फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अयोध्या राम मंदिर: 12वीं सदी के जिस रामजन्म भूमि मंदिर को बाबर ने तोड़ा वह आखिर किसने बनवाया था?

सार

पुरातत्व के सबूतों से अब यह साबित हो चुका है कि अयोध्या में इन दिनों जहां श्रीराम जन्मभूमि का भव्य मंदिर बन रहा है, वहां 12वीं सदी में एक भव्य और विशालकाय मंदिर हुआ करता था। लेकिन सदियों के विवाद और राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने के बावजूद भारतीय इतिहासकार और पुराविद यह तय नहीं कर पाएं हैं कि 12वीं सदी का वह भव्य मंदिर किस हिंदू राजा ने बनवाया था।

विज्ञापन
भारतीय इतिहासकार और पुराविद यह तय नहीं कर पाएं हैं कि 12वीं सदी का वह भव्य मंदिर किस हिंदू राजा ने बनवाया था। - फोटो : Social Media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पुरातत्व के सबूतों से अब यह साबित हो चुका है कि अयोध्या में इन दिनों जहां श्रीराम जन्मभूमि का भव्य मंदिर बन रहा है, वहां 12वीं सदी में एक भव्य और विशालकाय मंदिर हुआ करता था। कहा जाता है कि इसी विशालकाय मंदिर को तोड़कर बाबर के सिपहसलार मीर बाकी ने राम जन्मभूमि पर तीन गुंबदों वाली बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था।

विज्ञापन


सदियों के विवाद और राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने के बावजूद भारतीय इतिहासकार और पुराविद यह तय नहीं कर पाएं हैं कि 12वीं सदी का वह भव्य मंदिर किस हिंदू राजा ने बनवाया था।
 

दरअसल, इस सिलसिले में अब तक कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजा गोविंद चंद्र के जमाने का एक शिलालेख है, जो विवादित ढांचे को ढहाए जाने के दिन 6 दिसंबर को ढांचे के मलबे से पहली बार दुनिया के सामने आया था। लेकिन "विष्णु-हरि शिलालेख" के नाम से विख्यात यह शिलालेख भी दो दशकों से अब तक विवादों में घिरा है।

विज्ञापन

खास बात यह है कि ये शिलालेख इस संरचना को 'विष्णु हरि मंदिर' बताता है न कि 'राम जन्मभूमि मंदिर'। शिलालेख इस मंदिर के निर्माता का नाम- किसी "आयुष्य चंद्र" को बताता है, जिसका जिक्र अब तक इतिहास के किसी अन्य दस्तावेज में प्रमुखता से नहीं मिलता।

इस शिलालेख पर सुप्रीम कोर्ट में लंबी बहस हो चुकी है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि "शिलालेख यह निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं हो सकता कि इसमें जिस विष्णु हरि मंदिर का उल्लेख किया गया है वह मंदिर ध्वस्त स्थल पर ही मौजूद था।"


यानी दुनिया के सामने यह पहेली अब तक बरकरार है कि जिस मंदिर के अवशेष बाबरी मस्जिद के नीचे मिले वह मंदिर किस साम्राज्य या किस सम्राट ने स्थापित किया था।


एक दशक पहले हुई थी खुदाई 

2003 में हाईकोर्ट के आदेश पर पुरातत्व विभाग सर्वेक्षण (एएसआई) ने विवादित स्थल की खुदाई की थी। इसमें पहली बार विवादित ढांचे के नीचे बारहवीं शताब्दी के किसी मंदिर के अस्तित्व का पता चला था। यह मकर पद्धति का एक गोलाकार मंदिर था। यहां 17 कतारों में कुल 85 आधार स्तंभ थे। एक तरह से यह कोई विशालकाय मंदिर रहा होगा। लेकिन एएसआई के पुराविद अब तक यह नहीं बता सके कि इस मंदिर का निर्माण कब और किस राजा ने किया था।

