बाल विवाह को लेकर सख्ती
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दरअसल, मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह का प्रचलन अधिक है। हालांकि मुस्लिमों को वोट बैंक के रूप में देखने वाले राजनीतिक दल इस तथ्य को सिरे से नकार देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उनका वोट बैंक उनसे छिटक जाएगा और सत्ता की चाबी उनसे दूर हो जाएगी। असम में फैसले के विरोध के पीछे भी यही राजनीतिक कारण है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि कई बार ऐसे फैसलों का भी विरोध किया जाने लगता है जो कि समाज के हित में हों। अधिकांश मामलों में राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर पार्टियां बेवजह विरोध में उतर आती हैं, जबकि इस फैसले के देशहित में दूरगामी परिणाम होंगे।
‘बाल विवाह मुक्त भारत’ आंदोलन
यहां पर बीते साल हुए एक देशव्यापी आंदोलन का जिक्र करना लाजिमी है। इस आंदोलन का नाम था ‘बाल विवाह मुक्त भारत’। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने इस आंदोलन की शुरुआत 16 अक्टूबर, 2022 को की थी। देशभर के करीब 500 जिलों में 70,000 से ज्यादा महिलाओं ने बाल विवाह के विरोध में मशाल जुलूस निकाला था। महिलाओं की इतनी बड़ी हिस्सेदारी इस बात का सुबूत है कि बाल विवाह के दुष्परिणामों से देश चिंतित है।
आंदोलन से देशभर में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दो करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े थे। जो लोग यह मानते हैं कि देश में बाल विवाह कोई समस्या नहीं है और बहुत ही छोटे स्तर पर या कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में ही बाल विवाह होता है, उनके लिए ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ आंदोलन को जानना जरूरी है।
जरूरत है कि असम सरकार के फैसले को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाए और बाल विवाह की बुराई को खत्म करने के लिए सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला जाए। सरकार किसी विशेष राजनीतिक दल की हो सकती है लेकिन बेटियां तो हमारी हैं। आखिर एक बेटी से कैसे उसका भविष्य छीना जा सकता है? कैसे उनके सपनों की उड़ान को रोका जा सकता है। यदि बेटियों का बाल विवाह नहीं होगा तो वे भी उच्च शिक्षा हासिल कर सकती हैं, रोजगार हासिल कर सकती हैं, रोजगार दे सकती हैं।
इस तरह से वे देश की आर्थिक प्रगति में अपना अमूल्य योगदान दे सकती हैं। पढ़ी-लिखी और सशक्त बेटियों से आने वाली पूरी पीढ़ी की तकदीर बदल जाएगी। इसलिए असम सरकार के फैसले का समर्थन करना ही न्यायोचित है। साथ ही अन्य राज्य सरकारों को भी हेमंत बिस्वा सरमा के फैसले से सीख लेनी चाहिए और बाल विवाह जैसी बुराई के अंत के लिए कदम उठाना चाहिए।
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