एक तरह से यह मान लिया गया है कि मोदी जी करिश्माई इंसान हैं। वो जो कहते हैं वो करते हैं। और वो वही करते हैं, जो बहुतांश हिंदू मन चाहता है।
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कांग्रेस ने इस रेवड़ी कल्चर पर अपनी गारंटी का मुलम्मा चढ़ाया तो मोदी ने इसे ही अपनी गारंटी बताकर उसे राजनीतिक सिक्योरिटी बांड में तब्दील कर दिया। अगले लोकसभा चुनाव में यह बांड पूरी ताकत से बेचा जाएगा। इसमें दो राय नहीं कि हिंदू समाज और खासकर उत्तर पश्चिम भारत में मोदी के दीवानों की कमी नहीं है।
यह दीवानगी समूचे पिछड़े वर्ग में तो है ही, सवर्णों में भी जबर्दस्त है। आंशिक रूप से मोदी दलित और आदिवासियों में भी कबूल हो चुके हैं। लोगों की यह मोदी भक्ति तर्कों और प्रश्नों से परे है। इसमें जल्द कोई कमी आएगी, यह मान लेना खुद को भ्रम में रखना है।
मोदी की क्षमता और नजरिया-
एक तरह से यह मान लिया गया है कि मोदी जी करिश्माई इंसान हैं। वो जो कहते हैं वो करते हैं। और वो वही करते हैं, जो बहुतांश हिंदू मन चाहता है। यह हकीकत है कि मोदी की इस गजब विश्वसनीयता पर विरोधियों द्वारा लगाए जाने वाले तमाम प्रश्नचिन्ह जनता ने खारिज कर दिए हैं। यानी कांग्रेस अथवा दूसरी विपक्षी पार्टियों की रेवड़ियों
अथवा गारंटियों पर मोदी की गारंटी भारी पड़ी है और आगे भी भारी पड़ेगी। इसका असर उन दक्षिणी राज्यों में भी दिखेगा, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वहां भाजपा के लिए दरवाजे पहले ही नहीं खुले थे या फिर खुलने के बाद अब बंद हो गए हैं। यानी वहां विधानसभा चुनाव में मोदी का जादू भले न चला हो, लोकसभा में वो कुछ न कुछ असर जरूर दिखाएगा।
एक और मुद्दा है मोदी का नया जातिवाद। देश में ओबीसी जातिगणना को लेकर मोदी सरकार पर बनाए जा रहे राजनीतिक दबाव और हिंदू एकता के बरक्स मंडल राजनीति की चिंगारी को फिर से हवा देने की सुनियोजित कोशिशों के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिंदू सहित सभी समाजों की चार नई जातियां गिनाना शुरू किया है।
ये हैं युवा, महिला, किसान और गरीब। इसे मंडल राजनीति-2 के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। समूचे देश में यह दांव कितना कारगर होगा, यह देखने की बात है, लेकिन तीन हिंदी भाषी राज्यों में तो यह कामयाब रहा है। मतदाता ने कांग्रेस के जातिगणना के वादे को खास तवज्जो नहीं दी। खासकर मप्र में ये मुद्दा इसलिए भी बेअसर रहा, क्योंकि यहां बीजेपी बीस साल से पिछड़ों की राजनीति ही कर रही है और अधिकांश पिछड़ी जातियां राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को ही अपना आइकन मानती हैं और इसमें कोई फर्क शायद ही पड़े।
बीजेपी ने उत्तर भारत में इसी बिना पर कांग्रेस पर हमले किए कि वह सनातन धर्म विरोधी है।
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कांग्रेस की गलतियां और संगठन-
यहां सवाल यह है कि इन परिस्थितियों में कांग्रेस को आखिर किस तरह की राजनीति करनी चाहिए और जाति गणना का मुद्दा उठाने से उसे क्या लाभ मिलना है? यह सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर आज भी ओबीसी नेताओं की संख्या नगण्य है। वहां ज्यादातर अगड़े और गिने चुने दलित नेता ही हैं।