उत्खनन में इस बारे में कोई जानकारी मिल सकी न ही एएसआई की रिपोर्ट में इसका जिक्र है। इस बारे में अब तक केवल एक सूत्र मिला है। 6 दिसंबर 1992 को ढांचे के मलबे में विष्णु-हरि शिलालेख मिलने के बाद हिंदू पक्ष ने दावा किया कि यह शिलालेख 12वीं सदी के गहड़वाल राजा गोविंद चंद्र के कार्यकाल (1114-1154) का है जिसमें यहां भव्य राम मंदिर के निर्माण का प्रमाण मिलता है।  


शिलालेख मिलने की कहानी

इस शिलालेख के मिलने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचा गिरा दिया था। हाईकोर्ट में एक चश्मदीद गवाह ने बताया था कि-
 

"इसी दौरान उसने विवादित ढांचे की पश्चिमी दीवार के एक हिस्से का प्लास्टर टूटा हुआ देखा। इस दीवार में असमान आकार के पत्थर और ईंटें लगी थीं। विध्वंस के दौरान साढ़े तीन फीट लंबा, दो फीट चौड़ा और छह इंच मोटा एक स्लैब नीचे गिर गया। उसे लगा कि ये स्लैब किसी पुराने मंदिर का शिलालेख जैसा है। कारसेवक उठाकर इसे रामकथा कुंज ले आए जहां मलबे से निकली सामग्री एकत्र की जा रही थी।" (सुप्रीम कोर्ट जजमेंट, 9 नवंबर 2019 से)


शिलालेख की बरामदगी के गवाहों में अयोध्या के मैजेस्टिक टॉकीज के मालिक भी शामिल थे जो पांचजन्य के रिपोर्टर थे और समाचार संकलन के लिए मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे। शिलालेख की पहली तस्वीर दैनिक 'आज' के लखनऊ संस्करण में 15 दिसंबर 1992 के अंक में छपी। उस दौरान खूब हल्ला मचा कि विवादित ढांचे में बने राम जन्म भूमि मंदिर के निर्माण की जानकारी देने वाला शिलालेख मिल गया है।  

विवादित ढांचे के मलबे से निकला यह शिलालेख जल्द ही इतिहासकारों में चर्चा विषय बन गया क्योंकि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ा यह एक नया सबूत था जो अभी तक किसी के सामने नहीं आया था। इस पर शोध शुरू हो गए।

इरफ़ान हबीब जैसे कुछ अन्य वामपंथी इतिहासकारों ने छूटते ही आरोप लगा दिया कि विष्णु-हरि शिलालेख को लखनऊ राज्य संग्रहालय से अयोध्या लाया गया और इसे बाबरी मस्जिद स्थल पर लगा दिया गया था। (Medieval Ayodhya (Awadh), Down to The Mughal Occupation, Irfan Habib)


(1899 में छपी पुस्तक द शर्की आर्किटेक्चर ऑफ जौनपुर का मुखपृष्ठ)

यह एक गंभीर आरोप था। हबीब की थ्योरी के अनुसार "विष्णु-हरि शिलालेख" वास्तव में "त्रेता का ठाकुर शिलालेख" है जिसका जिक्र ब्रिटिश पुराविद एंटोन फ्यूहरर ने अपनी 1899 में छपी पुस्तक "द शर्की आर्किटेक्चर ऑफ जौनपुर" में शिलालेख संख्या XLIV के रूप में किया गया है। ये शिलालेख 19वीं सदी के अंतिम सालों में फ्यूहरर को अयोध्या में त्रेता का ठाकुर मस्जिद के खंडहरों में मिला था।



(1899 में छपी पुस्तक द शर्की आर्किटेक्चर ऑफ जौनपुर का वह अंश जिसमें त्रेता के ठाकुर शिलालेख का उल्लेख है)

हिंदू धर्म में समय को चार हिस्सों में बांटा गया है। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग। राम का जन्म त्रेता युग में हुआ था, इसीलिए त्रेता के ठाकुर का शाब्दिक अर्थ है- त्रेता युग का स्वामी यानी भगवान श्रीराम। इस मंदिर का जिक्र पौराणिक कथाओं में आता है।

फ्यूहरर के मुताबिक "ये पहले विष्णु का एक बड़ा प्रसिद्ध मंदिर हुआ करता था, जिसे औरंगजेब ने तोड़ कर उसकी सामग्री से मस्जिद बनाई थी।"

