वन विभाग गैर-सरकारी संगठनों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर सांपों को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित करने और महत्वपूर्ण आवासों की GIS तकनीक की मदद से निगरानी करने का काम करता है। यह प्रयास संघर्ष को कम करने और महत्वपूर्ण सांप प्रजातियों के संरक्षण के व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।
भारत में कई सांपों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) के तहत कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। उदाहरण के लिए, ज़हरीला किंग कोबरा अनुसूची-I प्रजातियों में शामिल है, जिसका अर्थ है कि इसे पकड़ना, मारना या व्यापार करना कानूनन अपराध है। अपराधियों को कड़ी सजा का सामना करना पड़ता है, जिसमें जेल और जुर्माना दोनों शामिल हैं। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक मान्यताओं और जागरूकता की कमी के कारण कानूनों का प्रवर्तन कठिन हो जाता है, जिससे सांपों की आबादी खतरे में पड़ जाती है।
एंटीवेनम उत्पादन सांप के काटने के प्रबंधन का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। महाराष्ट्र में हाफ़काइन संस्थान जैसे उन्नत सुविधाएँ हैं, जो 'बिग फोर' के लिए एंटीवेनम का उत्पादन करती हैं। हालांकि, विष की संरचना में क्षेत्रीय विविधता को देखते हुए, शोधकर्ता अधिक स्थानीयकृत एंटीवेनम की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं। IISc Venomics Lab क्षेत्र-विशिष्ट उपचार विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभा रही है, जिससे सांप के काटने के शिकार लोगों के परिणामों में सुधार हो सके।
सांपों के प्रति जागरूकता और सुरक्षित हैंडलिंग पर आधारित कार्यशालाएँ, जो अक्सर NGOs द्वारा आयोजित की जाती हैं, उन समुदायों को लक्षित करती हैं जहाँ सांप के काटने की घटनाएँ अधिक होती हैं। ये कार्यक्रम न केवल प्राथमिक चिकित्सा सिखाते हैं, बल्कि सांपों को सुरक्षित रूप से पकड़ने और छोड़ने के महत्व पर भी जोर देते हैं, जिससे मानव और सांप दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, दूरदराज के क्षेत्रों में फील्ड सर्वेक्षण, जैसे सांपों की आबादी की निगरानी के लिए ट्रांसेक्ट वॉक करना, कठिन भूभाग, सीमित पहुंच और स्थानीय समर्थन की कमी जैसी चुनौतियाँ पेश करता है। स्थानीय स्वयंसेवकों की भागीदारी और प्रशिक्षण इन चुनौतियों को कम करने में मदद कर सकता है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) भारत में सांप संरक्षण का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह कई ज़हरीले सांपों, जैसे किंग कोबरा, को उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान करता है, शिकार और अवैध व्यापार को प्रतिबंधित करता है। फिर भी, ग्रामीण क्षेत्रों में इन कानूनों को लागू करना एक चुनौती बनी हुई है, क्योंकि पारंपरिक मान्यताएँ और कानूनी ज्ञान की कमी बाधा उत्पन्न करती हैं।
भारत में सांपों के प्रति जागरूकता के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें वैज्ञानिक अनुसंधान, कानूनी सुरक्षा और सामुदायिक कार्रवाई का संयोजन शामिल है। IISc जैसे संस्थान, NGOs, वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर सांप के काटने और संरक्षण से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सांपों की पारिस्थितिक भूमिका की बेहतर समझ और अधिक प्रभावी एंटीवेनम उपचार के साथ, भारत धीरे-धीरे सर्पदंश और सांप संरक्षण के खतरों पर काबू पा रहा है और इन महत्वपूर्ण प्राणियों के साथ एक सुरक्षित सह-अस्तित्व की दिशा में बढ़ रहा है।
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