राहुल गांधी ने चुनाव के दौरान जैसे जैसे ओबीसी का मुद्दा उठाना शुरू किया, कहते हैं कि वैसे वैसे कमलनाथ के मन में यह शंका घर करती गई कि यदि पार्टी सचमुच चुनाव जीती तो कहीं आला कमान ऐन वक्त पर किसी ओबीसी को सीएम न बना दे। ओबीसी राजनीति के प्रति अनावश्यक झुकाव कांग्रेस के लिए आत्मघाती ही होगा। दूसरा मुद्दा सनातन का रहा।
हालांकि, सनातन धर्म पर हमला कांग्रेसनीत् इंडिया गठबंधन में शामिल डीएमके ने किया था, जो तमिलनाडु की राजनीति के हिसाब से सही भी हो सकता है, लेकिन कांग्रेस ने उससे खुद को अलग नहीं किया। जबकि यह बहुसंख्य हिंदुओं की आस्था पर सीधी चोट थी। बीजेपी ने उत्तर भारत में इसी बिना पर कांग्रेस पर हमले किए कि वह सनातन धर्म विरोधी है।
कमलनाथ ने मप्र में इस खतरे को भांपकर खुद को ज्यादा सनातनी साबित करने की कोशिश की, लेकिन उस पर किसी ने भरोसा नहीं किया और भाजपा की इस पिच पर वो हिट विकेट ही हुए। इसी तरह इजराइल- हमास युद्ध का भारत और चुनाव वाले तीन राज्यों से कोई सम्बन्ध नहीं था। पीएम मोदी ने हमास द्वारा इजराइल पर आतंकी हमले के समय जो पहला ट्वीट किया उसी से समूचे हिंदू समाज में अलग संदेश जा चुका था।
विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इसका राजनीतिक जवाब देने की नियत से ताबड़तोड़ सीडब्ल्यूसी की बैठक बुलाकर फिलिस्तीनियों के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया, जिसमें हमास के हमले की कहीं कोई आलोचना नहीं थी। मुस्लिम वोटों को साधने की कांग्रेस की इन कोशिशों का बहुसंख्यक समाज में विपरीत संदेश गया।
हैरानी की बात यह थी कि कांग्रेस के अंदरूनी झगड़ों को सुलझाने के लिए सीडब्ल्यूसी की बैठक महीनो नहीं होती। लेकिन विदेश नीति से जुड़े फिलिस्तीन के मुद्दे पर ताबड़तोड़ प्रस्ताव पारित किया गया। विदेश नीति से जुड़े मामले में कांग्रेस सोच समझकर प्रतिक्रिया दे सकती थी। चौथा, मुद्दा खुद राहुल गांधी हैं।
ज्यादातर लोगों में यह धारणा है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रूप में राहुल ने जो कुछ कमाया था, उसका काफी कुछ उन्होंने अपनी दो प्रायोजित विदेश यात्राओं में गंवा दिया। कोई भी व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो, घर के झगड़े पड़ोस में जाकर बताए और परायों से इसका गिला करे, यह शायद ही कोई पसंद करता है। राहुल भारत में पीएम मोदी पर कितने ही हमले करें, लेकिन विदेश में जाकर जब वो मोदी, भाजपा और आरएसएस का रोना रोते हैं, तो उसका लोगो में अनुकूल संदेश नहीं जाता।
इससे उनकी निर्भीकता कम कम राजनीतिक अपरिपक्वता और बचपना ज्यादा झलकता है। वो ऐसा किसकी सलाह पर करते हैं, नहीं पता, लेकिन ये भी छोटे छोटे लेकिन गंभीर कारण हैं, जिनसे मतदाता कांग्रेस से छिटका है। यही स्थिति रही तो लोकसभा में कांग्रेस वहां भी ज्यादा सीटे नहीं जीत पाएगी, जहां वो सत्ता में है।
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