जाहिर है इस मंदिर की उस दौर में बड़ी मान्यता रही होगी अन्यथा यह मंदिर औरंगजेब की नजर में नहीं आता। लेकिन वक्त के साथ यहां धीरे धीरे मस्जिद का अस्तित्व खत्म हो गया। अयोध्या के स्वर्गद्वार में त्रेता का ठाकुर मस्जिद के खंडहर आज भी मौजूद हैं। राम की पैड़ी पर "त्रेता के ठाकुरजी" का मंदिर भी आज जीर्ण शीर्ण अवस्था में मौजूद है।

मंदिर के पुजारी सुनील मिश्र बताते हैं कि मान्यता है कि राम ने यही से अश्वमेध यज्ञ शुरू किया था। इसलिए प्रत्येक महीने की दोनों एकादशियों को शाम के वक्त यहां दीपक जला कर विशेष पूजा होती है।  


(अयोध्या में स्वर्गद्वार का वह इलाका जहां त्रेता के ठाकुर के मंदिर है)

फ्यूहरर ने अपनी किताब में इसे 20-पंक्ति वाले बलुआ पत्थर के शिलालेख के रूप में वर्णित किया था, जो दोनों सिरों से टूटा हुआ है और बीच में भी दो भागों में विभाजित है। फ्यूहरर के अनुसार, यह शिलालेख जयचंद्र (यानी गोविंदचंद्र के पोते के) शासनकाल के दौरान जारी किया गया था। शिलालेख में विष्णु मंदिर के निर्माण के लिए जयचंद की प्रशंसा की गई है। इसमें सम्वत 1241 यानी 1184 ई का जिक्र था।

फ्यूहरर की पुस्तक में कहा गया है कि-
"शिलालेख फैजाबाद स्थानीय संग्रहालय में रखा गया था।"* बाद में त्रेता का ठाकुर शिलालेख को फैजाबाद से लखनऊ संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया था। जहां इसे शिलालेख संख्या 53.4 के रूप में चिह्नित किया गया था। (THE SHARQI ARCHITECTURE OF JAUNPUR : A. Fuhrer, 1899, पेज 68)

पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने अपनी किताब 'अयोध्या रिविजिटेड' में मध्ययुगीन इतिहासकार इरफान हबीब की थ्योरी का खंडन किया। इस पर शोध के बाद उन्होंने नतीजा निकाला कि "विष्णु-हरि शिलालेख" फ्यूहरर के "त्रेता का ठाकुर शिलालेख" से अलग है। लखनऊ संग्रहालय में 1953 से पहले के किसी अन्य शिलालेख का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

फ्यूहरर के त्रेता का ठाकुर शिलालेख संख्या 53.4 वहां रिकॉर्ड में मौजूद है। फिर जो संक्षिप्त ब्योरा फ्यूहरर ने दिया वह भी विष्णु-हरि शिलालेख की सामग्री से मेल नहीं खाता जैसे जयचन्द्र का नाम इस शिलालेख में नहीं है।

इस शिलालेख में वह संवत वर्ष भी नहीं है जिसका जिक्र फ्यूहरर ने किया है। ये बीच से नहीं बल्कि किनारे से दो भागों में विभाजित है। यानी 6 दिसंबर 1992 को ढांचे के मलबे में जो विष्णु-हरि शिलालेख मिला वह इससे अलग है।

ऐसे में तीन संभावनाएं हो सकती हैं। एक यह कि शिलालेख वास्तव में बाबरी मस्जिद की दीवार में कहीं जमीन में नीचे दफन था जो तोड़फोड़ के कारण मलबे में दुनिया के सामने आ गया।

