राजस्थान में वसुंधरा राजे से व्यक्तिगत नाराज़ी, टिकटों का बंटवारा, जातिगत समीकरण और भाजपा का भीतरघात बड़े कारण रहे।
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राजस्थान में वसुंधरा राजे से व्यक्तिगत नाराज़ी, टिकटों का बंटवारा, जातिगत समीकरण और भाजपा का भीतरघात बड़े कारण रहे। अगर केवल सत्ता विरोध और रोटी पलटने की बात होती तो कांग्रेस यों हांफते हुए 101 का आंकड़ा नहीं छू रही होती, जो 130-140 सीटों की बात की जा रही थी, कांग्रेस को वही मिलती।
छत्तीसगढ़ में ज़रूर रमन सिंह की सरकार से उक्ताहट ने बड़ी भूमिका निभाई। इसमें जोगी-माया के गठबंधन ने भी कांग्रेस को फायदा पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। दलित और आदिवासी वोट बैंक ने सत्ता विरोध के प्रवाह को धार दे दी।
मध्यप्रदेश में शिवराज बनाम शिवराज की लड़ाई में शिवराज को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि तगड़े सत्ता विरोध के बाद भी वो इसे कांटा जोड़ मुक़ाबले में बदल पाए, पर यहीं इस स्थिति की पूरी जिम्मेदारी भी उनको लेनी होगी। अगर तीसरी बार के सत्ता विरोध को समझते हुए आज से 2 साल पहले ही उन्होंने टीम वर्क से काम किया होता, तो आज मध्यप्रदेश में भाजपा की लाज बचाने वाले वे अकेला राजा होते।
इन सभी स्थानीय कारणों के साथ और बावजूद भी, दरअसल ये पूरे चुनाव खासतौर पर हिन्दी क्षेत्र के ये तीन महत्वपूर्ण राज्य- मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ – लोकतन्त्र, चुनाव और मतदाताओं के मिजाज को भांपने के लिए तगड़ी अकादमिक सामाग्री प्रदान करने वाले हैं। ये चुनाव बताते हैं कि कैसे रीति, नीति, व्यक्ति, अहं और आक्रोश की मिली-जुली आहुति सत्ता के सिंहासन को हिला देती है। व्यक्ति के रूप में वसुंधरा लोगों को पसंद नहीं, पर भाजपा से फिर भी कुछ लगाव रहा।
व्यक्ति, रीति नीति और अहं के अंतर्विरोधों ने इन तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी
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इधर, सचिन पायलट को युवा नेतृत्व के रूप में देखने को दिल हामी भर रहा था। शिवराज की मेहनत दिख रही थी, पर वो किसान जो नाराज़ बैठा था उसका क्या? संघ के प्रति तो समर्पण है, पर वो नोटबंदी और जीएसटी ने गुस्सा दिलाया उसका क्या? शिवराज ने क्यों कहा कि कोई माई का लाल एससीएसटी एक्ट को बदलवा नहीं सकता? चावल वाले बाबा भले हैं, पर नक्सलवाद पूरी तरह खत्म तो नहीं हुआ? और लगातार जो आक्रोश का लावा खलबला रहा है तो उसका क्या?
इस तरह व्यक्ति, रीति नीति और अहं के अंतर्विरोधों ने इन तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी। मिज़ोरम में मिज़ो नेशनल फ्रंट की जीत तय दिखाई दे रही थी और तेलंगाना में टीआरएस ने अपने पत्ते सही खेले। इस हार-जीत का आकलन आगे भी होता रहेगा और निश्चित ही इसका प्रभाव 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। वो लड़ाई तो खासतौर पर इसलिए महत्वपूर्ण हो जाएगी की तब बहुत सारे चेहरे भी नहीं होंगे और मुद्दे भी तयशुदा होंगे।
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