सीता वाटिका में हनुमान का पद्चिन्ह आज भी मौजूद हैं।
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हनुमान के पद्चिन्ह
सीता वाटिका में हनुमान का पद्चिन्ह आज भी मौजूद हैं। वहां के पुजारी शिवराज शर्मा बताते हैं कि जब हनुमान सीता को खोजते-खोजते पहली बार वाटिका में आए थे, तो उनका पहला कदम जिस जगह पर पड़ा था वहां बड़ा सा गड्ढा बना हुआ है। गड्ढे को आस्था से स्पर्श कर श्रद्धा से से भर जाते हैं।
विदेशी श्रद्वालुओं की जिज्ञासा
श्रीलंका में भारत के अलावा दूसरे देशों के पहुंचने वाले श्रद्वालुओं में सीता वाटिका के इतिहास के संबंध में जानने की अभिरुचि ज्यादा रहती है। हालांकि इसके लिए वहां के व्यवस्थापकों ने पूरी इंतजाम किए हैं। रामायण व पुराने अभिलेखों के माध्यम से वहां के लोग विस्तार से बताते हैं। माता सीता के हरण के बाद रावण कब-कब वाटिका में आता था, सुरक्षा में कितनी दासियां लगाई थीं, पहरेदारी कैसी की गई थी, ऐसी तमाम बातें वहां के लोग बड़ी तल्लीनता से समझाते हैं। जो लोग रामायणकाल को काल्पनिक मानते हैं उनके लिए सीता वाटिका किसी बड़े सबूत से कम नहीं है।
मुख्य पुजारी शिवराज शर्मा कहते हैं रामायण की सभी बातें सच हैं। श्रीलंका रामायण रिसर्च सेंटर ने अपने दशकों की खोज के बाद रामयुग के अनसुलझे किस्सों का पता कर लोगों के भ्रम को तोड़ने का काम किया है।
यात्रा संस्मरण, श्रीलंका से लौटकर.
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