कला चौपाल में बुजुर्ग कलाकारों ने बचपन की स्मृतियां साझा कीं- कैसे बच्चे घर-घर टेसू मांगने जाते, बांस और रंगीन कागज से टेसू बनाते, चंदे से टेसू-झिंझिया का ब्याह रचाते और पूरे मोहल्ले के साथ भोज-नाच होता था।
झलकारीबाई नगर की छोटी-सी बुंदेली बस्ती में देर शाम जब टेसू गीत की गूंज उठी, तो लगा मानो लोक चेतना की बुझती लौ को नई सांस मिल गई हो। झांसी की पुलिया नंबर नौ के नाम से पहचानी जाने वाली इस बस्ती में जुटे लोक कला प्रेमियों और रंगकर्मियों ने लोक संस्कृति के संकट और उसके संरक्षण पर गंभीर संवाद किया। टेसू गीत की लय ने चर्चा को जीवंत बना दिया और अतीत की स्मृतियों को वर्तमान से जोड़ दिया।
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बिजुरी (शहडोल) की कोयला खदानों से भारतेंदु नाट्य अकादमी पहुंचे रंगकर्मी आरिफ शहडोली ने जब बस्ती की लोक परंपरा का जिक्र छेड़ा तो लोक नाट्यकर्मी माताप्रसाद शाक्य मस्ती में पारंपरिक टेसू गीत गाने लगे। उनके साथ पूर्व रामलीला कलाकार प्रेमकुमार भी सुर मिलाते चले गए। इन गीतों में बस्ती के प्रसिद्ध लोगों, उनके काम और लोक जीवन की झलक साफ दिखाई दी, जिसे उपस्थित लोकधर्मियों ने पूरे ध्यान से सुना।
एनएसडी दिल्ली के पूर्व रंगकर्मी मुकेश सक्सेना (बच्चन) बस्ती की लोक परंपराओं को जानने के लिए उत्सुक दिखे। कला चौपाल में बैठे बुजुर्ग कलाकार रामस्वरूप चक ने बचपन की स्मृतियां साझा कीं- कैसे बच्चे घर-घर टेसू मांगने जाते, बांस और रंगीन कागज से टेसू बनाते, चंदे से टेसू-झिंझिया का ब्याह रचाते और पूरे मोहल्ले के साथ भोज-नाच होता था। यह परंपरा सामूहिकता और साझी संस्कृति का उत्सव थी।
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झलकारीबाई लोक कला समिति के लोक कलाकार माताभाई ने टेसू-झिंझिया की लोक कथा का उल्लेख किया, जिसमें टेसू राजा दैत्य सुआटा का वध कर कन्याओं की रक्षा करता है और उसकी पुत्री झिंझिया से विवाह करता है। समय के साथ टेसू गीतों में बदलाव आया है। आज बस्ती के बच्चे नए शब्दों के साथ टेसू की टेर कायम रखे हुए हैं, जो परंपरा के जीवित रहने का
संकेत है।
बुंदेली लोक कवि साकेत सुमन चतुर्वेदी ने बस्ती की बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाया- लोक संपदा से समृद्ध होने के बावजूद कलाकारों को आंगन और छतों पर नाट्य आयोजन करने पड़ते हैं। एक सामुदायिक केंद्र की सख्त जरूरत है। चर्चा के दौरान कीर्तनकार गुरु काशीनाथ की परंपरा, उनकी विलक्षण काव्य शैली और शिष्यों द्वारा उसे जीवित रखने के प्रयासों का भी स्मरण किया गया। कुल मिलाकर यह शाम बुंदेली लोक कला की जिजीविषा, संघर्ष और उम्मीद की जीवंत मिसाल बन गई।