खुद ईरान में अल्पसंख्यक सुन्नियों, बहाइयों, पारसियों और कुर्दों के साथ क्या व्यवहार होता है, यह दुनिया जानती है।
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तीसरा है मलेशिया, जिसने सउदी अरब की मर्जी के खिलाफ जाकर मुस्लिम देशो को इकट्ठा करने की कोशिश की थी। अब इसमें ईरान का नाम भी शामिल हो गया है। इन चारो देशों में भी ईरान अकेला शिया बहुल देश है।
पिछले दिनों चीन ने मध्यस्थता कर ईरान और सुन्नी बहुत सउदी अरब के बीच समझौता कराके दुनिया को चौंकाया था। हालांकि, इससे दोनो चिर प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच रिश्ते बहुत मधुर हो गए हैं, ऐसा नहीं है। खामेनेई के बयान के पीछे भारत और सउदी अरब के मधुर रिश्ते भी कारण हो सकते हैं।
खामेनेई का भारतीय अल्पसंख्यक मुस्लिमों के प्रति प्रेम सही भी हो सकता था, अगर खुद ईरान में अल्पसंख्यकों के साथ मानवीय व्यवहार होता। मुस्लिम भाईचारे के तमाम दावों के बाद जमीनी हकीकत यह है कि आज दुनिया में सर्वाधिक मारकाट मुस्लिम देशों और कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के बीच ही हो रही है।
स्टेटा रिसर्च डिपार्टमेंट के ताजा आंकड़ो के मुताबिक वर्ष 2021 से 2022 तक दुनिया भर में आतंकी घटनाओं में कुल 55 हजार 635 लोग मारे गए, जिनमें से अधिकांश मुसलमान ही थे। मरने वाले भी और मारने वाले भी।
हालांकि, इसमें गजा में मारे जाने वाले मुसलमानों की संख्या शामिल नहीं है। जहां हमास-इजराइल युद्ध में 50 हजार से ज्यादा मुसलमान मारे जा चुके हैं। खुद ईरान में अल्पसंख्यक सुन्नियों, बहाइयों, पारसियों और कुर्दों के साथ क्या व्यवहार होता है, यह दुनिया जानती है। बहाइयों को तो वहां कब्रिस्तान भी नसीब नहीं होते। ईरान में हिजाब विरोधी आंदोलन का प्रतीक बनी महसा अमीनी की हत्या वहां की मॉरल पुलिस ने इसलिए भी की थी, क्योंकि वह कुर्द थी।
कैम्ब्रिज से प्रकाशित पत्रिका ‘मनारा’ में हाल में ईरान में अल्पसंख्यक सुन्नियों के हालात पर पेमान असदजादे का आंखें खोलने वाला लेख छपा है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे ईरान में सुन्नियों के साथ खुला भेदभाव किया जा रहा है। सुन्नी मुसलमान ईरान में करीब 10 फीसदी हैं और देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी है।
ये सुन्नी ज्यादातर लारेस्तान में रहते हैं और ईरानी, बलूच, कुर्द, तुर्कमान, अरब आदि में बंटे हुए हैं। केवल ईरान के तीन प्रांतों कुर्दिस्तान, सिस्तान और बलूचिस्तान में वो बहुसंख्यक हैं। ये वो इलाके हैं, जो विकास की दौड़ में बहुत पिछड़े हैं या जिनकी ईरान सरकार द्वारा जानबूझकर उपेक्षा की जाती रही है। यहां तक देश में शिया और सुन्नियों के बीच साक्षरता दर में बहुत फर्क है।
सुन्नी इलाकों में शुद्ध पेयजल तक आसानी से उपलब्ध नहीं है। जहां तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात है कि ईरान सरकार में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद सुन्नी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। ईरान में शियाओं का एक उप सम्प्रदाय बारह इमाम को मानना ही देश का आधिकारिक धर्म है।
हालांकि, सुन्नियों को उनका धर्म मानने की इजाजत है। सुन्नियों के दबाव के चलते हाल के कुछ वर्षों में उनका ईरान सरकार में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश जरूर की गई है। लेकिन सुन्नी से भेदभाव की भावना अब सुन्नी आतंकी संगठनों की हिंसक कार्रवाइयों में तब्दील होती जा रही है। वहां जैश-उल-अदल तथा जैश-उल-अंसार तथा अल-फुरकान जैसी सुन्नी आतंकवादी सगंठन दक्षिणी ईरान में सक्रिय हैं।
पिछले दिनो ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में जो एयर स्ट्राइक की थी, वह सुन्नी बलूची संगठनों के खिलाफ ही थी। यही हाल सुन्नी कुर्दों का भी है। ईरान सरकार उन्हें सख्ती से कुचलती रही है।
इधर भारत में मोदी सरकार पर आरोप है कि उसके राज में देश में मुसलमानों को हाशिए पर डालने की कोशिश की जा रही है। इसमे आंशिक सच्चाई हो सकती है, लेकिन इसकी तुलना गजा, म्यानमार जैसे देशों से करना यही साबित करता है कि ईरानी सुप्रीम लीडर के लिए मुसलमान होने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है। गनीमत है कि अयातुल्लाह खामेनेई और ईरान के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा यदा कदा दिए जाने वाले भारत विरोधी और मुस्लिम समर्थक बयानों के बावजूद दोनो देशों के कूटनीतिक व व्यापारिक रिश्तों पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ा है।
ईरान पर उसके परमाणु कार्यक्रम के कारण कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं। इसके बाद भी भारतीय नेता ईरान का दौरा करते रहे हैं। हाल में दोनो देशों के बीच हुए एक अहम समझौते के तहत ईरान के चाबहार स्थित शाहित बहिश्ती बंदरगाह का संचालन अगले 10 साल के लिए भारत ही करेगा। जिसका लाभ अफगानिस्तान को भी होगा और जिसे पाकिस्तान के ग्वादर में चीन द्वारा विकसित किए जा रहे बंदरगाह का जवाब माना जा रहा है।
भारत ईरान से मुख्य रूप से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। जबकि ईरान भारत से बासमती चावल व अन्य वस्तुएं आयात करता है। बहरहाल खामेनेई के खुले भारत विरोध के बाद ईरान के साथ हमारे रिश्ते क्या दिशा लेते हैं, यह देखने की बात है।
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