दूसरी संभावना ये कि किसी काल खंड में मस्जिद की तामीर के वक्त ये किसी और मंदिर की सामग्री के साथ यहां लाकर मस्जिद में लगा दिया गया हो। तीसरी बात यह हो सकती है कि उसे 6 दिसंबर को कहीं और से लाकर वहां रख दिया गया हो जैसा कि मुस्लिम पक्ष आरोप लगा रहे थे।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह शिलालेख में साफ-साफ उस संरचना को रामजन्म भूमि मंदिर होने का संकेत नहीं देता। इस शिलालेख में तो भगवान श्रीराम का प्रत्यक्षत: नाम भी नहीं लिखा है। इसलिए भी यह आशंका गलत लगती है कि राम भक्तों ने इसे विवादित स्थल पर इरादतन रख छोड़ा हो। मजे की बात है कि इन सारे सवालों के जवाब अब तक अनउत्तरित हैं।

हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने भी अपने फैसले के दौरान शिलालेख की वास्तविकता और प्रामाणिकता का अवलोकन किया। उनकी ओर से भी साफ कहा गया कि शिलालेख पर संदेह नहीं किया जा सकता है।

"मुस्लिम पक्षकारों का कहना है कि केवल जिस तरीके से इसे बरामद करने का दावा किया गया है वह विश्वसनीय नहीं दिखता। जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि इसे विवादित स्थल पर विध्वंस से पहले इमारत में चिपकाया नहीं गया था। इसलिए उनका कहना था कि पत्थर का ये शिलालेख अपने आप में यह साबित करने का सबूत नहीं हो सकता कि यह वही विष्णु हरि मंदिर है जो कभी विवादित स्थल पर अस्तित्व में था या जिसका निर्माण किया गया था।" (सुप्रीम कोर्ट जजमेंट, 9 नवंबर 2019 से)
विज्ञापन

6 दिसंबर1992 को विवादित स्थल पर बरामद विष्णु हरि शिलालेख की छाया प्रति - फोटो : self

विष्णु-हरि शिलालेख में क्या है-

विष्णु-हरि शिलालेख में शुद्ध संस्कृत भाषा के छंदों के साथ 20 लाइनें हैं। यह गहड़वाल नागरी लिपि में 115x 55cm मीटर बलुआ पत्थर पर खुदा हुआ है। इसमें कुल 29 श्लोक या छंद हैं जिनकी व्याख्या कई पुरालेखविदों ने समय समय पर की। लेकिन हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुरालेखविद् डा. केवी रमेश की व्याख्या पर ही बहस हुई। डॉ. रमेश के अनुवाद को चुनौती भी नहीं दी गई।

शिलालेख भगवान शिव और वामन देवताओं की वंदना से शुरू होता है और फिर एक गौरवशाली राजवंश का वर्णन करता है। इसमें कर्ण या मामे, सल्लक्षणा और अल्हाना सहित राजवंश के सदस्यों के वीरतापूर्ण कारनामों का वर्णन है। जिनके बारे में ज्यादा ऐतिहासिक जानकारियां नहीं है। इतिहासकार इन्हें स्थानीय स्तर के सामंत बताते हैं।

मंदिर के निर्माण व इसके निर्माता के बारे में केवल श्लोक 19 से 21 तक  में इशारा किया गया है। इसलिए हम इसी पर चर्चा करेंगे क्योंकि बाकी श्लोक राम मंदिर के संबंध में बिलकुल अप्रासंगिक हैं क्योंकि इसमें राजवंश का ही गुणगान किया गया है। जबकि इतिहासकार इरफ़ान हबीब का तर्क है कि "शिलालेख की शुरुआत शिव" के आह्वान से होती है। इसके आधार पर, हबीब ने नतीजा निकाला कि "शिलालेख में उल्लिखित मंदिर एक शिव मंदिर था।"

श्लोक 19 में एक सामंत का वर्णन है जो "साकेत-मंडल (अयोध्या के आसपास का क्षेत्र) का शासक बना था। केवी रमेश के अनुसार, यह व्यक्ति मेघसुता था, जो अलहाना का भतीजा था, और उसने आयुष चंद्र नामक व्यक्ति का स्थान लिया था। अलहाना का उत्तराधिकारी साकेत-मंडल (अयोध्या के आसपास का क्षेत्र ) का शासक बना।

यह पृथ्वी के स्वामी गोविंदचंद्र की कृपा से हुआ।" (यहां ये बताना दिलचस्प है कि केवल एक बार गोविंदचंद्र का नाम आने से ही इसे कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजा गोविंदचंद्र से जोड़ दिया गया है।)

