1900 तक ऑस्ट्रेलिया में फ़िल्म इंडस्ट्री की नींव पड़ चुकी थी
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ऑस्ट्रेलियाई फ़िल्म इंडस्ट्री
1900 तक ऑस्ट्रेलिया में फ़िल्म इंडस्ट्री की नींव पड़ चुकी थी। उस समय ऑस्ट्रेलिया ब्रिटिश साम्राज्य का अंग था। यूरोप के अधिकांश प्रड्यूसरों ने ऑस्ट्रेलिया में प्रोडक्शन की सुविधाएं स्थापित कीं। जल्द ही फ़िल्में ऑस्ट्रेलियन जीवन का अंग बन गईं, वे कम खर्च में मनोरंजन का साधन और आवश्यकता बन गईं। आज ऑस्ट्रेलियन सिनेमा नस्ल, आदिवासी अवस्था, लैंगिकता, प्रवासी के प्रतिनिधित्व के लिए जाना जाता है।
अभी हाल में 1989 से ऑस्ट्रेलिया में रह रही भारतीय मूल की लेखक-निर्देशक अनीता बरार ने ‘क्रॉसिंग द लाइन’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है, जिसका विश्व के विभिन्न फ़िल्म समारोह में प्रदर्शन हो रहा है। इसमें भारत विभाजन के भुक्तभोगियों के साक्षात्कार रिकॉर्ड किए गए हैं। ये ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के सीनियर सिटीजन हैं, जो देश विभाजन के समय जान बचा कर भागे थे और जीवित रह गए।
ऑस्ट्रेलिया में 1986 में एक खूब चर्चित फ़िल्म ‘क्रोकोडाइल डन्डी’ बनी। इस 97 मिनट के एडवेंचर-कॉमेडी फ़िल्म में एक अमेरिकन रिपोर्टर एक सनकी मगरमच्छ शिकारी से मिलने ऑस्ट्रेलिया जाता है और फ़िर उसे न्यूयॉर्क आमंत्रित करता है। पीटर फ़ाइमैन निर्देशित इस फ़िल्म में पॉल होगन, लिंडा कोज़्लोवस्की आदि ने भूमिकाएं की हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया की फ़िल्मों की दुनिया में धूम मची जेन कैम्पियन निर्देशित 1993 की फ़िल्म ‘द पियानो’ से। इस 121 मिनट की फ़िल्म का दुनियाभर के संस्थानों में विश्लेषण और अध्ययन होता है।
होली हंटर, हार्वी कैटल, सैम नील तथा एना पाक्विन अभिनीत इस फ़िल्म ने नारीवाद को विमर्श का एक मुद्दा दिया। इसने तीन ऑस्कर पुरस्कार जीते।
ऑस्ट्रेलिया में फ़िल्मों में खूब प्रयोग हुए हैं, खासकर शैली और तकनीकि को लेकर। ऊपर हम ‘मौलिन रूज़’ की बात देख आए हैं। एक अन्य प्रयोग 2006 में जॉर्ज मिलर ने किया। उसने कम्प्यूटर-अनिमेटेड ज्यूकबॉक्स म्युजिकल कॉमेडी फ़िल्म ‘हैप्पी फ़ीट’ बनाई। बादशाह पेन्गुइन अपना साथी गा कर पाता है। लेकिन इसी दुनिया में एक ऐसा पेन्गुइन पैदा होता है, जो गा नहीं सकता है, पर उसकी एक विशेषता है कि वह मजे में टैप डॉन्स कर सकता है। इसे 2005 में बनी ‘मार्च ऑफ़ द पेन्गुइन्स’ से मत मिलाइएगा। दोनों बहुत अलग फ़िल्में हैं।
‘मार्च ऑफ़ द पेन्गुइन्स’ के भारतीय संस्करण में कथावाचक के रूप में अपनी आवाज से पहचाने जाने वाले अमिताभ बच्चन ने स्वर दिया है। पर हम बात कर रहे हैं ऑस्ट्रेलिया में बनी फ़िल्म ‘हैप्पी फ़ीट’ की। इसमें कई अन्य लोगों के साथ निकोल किडमैन ने भी अपना स्वर दिया है।
इसके पहले 2002 में एक ऐसी फ़िल्म ऑस्ट्रेलिया में बनी जिसे देख कर दर्शक चिंतन-मनन के लिए मजबूर हो जाता है। एक घंटे से कुछ कम अवधि की यह फ़िल्म बायोपिक है। फ़िल्म 1931 के ऑस्ट्रेलिया तथा वहां लागू अमानवीय कानून के विषय को लेकर बनी है। जहां प्रभु भलाई के नाम पर इस देश के आदिवासी बच्चों को उनके परिवार से दूर रखकर शिक्षा के नाम पर गुलाम/नौकर बनाने का काम करते हैं। बच्चे या यूं कहें ये बच्चियाँ पूर्णरूपेण आदिवासी नहीं हैं, इनमें श्वेत रक्त का मिश्रण हुआ है, मगर चूँकि इनके श्वेत पिता इनकी जिम्मेदारी नहीं लेते हैं, ये अपनी माँ के साथ रहते हैं अत: ये अभी भी अपनी सभ्यता-संस्कृति से जुड़ी हुई हैं।
निर्देशक फ़िलिप नॉयस की इस फ़िल्म में प्रशासन इसी सभ्यता-संस्कृति और बचपन को नष्ट करने का काम योजनाबद्ध तरीके से करता है। इसमें गैर पेशेवर लोगों ने अभिनय किया है और कमाल का अभिनय किया है।
फ़िल्म समाप्त होने के बाद इस नष्ट हुई पीढ़ी से जुड़े तथ्य और आंकड़े परदे पर उभरते हैं। अगर अपने अब तक नहीं देखी है तो फ़िल्म ‘रेबिट-प्रूफ़ फ़ेंस’ अवश्य देखें। ‘चॉपर’, ‘शाइन’, ‘लायन’, ‘आई एम ए मदर’, ‘रेड डॉग’, ‘केयरफ़ुल, ही माइट हियर यू’ आदि ऑस्ट्रेलिया की कुछ अन्य उल्लेखनीय फ़िल्में हैं जिन्हें देखा जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में फ़िल्म बनने का सिलसिला जारी है।
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