क्या समाज बदल गया है? क्या समाज को हिंसा अधिक पसंद आती है? हाल में रिलीज फिल्म एनिमल को देखकर तो यही प्रतीत हो रहा है। बेहद हिंसक फिल्म होने के बावजूद 'एनिमल' कमाई के नए कीर्तिमान गढ़ने की ओर बढ़ चली है। निश्चित रूप से यह बेहद चिंता का विषय है। आखिर ऐसी फिल्मों को क्यों मनाया जा रहा है? सरकार के अधीन बैठा सेंसर बोर्ड ऐसी फिल्मों को रिलीज करने की अनुमति कैसे दे देता है? क्या फिल्म जगत अनियंत्रित हो गया है?
यदि ऐसी हिंसक फिल्में, जिसमें मुख्य किरदार ही हिंसक गतिविधियों में शामिल है तो युवा वर्ग किस दिशा में जाएगा? कई साल पहले खलनायक नामक फिल्म आई थी। युवा खुद को खलनायक जैसा बनने पर उतारू हो गए थे। डर और अंजाम जैसी फिल्मों ने एकतरफा प्यार व बदला लेने की भावना को काफी बढ़ावा दिया। ओटीटी पर क्राइम के आइडिया परोसे जा रहे हैं। पुलिस को आए दिन ऐसे क्राइम के मामले मिलते हैं, जो ओटीटी की स्टोरी से प्रेरित होते हैं।
फिल्मों में रचनात्मक प्रयोग अवश्य होने चाहिए, लेकिन एनिमल जैसे प्रयोग से फिल्म जगत को बचना चाहिए। समाज को सामूहिक रूप से ऐसी फिल्मों का विरोध दर्ज कराना चाहिए। फिल्मों में हिंसा एक हद तक जायज ठहराई जा सकती है। यदि एनिमल जैसी फिल्में बनती रहीं तो समाज में 'एनिमल' जैसा व्यवहार करने वाले युवाओं को पनपने में देर नहीं लगेगी।
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