श्लोक 20 अल्हाना के उत्तराधिकारी की युद्ध कौशल का वर्णन करता है।

केवी रमेश के अनुवाद के अनुसार-

"उन अहंकारी योद्धाओं का अंत किया जो लगातार उनके द्वारा लड़ी गई लड़ाइयों में बेलगाम उन्माद में नाच रहे थे।"

 

श्लोक 21 में मंदिर का निर्माण का जिक्र है। जिसकी व्याख्या केवी रमेश ने इस तरह की है-"उपरोक्त शासक (आयुष चंद्र या मेघसुता) ने "सांसारिक आसक्तियों के सागर" को पार करने (यानी मोक्ष या मुक्ति प्राप्त करने) का सबसे आसान तरीका खोजने के लिए विष्णु-हरि का यह सुंदर मंदिर बनवाया था। मंदिर का निर्माण बड़े तराशे गए पत्थरों के खंडों का उपयोग करके किया गया था, किसी भी पूर्ववर्ती राजा ने इस पैमाने पर मंदिर नहीं बनाया था। मंदिर का शिखर स्वर्ण कलश से सुशोभित था।"

ध्यान दें शिलालेख में केवल एक जगह "जन्मस्थान" शब्द आया है। जिसके संदर्भ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। श्लोक 5 की पहली पंक्ति में "वंश-तद्-एव-कुलम्" का जिक्र है। केवी रमेश ने " कुलम " शब्द का अनुवाद "वंश" या "परिवार" के रूप में किया है। उनके अनुवाद के अनुसार, कविता की पहली पंक्ति में कहा गया है कि कुलीन परिवार (उपरोक्त राजवंश) "वीरता का जन्मस्थान" था जिसने दूसरों (यानी अन्य क्षत्रिय कुलों) के कष्टों को मिटा दिया था।

इस शिलालेख में प्रत्यक्ष तौर पर श्रीराम का जिक्र नहीं है। इसी कारण मुस्लिम पक्ष को यह सवाल उठाने का मौका मिल गया कि- यहां "वीरता का जन्मस्थान" जुमले का इस्तेमाल रामजन्म स्थान के लिए हुआ है या यहां आयुष चंद्र अपने कुल के जन्मस्थान के बारे में बता रहा है। सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन का तर्क था कि इस शिलालेख को राम जन्मभूमि मंदिर से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता।

धवन कहते हैं कि-

 
"डॉ. रमेश ने श्लोक 5-पंक्ति 4 और 5 में, कुलीन परिवार का संदर्भ देते हुए उन्होंने राम का अनुवाद किया है। "वीरता की जन्मभूमि" के रूप में यहां "जन्मभूमि - अर्थात जन्म-स्थान राजवंश के शाही क्षत्रिय परिवार की जन्मभूमि से है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस परिवार के लोग बाद में साकेत मंडल के समय में सरदार बने। इसलिए "जन्मभूमि" भगवान "राम का जन्मस्थान" नहीं बल्कि उस समय के शाही राजवंश जन्मस्थान है।"

श्लोक 27 में (जो आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त था) सामंत आयुष चंद्र की तुलना विष्णु के चार अवतारों से की गई है। डॉ रमेश के इसका अनुवाद इस तरह करते हैं-"विष्णु, जिसने राक्षस हिरण्यकश्यप को उसके कंकाल से अलग कर दिया था। जिसने युद्ध में राक्षस बाणासुर को वश में किया। जिसने राक्षस बलि की भुजाओं का दमन किया था। जिसने कई वीरतापूर्ण कार्य किए और दुष्ट दस सिर वाले राक्षस को मार डाला।"

ये चार अवतार क्रमश: नरसिम्हा, कृष्ण, वामन और श्रीराम हैं जिनके नाम शिलालेख पर नहीं हैं। बहस के दौरान धवन ने कहा-

