लेकिन उसका नामकरण इस्लाम पर नहीं है।
इसी तरह कैथोलिक ईसाइयों के सबसे पावन शहर ‘वेटिकन सिटी’ में गैर कैथोलिको को रहने की अनुमति नहीं है। बावजूद इसके इस शहर का नाम किसी ने ईसा या क्रिश्चियन सिटी नहीं रखा। सिखों की पवित्र नगरी अमृतसर का नाम भी सिख नगर नहीं है। क्योंकि धर्म के आधार पर नाम रखने से उस धर्म की परंपराओं, दर्शन और कर्मकांडों का शास्त्रोक्त पालन हो, यह जरूरी नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता और वह व्यावहारिक रूप से संभव होता भी नहीं है तो उस धर्म की पवित्रता पर ही प्रश्नचिन्ह लगने लगता है, जोकि सही नहीं है।
बागेश्वर धाम में बनने जा रहे हिंदू ग्राम का भूमिपूजन करते धीरेंद्र शास्त्री
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रहा सवाल बाबा की राजनीतिक उपयोगिता का तो बाबा के प्रभाव की असली सियासी टेस्टिंग बिहार चुनाव में होनी है। बाबा को वहां धुर हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण के काम में लगाया गया है। घोर जातिवाद से ग्रस्त बिहार में अगर वहां भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब रही तो बाबा का सियासी ग्राफ भी ऊपर जाएगा। वो मप्र के ‘योगी आदित्यनाथ’ भी हो सकते हैं। लेकिन नतीजा कुछ और आया तो बाबा की हिंदू राष्ट्र की उड़ान बागेश्वर के हिंदू ग्राम तक भी सिमट सकती है।
यूं बाबा बागेश्वर की इस ‘हिंदू ग्राम’ की घोषणा से सियासी घमासान भी शुरू हो गया है। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने बाबा की योजना का दिल खोलकर स्वागत किया है तो मप्र कांग्रेस प्रवक्ता हाफिज अब्बास ने सवाल किया कि अगर कल को मुसलमान भी अलग ‘मुस्लिम ग्राम’ बनाने की इजाजत मांगेंगे तो क्या सरकार देगी? कल को संविधान के ‘सर्व धर्म समभाव’ के आधारभूत सिद्धांत के आधार पर हर धर्मावलंबी अपने धर्मों के हिसाब से अलग शहर बसाने लगेंगे तो फिर हिंदू राष्ट्र का क्या होगा? और अगर सरकार बाबा बागेश्वर जैसे लोगों को ही शहर बसाने की अनुमति देती है तो ‘सबका साथ’ का क्या होगा?
यूं अभी भी धर्म विशेष, सम्प्रदाय बहुल तथा एक ही समुदाय की कुछ काॅलोनियां अस्तित्व में हैं। लेकिन उनका नामकरण अक्सर उनके आराध्यों, महापुरूषों अथवा क्षेत्रीय या जातीय पहचान के आधार पर ही होता है। केवल गांव का नाम हिंदू कर देने से हिंदू राष्ट्र कैसे बन जाएगा, यह समझना मुश्किल है। हिंदू समाज भी तभी एकजुट होगा, जब वह जातीय विद्वेष और ऊंच नीच के दुराग्रह से मुक्त होगा। इसके लिए हिंदू बस्ती से ज्यादा बड़े दिल की जरूरत है।
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