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व्यक्ति, नीति, नियम, अहं और आक्रोश के बीच डोलता सत्ता का सिंहासन

Wed, 12 Dec 2018 04:37 AM IST
जयदीप कर्णिक
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मुरझाए कमल के पीछे बुझे हुए चेहरों के मुक़ाबले में सभी चैनलों पर राहुल गांधी का खिला हुआ चेहरा छाया रहा। - फोटो : File Photo
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आने वाले खतरे को बहुत अच्छे से भांप लिया था, इसीलिए वो पांच राज्यों के चुनावों में उतनी ताकत नहीं झोंक पाए जितनी अकेले गुजरात में लगा दी थी। प्रधानमंत्री मोदी अपनी महत्वपूर्ण बैठकों और विदेशी दौरों के बीच चुनावी सभाएं ले रहे थे, तो वहीं भाजपा अध्यक्ष इंदौर के सराफे में भीड़ के बीच चाट खाते हुए भी जीत की जुगत लगा रहे थे।

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रमन सिंह इस्तीफा देकर हार की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले चुके हैं। वसुंधरा राजे भी राजपाल को अपना इस्तीफा सौंप कर हार स्वीकार कर चुकी। शिवराज भी संख्या बल के आगे नतमस्तक होकर इस्तीफा दे चुके हैं। 

राहुल गांधी का खिला चेहरा और कांग्रेस की स्थिति 
रमन सिंह और वसुंधरा के मुरझाए कमल के पीछे बुझे हुए चेहरों के मुक़ाबले में सभी चैनलों पर राहुल गांधी का खिला हुआ चेहरा छाया रहा। आज की उनकी पत्रकार वार्ता बहुत सधी हुई थी। निश्चित ही पहले के मुक़ाबले वो बहुत परिपक्व नज़र आए और जीत के उत्साह में 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का दावा कर चुके हैं।
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ये भी एक अच्छा संयोग है कि राहुल गांधी 11 दिसंबर 2017 को ही अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। ठीक एक साल बाद अगर वो भाजपा के पूर्ण बहुमत वाली तीन सरकारों को उखाड़ फेंकने में सफल हुए हैं, तो निश्चित ही ये उनको उत्साहित करने वाला है। इस उत्साह के बीच बस उन्हें ये खुशफहमी पालने से बचना चाहिए कि ये चुनाव उन्हें नेता के रूप में स्वीकार्यता दिलाने के लिए था, या फिर ये उन्हें जननेता के रूप में स्थापित करता है, या ये उनकी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर मुहर है।

स्थानीय मुद्दे और स्थानीय चेहरे 
दरअसल, जो तीन राज्य कांग्रेस की झोली में आ गिरे हैं, उनमें तीनों ही जगहों पर स्थानीय मुद्दे और स्थानीय चेहरे सामने थे। राजस्थान में अशोक  गेहलोत और सचिन पायलट, मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और ताम्रध्वज साहू। हां, कांग्रेस के इन परस्पर विरोधी ध्रुवों को साथ रखकर चुनाव लड़वाने में कामयाबी का श्रेय ज़रूर राहुल गांधी को दिया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को भी खुला रखने की उनकी रणनीति कामयाब रही है, पर जो तीनों ही राज्य कांग्रेस के पाले में आए हैं, उनमें हर एक राज्य में अलग तरह के मुद्दे और कारण हावी रहे हैं।

हर राज्य की अलग कहानी 

राजस्थान में वसुंधरा राजे से व्यक्तिगत नाराज़ी, टिकटों का बंटवारा, जातिगत समीकरण और भाजपा का भीतरघात बड़े कारण रहे। - फोटो : File Photo

राजस्थान में वसुंधरा राजे से व्यक्तिगत नाराज़ी, टिकटों का बंटवारा, जातिगत समीकरण और भाजपा का भीतरघात बड़े कारण रहे। अगर केवल सत्ता विरोध और रोटी पलटने की बात होती तो कांग्रेस यों हांफते हुए 101 का आंकड़ा नहीं छू रही होती, जो 130-140 सीटों की बात की जा रही थी, कांग्रेस को वही मिलती।

छत्तीसगढ़ में ज़रूर रमन सिंह की सरकार से उक्ताहट ने बड़ी भूमिका निभाई। इसमें जोगी-माया के गठबंधन ने भी कांग्रेस को फायदा पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। दलित और आदिवासी वोट बैंक ने सत्ता विरोध के प्रवाह को धार दे दी।

मध्यप्रदेश में शिवराज बनाम शिवराज की लड़ाई में शिवराज को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि तगड़े सत्ता विरोध के बाद भी वो इसे कांटा जोड़ मुक़ाबले में बदल पाए, पर यहीं इस स्थिति की पूरी जिम्मेदारी भी उनको लेनी होगी। अगर तीसरी बार के सत्ता विरोध को समझते हुए आज से 2 साल पहले ही उन्होंने टीम वर्क से काम किया होता, तो आज मध्यप्रदेश में भाजपा की लाज बचाने वाले वे अकेला राजा होते।

इन सभी स्थानीय कारणों के साथ और बावजूद भी, दरअसल ये पूरे चुनाव खासतौर पर हिन्दी क्षेत्र के ये तीन महत्वपूर्ण राज्य- मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ – लोकतन्त्र, चुनाव और मतदाताओं के मिजाज को भांपने के लिए तगड़ी अकादमिक सामाग्री प्रदान करने वाले हैं। ये चुनाव बताते हैं कि कैसे रीति, नीति, व्यक्ति, अहं और आक्रोश की मिली-जुली आहुति सत्ता के सिंहासन को हिला देती है। व्यक्ति के रूप में वसुंधरा लोगों को पसंद नहीं, पर भाजपा से फिर भी कुछ लगाव रहा।

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कुछ छूट गया और कुछ शेष रहा 

व्यक्ति, रीति नीति और अहं के अंतर्विरोधों ने इन तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी - फोटो : File photo

इधर, सचिन पायलट को युवा नेतृत्व के रूप में देखने को दिल हामी भर रहा था। शिवराज की मेहनत दिख रही थी, पर वो किसान जो नाराज़ बैठा था उसका क्या? संघ के प्रति तो समर्पण है, पर वो नोटबंदी और जीएसटी ने गुस्सा दिलाया उसका क्या? शिवराज ने क्यों कहा कि कोई माई का लाल एससीएसटी एक्ट को बदलवा नहीं सकता? चावल वाले बाबा भले हैं, पर नक्सलवाद पूरी तरह खत्म तो नहीं हुआ? और लगातार जो आक्रोश का लावा खलबला रहा है तो उसका क्या?

इस तरह व्यक्ति, रीति नीति और अहं के अंतर्विरोधों ने इन तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी। मिज़ोरम में मिज़ो नेशनल फ्रंट की जीत तय दिखाई दे रही थी और तेलंगाना में टीआरएस ने अपने पत्ते सही खेले। इस हार-जीत का आकलन आगे भी होता रहेगा और निश्चित ही इसका प्रभाव 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। वो लड़ाई तो खासतौर पर इसलिए महत्वपूर्ण हो जाएगी की तब बहुत सारे चेहरे भी नहीं होंगे और मुद्दे भी तयशुदा होंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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