 
"शिलालेख के प्रस्तुतीकरण में भगवान राम पर कोई विशेष महत्व या फोकस नहीं किया गया है।" यानी उनका कहना था कि अगर यह राम जन्म भूमि से जुड़ा मंदिर है तो शिलालेख में भगवान राम को अधिक फोकस किया जाना चाहिए था। श्लोक 27 भगवान विष्णु की स्तुति में है। जिसमें भगवान राम का विशेष उल्लेख नहीं है।
 


17वीं शताब्दी के शिलालेख के रूप में पहचान

इतिहासकार राम शरण शर्मा और सीता राम रॉय जैसे कुछ विद्वानों का मानना है कि विष्णु-हरि शिलालेख 17वीं शताब्दी या उसके बाद का हो सकता है। पुरातत्वविद् सीता राम रॉय ने शिलालेख के नागरी लिपि वर्णों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि ये भाषा गढ़वाला राजवंश के संस्थापक चंद्रदेव के 1098 ईस्वी शिलालेख में दिखाई देने वाली संस्कृत भाषा से कहीं अधिक विकसित है।

इतिहासकार राम शरण शर्मा का तर्क है कि मंदिर शब्द, जो इस शिलालेख में आता है, मूल रूप से "निवास" के अर्थ में आता था। 18वीं शताब्दी तक किसी भी संस्कृत पाठ में हिंदू मंदिर का वर्णन करने के लिए इसका उपयोग नहीं किया गया था।

सबसे खास बात यह है कि 17वीं शताब्दी के संत तुलसीदास सहित किसी भी पूर्व स्रोत में राम के जन्मस्थान पर किसी भव्य मंदिर का उल्लेख नहीं है। इन तर्कों के आधार पर, शर्मा ने निष्कर्ष निकाला कि विष्णु-हरि शिलालेख 17वीं शताब्दी का शिलालेख है जो रहस्यमय तरीके से 16वीं शताब्दी की बाबरी मस्जिद की "ईंटों की दीवार में छिपा हुआ था"।

इतिहासकार राम शरण शर्मा तर्क देते हैं कि "विष्णु सहस्रनाम पाठ में विष्णु के एक हजार नामों की सूची दी गई है। इसमें  विष्णु-हरि" शब्द कहीं नहीं है। हालांकि विष्णु" और "हरि" देवता के नाम के रूप में अलग-अलग दिखाई देते हैं। (Ram Sharan Sharma (2003). "The Ayodhya Issue". In Robert Layton, Peter G. Stone and Julian Thomas (ed.). Destruction and Conservation of Cultural Property)

बहरहाल दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नवम्बर 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में नतीजा निकाला-"साक्ष्यों से पता चलता है कि विवादित ढांचे से शिलालेख की बरामदगी नहीं हुई है। इस तरह सूट 5 में वादी ने शिलालेख के आधार पर जो तर्क दिए हैं उसकी महत्वपूर्ण कड़ी लापता है।


(सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दर्ज विष्णु हरि शिलालेख पर डा. केवी रमेश की रिपोर्ट)

हालांकि शिलालेख विष्णु हरि के अस्तित्व का संकेत देता है और यह भी बताता है कि अयोध्या में विष्णु हरि मंदिर का निर्माण बारहवीं शताब्दी ई. में हुआ था लेकिन प्रश्नगत स्थल से शिलालेख की बरामदगी अविश्वसनीय है। ये शिलालेख यह निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं हो सकता कि इसमें जिस विष्णु हरि मंदिर का उल्लेख किया गया है वह ध्वस्त स्थल पर ही मौजूद मंदिर था।" (सुप्रीम कोर्ट जजमेंट, 9 नवंबर 2019, पेज 650)


(सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दर्ज विष्णु हरि शिलालेख पर डॉ. केवी रमेश की रिपोर्ट)

इसका अर्थ यह है कि 12वीं सदी में यहां आयुष चंद्र या मेघसुत ने कोई भव्य मंदिर बनवाया था तो उसका दस्तावेजीय प्रमाण इतिहास के पुराने पन्नों में जरूर होना चाहिए। या कोई और पुरातात्विक प्रमाण मिले जो इसे सिद्ध करे। नहीं तो इतिहास में रुचि रखने वालों को बाबर ने जो मंदिर तोड़ा उसे किसने बनवाया था यह कभी पता नहीं चल सकेगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें