असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा (बाएं) और मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा।
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विवाद सुलझाने की कोशिश
असम-मेघालय के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए एक साथ पूरे विवाद को सुलझाने की जगह कोशिश यह की गई कि एक-एक जगह का विवाद निपटाया जाए। पहले छह स्थानों के लिए आपसी सहमति बनी। फिर उस पर केंद्र सरकार की सहमति से समझौते का रूप दे दिया गया।
अब भारतीय सर्वेक्षण ब्यूरो नए सिरे से सीमांकन करके उसे अमली रूप देगा, यानी अब छह स्थानों पर कोई सीमा विवाद नहीें होगा। केंद्र ने भी साफ कर दिया है कि यदि राज्यों के बीच आपसी सहमति से समाधान हो जाता है तो एक अच्छी बात है।
यह तो साफ है कि सीमा विवाद को निपटाने के लिए ‘लेना और देना’ की नीति पर चलना होगा। कुछ हिस्से मेघालय को देना होगा और कुछ मेघालय को असम के लिए छोड़ना होगा। कई इलाके ऐसे हैं, जहां पर कोई आबादी नहीं है। कुछ एकड़ खाली जमीन हैं। कहीं पर मात्र एक मैदान को लेकर विवाद है।
समिति ने ली आमलोगों की राय
सीमा विवाद सुमझाने के लिए जमीनी हकीकत को जानना जरूरी है। इसके लिए दोनों राज्यों ने मंत्री स्तरीय तीन समितियों का गठन कर दिया था। उन समतियों ने विवादित इलाके में जाकर आमलोगों की राय जानी और स्थिति को समझा। प्रारंभिक स्तर पर उन स्थानों का चयन किया गया, जहां मामले अधिक जटिल नहीं हैं। आपसी समझ से उन्हें सुलझाया जा सकता है।
समितियों की रिपोर्ट आने के बाद मुख्यमंत्री स्तर की वार्ता में आम सहमति बनाने का प्रयास हुआ।
असम कैबिनेट ने पहले चरण में 36.79 वर्ग किलोमीटर विवादित क्षेत्र को सुलझाने का फैसला लिया है, जिसमें से असम को 18.51 वर्ग किलोमीटर और मेघालय को 18.28 किलोमीटर देने पर सहमति बनी है। असम से काटकर 1972 में मेघालय और मिजोरम का गठन किया गया था। तब से सीमा विवाद जारी है। कई बार हिंसक घटनाएं घट चुकी है।
हालांकि विपक्षी दल इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनकी मांग है कि असम की जमीन देने के पहले इस बारे में विधानसभा में चर्चा होनी चाहिए।
इसमें दो राय नहीं है कि इस तरह का फैसला लेने के पहले सभी पक्षों की सहमति होनी चाहिए। असम सरकार को विधानसभा में चर्चा करनी चाहिए, लेकिन विपक्षी दलों को भी व्यवहारिक नजरिया अपनाना चाहिए, क्योंकि यह प्रयास राज्य के हित में जरूरी है।
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